__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत) के
१००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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*** मराठाकालीन शिव मंदिर –

जलालाबाद कस्बे में मराठों के द्वारा बनवाए गए शिव मंदिर आज भी इस क्षेत्र में मराठा संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं। अनोखी शिल्पकला में बनाए गए ये मंदिर भारतीय इतिहास की एक प्रमुख घटना के घटित होने के दौरान मुगल बादशाह शाह आलम के शासन काल के समय बनाए गए थे।

मुगल बादशाह शाह आलम के शासनकाल के समय जलालाबाद कस्बे से दो किलोमीटर दूर स्थित गौसगढ़ के नवाब गुलाम कादिर ने बादशाह शाह आलम से बदला लेने के लिए दिल्ली के लाल किले पर हमला करके कब्जा कर लिया था। लाल किले के दीवाने खास में गुलाम कादिर ने शाह आलम से खजाने की चाबी मांगी लेकिन शाह आलम ने देने से मना कर दिया तो उसने बादशाह की दोनों आंखें फोड़ कर निकलवा ली। महल में कोहराम मच गया। गुलाम कादिर इस घटना के बाद लाल किले से फरार होकर अपनी रियासत गौसगढ़ में आकर छुप गया।

गुलाम कादिर को पकड़ने के लिए शाह आलम ने मराठा शासक महाराजा सिंधिया से सहायता मांगी।

मराठा सैनिकों ने गौसगढ़ रियासत को चारों ओर से घेर लिया तथा जलालाबाद के आसपास के जंगल ने अपना डेरा जमा लिया। बाद में मराठा सैनिकों ने गौसगढ़ पर धावा बोलकर उसे पूरी तरह से तहस-नहस कर मटियामेट कर दिया लेकिन इस सबके बाद भी गुलाम कादिर जान बचाकर भागने में कामयाब रहा।

बाद में मराठा सैनिकों ने गुलाम कादिर को शामली एवं कैराना के बीच स्थित गांव बामनौली के पास से पकड़ लिया। मराठा सैनिकों ने वहीं पर गुलाम कादिर के शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए और उन्हें बादशाह के सामने पेश किया।

यह भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण पन्ना है। मराठा सैनिकों को गौसगढ़ की रियासत को नेस्तनाबूद करने में कई महीने का समय लग गया था। इस दौरान बड़ी संख्या में मराठा सैनिक यहां पर रहे थे। मराठा सैनिकों ने पूजा अर्चना करने के लिए उस समय यहां तीन मंदिरों की स्थापना की थी।

मराठा सैनिकों ने दो मंदिर जलालाबाद कस्बे में और एक मंदिर गौसगढ़ में बनवाया था।

जलालाबाद कस्बे में उनके द्वारा बनवाया हुआ एक मंदिर इस समय मोहल्ला आर्य नगर में शिव मंदिर (जालवाला) के नाम से प्रसिद्ध है।

जलालाबाद कस्बे में मराठों के द्वारा बनवाया हुआ दूसरा मंदिर नदी के किनारे देवता मंदिर के प्रांगण में बना हुआ है।

यहां के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि मोहल्ला आर्य नगर में स्थित शिव मंदिर के प्रांगण में मराठा सैनिकों ने एक जाल का पेड़ लगाया था। इसी से यह मंदिर जालवाला मंदिर कहलाता है। जालवाले मंदिर के ऊपरी हिस्से पर चंद्रमा का चिन्ह बना हुआ है।

मराठा शैली के मंदिरों की विशेषता होती है कि यह मंदिर आकार में छोटे होते हैं और इनके चारों और द्वार बने होते हैं। वर्तमान समय में इन मंदिर के तीन द्वार बंद करके केवल एक द्वार ही खुला रखा गया है।

मराठा शैली के इन मंदिरों की विशेषता है कि इन्हें केवल कली-चूने और ईंटों के द्वारा ही बनाया गया हैं। मंदिरों के द्वार ज्यादा ऊंचे नहीं हैं जिससे मंदिर में जो भी आता है उसे झुक कर ही मंदिर में प्रवेश करना होता है। इन मंदिरों के फर्श भी ऐसे पदार्थ से बनाए गए हैं जिन
से यह हर समय ठंडे ही बने रहते हैं।

