_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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***** श्री ज्ञानमती माताजी    —

आर्यिका परमपूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद में टिकैतनगर गांव में सन 1934 में श्री छोटेलाल जैन के घर में मोहिनी देवी की कोख से मैना नामक एक कन्या ने जन्म लिया। केवल 17 वर्ष की आयु में शरद पूर्णिमा के दिन 1952 में आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर घर त्याग कर दिया और आचार्य देशभूषण जी महाराज तथा वीर सागर महाराज से  क्षुल्लिका एवं आर्यिका दीक्षा लेकर ज्ञानमती नाम प्राप्त किया। ज्ञानमती माताजी के उल्लेखनीय कार्यों को देखते हुए अनेकों महाराजों ने उन्हें वीरतमति, चंद्रिका ,आर्यिका युगप्रवर्तिका आदि नामों से सुशोभित किया है।

प्रारंभ से ही माता जी को ज्ञान प्राप्ति की उत्कंठा रही है। अनेक जैन ग्रंथों की ज्ञानसाधना ग्रहण कर उन्होंने समस्त संसार को इससे प्रकाशमान किया ।हिंदी,,प्राकृत,  संस्कृत, कन्नड़, मराठी आदि पर माताजी ने पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। हिंदी और संस्कृत दोनों भाषाओं में माताजी ने अनेकों ग्रंथों की रचनाएं की हैं।

माताजी का कहना है कि तीर्थंकर, भगवंतो की कल्याणकभूमियां और जन्मभूमियां हमारी संस्कृति की महान धरोहर हैं। जिनका संवर्धन और संरक्षण आवश्यक है। इसी भावना से इनके विकास की रुचि सदा से उनके मन में रही है।

 

*****   जम्बुद्वीप    –

जैन समाज का सबसे दर्शनीय स्थल है  जम्बूद्वीप

 

आर्यिका ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से हस्तिनापुर में त्रिलोक शोध संस्थान द्वारा विश्व की एकमात्र विशाल एवं भव्य जम्बूद्वीप संरचना का निर्माण हुआ।

जम्बूद्वीप की कल्पना हस्तिनापुर के पौराणिक राजा श्रेयांश कुमार ने की थी। राजा ने सात स्वप्न देखे थे। जिनमें सुमेरु पर्वत और जम्बूद्वीप का चित्रण था।ज्ञानमती माताजी राजा श्रेयांश कुमार की कल्पना को साकार करना चाहती थी। दक्षिण भारत में स्थित श्री श्रवणबेलगोला में माताजी जिस समय चातुर्मास कर रही थी। तब उन्होंने १५ दिन का मौन रखा था। उसी दौरान उन्हें जम्बूद्वीप का साक्षात चित्र ध्यान अवस्था में दिखाई दिया था। उन्होंने जो चित्र देखा था उसका भौगोलिक पुस्तकों से जब मिलान किया तो उसे एकदम शास्त्र सम्मत पाया। जैन परंपरा के तिलोयपण्णत्ति, जंबूद्वीप पण्णति,  त्रिलोकसार, लोक विभाग, श्लोक वार्तिक एवं तत्वार्थ सूत्र ग्रंथों के आधार पर आर्यिका रत्न ज्ञानमती माता ने जंबूद्वीप की परिकल्पना को साकार किया। जैनाचार्यों के अनुसार इस सृष्टि के तीन भाग हैं – अधोलोक, मध्य लोक व  ऊर्ध्व लोक। अधो लोक में नरक, मध्य लोक में असंख्य द्वीप और  ऊर्ध्व लोक में स्वर्ग व मोक्ष है। द्वीप के बाद समुद्र, समुद्र के बाद द्वीप तथा द्वीप के बाद पुणः समुद्र माने गए हैं। इसे ही असंख्यात द्वीप समुद्र कहा गया है, जिसके मध्य जंबूद्वीप हैं। जंबूद्वीप के चारों ओर लवण समुद्र है तथा आखिरी द्वीप का नाम स्वयंभूरमन द्वीप व स्वयंभूरमन समुद्र है।

     जंबूद्वीप के बारे में मान्यता है कि चारों ओर से लवण समुद्र से धीरे स्थान को ही जंबूद्वीप कहते हैं। हम सब यहीं निवास करते हैं। इसी जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र के आर्यखंड में ही २४ तीर्थंकरों का प्रादुर्भाव हुआ। भारत सहित १५० देश इसी आर्य खंड में अवस्थित माने गए हैं। जैनाचार्यों ने जंबूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन माना है। दो हजार कोस का एक महायोजन है। इस प्रकार से जंबूद्वीप का व्यास ४० करोड़ मील माना गया है।

इस  के अंतर्गत हस्तिनापुर में सुमेरु पर्वत  तथा जम्बूद्वीप की कल्पना को  संगमरमर की सहायता से  साकार किया गया है। यहां पर कल्पित विश्व (भरत क्षेत्र) की संरचना स्थापित की गई है। जंबूद्वीप मानव कल्पना की साकार प्रतिमूर्ति है।

जम्बूद्वीप में जैन शास्त्रों में वर्णित ७८  जिन चैत्यालय और १२२ देव भवनों के गृह चैत्यालयों सहित प्रतिकृतियां बनाई गई हैं। इसके अतिरिक्त हिमतान आदि ६ पर्वत, भारतीय  ६ क्षेत्र, विदेह क्षेत्र में विराजमान सीमंधर आदि तीर्थंकर के जिनबिम्ब जंबूद्वीप में कुल  ३११ पर्वत है।  इसमें सुमेरू १, कुलाचल ६,  गजदंत ४,   वक्षार १६ ,  विजयार्ध ३४, बृजभान चल ३४, नाभि गिरी ५, यमक गिरी ४, गजेंद्र ८ और कंचन गिरि २०० है।

जंबूद्वीप के उत्तर कुरू की ईशान दिशा में जम्बू वृक्ष व देव कुरू की नैऋत्य दिशा में शाल्मलि वृक्ष है। इन वृक्षों की एक-एक शाखा पर जिन मंदिर है। गंगा सिंध, ९० नदियां, ३०० तोरण द्वार बनाए गए हैं। जम्बूद्वीप के मध्य में ८१ फुट ऊंचा सुमेरु पर्वत है।  इसके चारों ओर विशाल लवण समुद्र बनाया गया है।

जैन सिद्धांतों के अनुसार प्रत्येक चतुर्थ काल में २४ तीर्थंकर जन्म लेते हैं। जब – जब तीर्थंकरों का जन्म होता है तब – तब इंद्र का आसन डोलने लगता है। इंद्र ऐरावत हाथी पर बैठकर मनुष्य लोक में आते हैं और नवजात तीर्थंकर शिशु को प्रसूति गृह से सुमेरु पर्वत पर ले आते हैं। वहां १००८ कलशों से भगवान का जलाभिषेक करके जन्म कल्याणक मनाते हैं। २४ तीर्थंकरों का जन्म अभिषेक इसी सुमेरु पर्वत पर इंद्र द्वारा किया गया ।तीनों लोकों में सबसे ऊंचा पर्वत भी यही सुमेरू पर्वत है। इसी के प्रतीक की झांकी हस्तिनापुर में है।

जैन दर्शन का समस्त चित्र इस जंबू द्वीप में देखने को मिलता है। प्राकृतिक दृश्यों के आकर्षण के साथ ही वीतराग प्रतिमाओं के दर्शन से दर्शनार्थियों को आत्मशांति की प्राप्ति होती है।

 

 

 

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