____________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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हस्तिनापुर विश्व भर के जैन धर्मावलंबियों की श्रद्धा का केंद्र है।

संसार में प्राचीन काल से अब तक अनेक मूर्तियों , मंदिरों और धर्मस्थलों का निर्माण हुआ है और होता आ रहा है क्योंकि सांसारिक व्यक्ति इनकी पूजा उपासना करके सुख-शांति और आनंद का अनुभव करता है।

 

*****  नंदीश्वर दीप    —

मानवों में नंदीश्वर द्वीप तक पहुंचने की सामर्थ नहीं होने के कारण शास्त्रों में उल्लेखित विवरण के अनुसार नंदीश्वर दीप की प्रतिकृति का निर्माण पौराणिक नगर हस्तिनापुर में कराया गया है।

हस्तिनापुर में विश्व की महानतम प्रतिकृति नंदीश्वर दीप के ५२ जिन चैत्यालयों एवं ५ मेरुओं का निर्माण श्री दिगंबर जैन  तीर्थ क्षेत्र कमेटी ने कराया है ।

जैन और सनातन हिंदू धर्म के प्राचीन धर्म ग्रंथों में जंबूद्वीप का वर्णन आता है l किसी भी शुभ कार्य के करने से पूर्व संकल्प आदि में सर्वप्रथम जंबूद्वीप का उल्लेख किया जाता है। धर्म शास्त्रों में जंबूद्वीप की तरह इस लोक में अनंत द्वीप और समुद्र हैं। नंदीश्वर द्वीप आठवां द्वीप है।

धर्म ग्रंथों में जैसे बताया गया है कि नंदीश्वर द्वीप का विस्तार  एक सौ तिरसठ  करोड़ चौरासी लाख योजन है। इस द्वीप के अंदर की परिधि एक हजार छत्तीस करोड़ बारह लाख दो हजार सात सौ योजन है और इस द्वीप की बाहर की परिधि दो हजार बहत्तर करोड़ तैंतीस लाख चौवन हजार एक सौ नब्बे योजन है। शास्त्रानुसार वर्णित इसी नंदीश्वर द्वीप की प्रतिकृति को हस्तिनापुर स्थित श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ मंदिर के प्रांगण में भव्य तरह से बनाया गया है।

धर्म ग्रंथों में जैसे बताया गया है उसी के अनुसार नंदीश्वर द्वीप की प्रतिकृति में चारों दिशाओं में चार अंजनगिरी पर्वत  है। शास्त्रों के अनुसार यह पर्वत चौरासी हजार योजन ऊंचे और इतने ही चौड़े तथा एक हजार योजन गहरे हैं। ये सभी पर्वत ढोल के आकार में बने हैं और चित्र विचित्र अद्भुत रूपों के साथ वज्रमय मूल के धारक हैं। ये पर्वत प्रभा मंडित है और उज्जवल प्रकाश को बिखेरने वाले और सब तरह से मन को लुभाने वाले हैं। ये सभीअत्यंत सुंदर काले शिखरों से युक्त और स्वर्ण तथा मणियों से सुसज्जित पर्वत है । धर्म शास्त्रों के अनुसार एक लाख योजन आगे चलकर इन पर्वतों की चारों दिशाओं में चार अविनाशी बावड़ियां या सरोवर हैं  स्फटिक की तरह स्वच्छ जल से युक्त इन सरोवरों में कमल के सुंदर आकर्षक फूल खिले हैं यह सरोवर मछली मगर आदि से रहित और वेदिकाओं से युक्त हैं। इन सरोवरों की एक हजार योजन और लंबाई एक-एक लाख योजन है

इन सरोंवरों की पूर्व दिशा में अंजनगिरी है उसकी पूर्व आदि दिशाओं में क्रमानुसार नंदा, नंदवती, नंदोत्तरा और नंदीघोषा नाम की वापिकाएं हैं। दक्षिण दिशा के अंजनगिरी की पूर्व आदि दिशाओं में क्रमानुसार विजया, वैजयंती, जयंती और अपराजिता नाम की चार वापिकाएं हैं। पश्चिम दिशा के अंजनगिरी की पूर्व दिशाओं में अशोका, सुप्रबुद्ध, कुमुदा और पुण्डरीकिणी वापीकाएं स्थित हैं। उत्तर दिशा के अंजनगिरी के पूर्व में सुप्रभंकरा, सुमना, आनंदा और सुदर्शना नाम वाली वापीकाएं स्थित है।