मंदिरों के अंदर मराठा कला संस्कृति की झलक लिए बनाए गए भित्ति चित्र यहां आने वाले श्रद्धालुओं का मन मोह लेते हैं। मराठा शैली की मंदिरों की एक विशेषता यह भी होती है कि इन मंदिरों में स्थापित शिवलिंग की पिंडी धरातल से ऊपर उठी हुई होती है।

*** प्राचीन मंदिर मिठ्ठी कुई –

जलालाबाद कस्बे में कृष्णा नदी के तट पर सात सौ वर्ष से भी अधिक प्राचीन इस धार्मिक स्थल पर शिव पार्वती एवं हनुमान मंदिर स्थित है।

प्राचीन कला शैली में बड़ी कलात्मकता से बनाए गए इन मंदिरों का निर्माण कली चूने के द्वारा किया गया है।

— इस स्थान पर महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने भी काफी समय बिताया था। उन्होंने यहां भूमिगत रहकर अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में क्रांतिकारी गतिविधियां संचालित की। चंद्रशेखर आजाद के जाने के बाद भी यहां के क्रांतिकारियों ने अपनी गतिविधियां जारी रखी थी।

— भारत के प्रधानमंत्री रहे श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने भी देश की आजादी से पहले यहां रहकर गांधी आश्रम में सेवा की थी।

प्राचीन मंदिर मिठ्ठि कुई अपने आप में एक अद्भुत स्थान है। श्री हनुमान जी के मंदिर में स्थापित चमत्कारी प्रतिमा के चमत्कार का अनुभव यहां आने वाले श्रद्धालुओं ने कई बार किया है। मंगलवार के दिन यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त प्रसाद चढ़ाने के लिए आते हैं।

— इस धार्मिक स्थान का नाम मीठ्ठी कुई पड़ने के बारे में एक किस्सा सुनाया जाता है। बताते हैं कि पुराने समय में शादी-विवाह के अवसर पर बाहर से आने वाली बारातें इसी स्थान के बाग में रुका करती थी।

शादी विवाह की पुरानी परंपरा है कि बारात की चढ़त होने से पहले कुछ समय बारात बाग में रुकती है। बाग की रस्म होने के बाद ही बारात का नगर प्रवेश व चढ़त होती है। प्राचीन परंपरा आज भी बनी हुई है अंतर केवल इतना आया है कि अब बाग की भेंट रस्म बाद में निभा ली जाती है।

एक बार जलालाबाद के वैश्य परिवार में बारात आई और इसी स्थान के बाग में आकर ठहर गई। कस्बे के लोग बारात की सेवा-सत्कार में लग गए। उस समय गर्मी का मौसम होने के कारण थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर बारातियों को शरबत पिलाने की आवश्यकता थी। लेकिन बारात में आए बारातियों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण अपेक्षा के अनुरूप शीघ्रता से शरबत तैयार नहीं हो पा रहा था। उस समय कस्बे के ही किसी व्यक्ति ने सलाद दी कि बाग के कुएं में ही खांड की बोरियां उलट दी जाएं तो कुएं का सारा पानी मीठा हो जाएगा इससे सभी बारातियों को शीघ्रता से शरबत पिलाया जा सकेगा।

उनकी सलाह के अनुसार बाग के कुएं में कई सारी खांड़ की बोरी उंडेल दी गई। बारात का शानदार स्वागत हुआ और इस शरबत की शोहरत दूर-दूर तक फैल गई।

उस बारात के इस स्थान से जाने के बाद भी यहां के कुएं का पानी काफी दिनों बाद तक भी मीठा रहा था। क्षेत्र के लोगों ने उस गर्मी के मौसम में तब इस कुएं के पानी से जी भरकर अपनी प्यास बुझाई थी। तभी से जलालाबाद के किनारे स्थित इस बाग का नाम मिठ्ठी कुई के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

मीठ्ठी कुई नामक इस स्थान पर बने प्राचीन मंदिरों के प्रति यहां के लोगों की बहुत श्रद्धा है। यहां पर स्थित भगवान शिव व पार्वती का प्राचीन मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है।

इस स्थान पर पार्वती जी का जिस तरह के छोटे आकार का मंदिर यहां बना हुआ है उस तरह का मंदिर अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

यह स्थान स्वामी सर्वदा गिरी जी महाराज की तपोभूमि रहा है। महाराज जी के त्याग, तपस्या और वैराग्य से यहां के लोग बहुत प्रभावित थे और वह यहां के सभी श्रद्धालुओं के प्रिय थे। स्वामी जी के निधन के बाद उनके शिष्यों ने यहां उनकी समाधि बना दी। प्रत्येक वर्ष गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर यहां मेला लगता है जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

*** तीन विधवाओं वाला मंदिर –

इस मंदिर का निर्माण पुन्नी देवी, मंगली देवी और नद्दी देवी नामक तीन विधवा महिलाओं ने 150 साल से भी पहले करवाया था।

*** देवता मंदिर –

इस मंदिर के बारे में किवदंती है कि एक बार सात सहेलियां मंदिर घूमने के लिए आई। यहां मंदिर में एक सांप की बांबी को देखकर उनमें से ही एक लड़की ने कहा कि चलो सांप की बांबी के फेरे लेते हैं। सबके मना करने पर भी उस लड़की ने सांप की बांबी के सात फेरे ले लिए। लड़की के सात फेरे लेने के बाद बांबी से निकलकर सांप देवता ने उस लड़की को अपनी चपेट में ले लिया। काफी प्रयास करने के बाद भी उस सांप ने लड़की को नहीं छोड़ा तब‌ उस सांप के टुकड़े-टुकड़े करने के बाद ही लड़की को मृत अवस्था में सांप देवता से छुड़ाकर अलग किया गया। इस घटना के बाद से ही यह मंदिर देवता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

*** श्री दुर्गा देवी मंदिर –

यह जलालाबाद का प्रमुख धार्मिक स्थान है। नवरात्र अष्टमी चौदस व दशहरा को यहां मेला लगता है जिसमें स्थानीय एवं आसपास के गांव के हजारों श्रद्धालु आकर मां दुर्गा देवी की पूजा अर्चना करके प्रसाद चढ़ाते हैं और मनचाही मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

*** गुसांई वाला तालाब –

जलालाबाद कस्बे के पूर्वी छोर पर कृष्णा नदी के किनारे गुसांई वाला तालाब स्थित है। इस क्षेत्र में धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व के इस तालाब के दैवीय चमत्कारों के कारण यहां के लोगों के जनमानस में इस तालाब का अत्यधिक महत्व है।

मान्यता है कि इस तालाब को 600 वर्ष पूर्व राजा केसरी सिंह ने अपने शासनकाल में बनवाया था। उस समय यह तालाब राज महल का शाही स्नानगृह था।उस जमाने में छोटी-छोटी ईंटों व कली चूने के द्वारा इस स्नानगृह को बनाने में कारीगरों ने अपनी कला का बेहतरीन प्रदर्शन किया है। राज परिवार के पुरुषों एवं महिलाओं के लिए यहां अलग-अलग प्रबंध किया गया था। इस स्नानगृह में पानी आने का रास्ता और पैड़ियां भी बनाई गई थी।

मान्यता है कि इस प्राचीन तालाब को कुछ दैवीय शक्तियां भी प्राप्त हैं। किवदंती है कि किसी व्यक्ति के शरीर में चाहे जितनी भी फुंसी-फोड़े या मस्से हो वह व्यक्ति एक बार इस तालाब में नहा लेता है तो उसकी यह बीमारी स्वतः ही समाप्त हो जाती है। इस तालाब में एक विशेष प्रकार की दूधी पाई जाती है। यह दूधी पहाड़ों पर मिलती है या फिर इस तालाब में मिलती है। इस दूधी को बच्चों की फुंसी पर लगा दिया जाए तो वह ठीक हो जाती है।

इस तालाब के बीच में एक टीला बना हुआ है कहते हैं कि यह किसी महापुरुष की समाधि है। इस स्थान की विशेषता है कि तालाब में चाहे जितना भी पानी आ जाए तब भी यह इस टीले के ऊपर तक नहीं पहुंचता है।

एक यह भी मान्यता है कि सिद्ध पुरुष की समाधि होने के कारण ही इस तालाब में चमत्कारिक दैवीय शक्ति है।

जलालाबाद तथा आसपास के इलाके में इस तालाब का धार्मिक महत्व है प्रतिवर्ष आषाढ़ माह में शनिवार एवं रविवार के दिन इस तालाब पर आकर महिलाएं पूजा करती हैं और यहां पेड़े का प्रसाद चढ़ा कर घर परिवार की सुख समृद्धि की कामना करती हैं।

देखभाल के अभाव में अब यह धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व की धरोहर धीरे-धीरे नष्ट हो रही है।

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