इन सब सोलह वापिकाओं का भीतरी अंतर पैसठ हजार पैंतालीस का है। इन वापिकओं के मध्य का अंतर एक लाख चार हजार छह सौ दो योजन है और इन वापिकाओं का बाहरी अंतर दो लाख तेईस हजार छह सौ इकसठ योजन है और इन सब वापिकाओं के बीच में रूपामयी श्वेत शिखरों से युक्त स्वर्णमय सोलह दधिमुख पर्वत  हैं और यह सभी पर्वत भी एक-एक  हजार योजन गहरे, दस- दस हजार योजन लंबे और चौड़े तथा इतने ही ऊंचे और ढोल के आकार युक्त हैं। इन चारों वापिकाओं के चारों ओर चार वन हैं जो  वापिकाओं के ही समान एक लाख योजन लंबे और पचास हजार योजन चौड़े हैं। ये वन हैं – पूर्व की दिशा में अशोक वन दक्षिण की दिशा में सप्तयर्णवन पश्चिम की दिशा में चंपक वन और उत्तर की दिशा में आम्र वन है।

इन वापिकाओं के बाहरी कोनों पर रतिकर हैं।  इस तरह एक दिशा की चार बावडियों से संबंधित आठ – आठ रतिकर हैं। इस प्रकार चारों दिशाओं में कुल बत्तीस रतिकर हैं। इन सभी पर एक-एक चैत्यालय है। इसी प्रकार अंजनगिरी और दधिमुख पर्वतों के शिखरों पर एक-एक जिन चैत्यालय है। इस प्रकार इन सब मंदिरों की संख्या बावन तक है। यह सब चैत्यालय पूर्वामिमुख है और सौ योजन लंबे पचास योजन चौड़े और पचहत्तर योजन ऊंचे हैं। सभी चैत्यालय में आठ योजन ऊंचे और चार योजन चौड़े तीन-तीन द्वार हैं।

इन सभी पावन चैत्यालयों’  में पांच सौ धनुष ऊंची स्वर्ण से निर्मित रत्नमय कोटि सूर्यो की प्रभा को धारण करने वाले वितराग भगवान जिनेंद्र की प्रतिमाएं विराजमान है। इन प्रतिमाओं के दर्शन करने मात्र से वैराग्य की प्राप्ति होती है।

नंदीश्वर दीप की जो परिकल्पना जैन धर्म शास्त्रों में वर्णित है। उसको वास्तुविदों ने प्रतिकृति के रूप में बड़ी सजीवता से साकार कर के हस्तिनापुर की भूमि पर बैकुंठ को उतारने का कार्य कर दिखाया है। जिनलोक की अद्वितीय रचना को जिस तरह से यहां पर साकार किया गया है उससे इस रचना का दर्शन करने वाले श्रद्धालु एवं दर्शकों को असीम शांति और आनंद की प्राप्ति होती है।

***** अष्टापद मंदिर   –

प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री ऋषभदेव ने अपनी सुदीर्घ जीवन यात्रा संपन्न कर श्री अष्टापद पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया था।

इस अष्टापद पर्वत का ‘शत्रुंजय महात्म्य ग्रंथ’ में विस्तार के साथ वर्णन है।

तिब्बत देश में मानसरोवर झील पर अवस्थित विख्यात कैलाश पर्वत को ही इतिहासविद्‌ अष्टापद की संज्ञा देते हैं।

जैन आगमों में यह वर्णन आता है कि महाराजा भरत चक्रवर्ती ने प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री ऋषभदेव जी की नश्वर काया के अग्नि संस्कार स्थल अष्टापद पर वर्द्धकी रत्न के द्वारा सिंहनिषद्या नामक मणीमय जिन प्रासाद बनवाया था। तीन कोस ऊंचे इस प्रसाद में स्वर्ण मंडप जैसा मंडप और उसके भीतर पिठिका, देवच्छन्दिका  तथा वैदिकाऔं का निर्माण करवाया था जो विलुप्त हो चुके हैं।

इसी श्री अष्टापद मंदिर को हस्तिनापुर में निर्मित किया गया है।  भव्य ऐतिहासिक अष्टापद मंदिर स्थापत्य कला का अनुपम उदाहरण है। इस अनूठी आकर्षक और विलक्षण रचना में उस समय की राजनीति, समाज,अध्यात्म और धर्म की स्थितियों को साक्षात होते हुए देखा जा सकता है।

अष्टापद मंदिर की भव्यता इसी से जानी जा सकती है कि यह १५१ फुट ऊंचा, १६० फुट व्यास और ८ पदों वाले पर्वत के रूप में बनाया गया है। पर्वत के ऊपर कलात्मक जिन मंदिर की भव्य रचना की गई है। ध्वजा सहित इस मंदिर की कुल ऊंचाई भूतल से १५१ फुट है। इस जिन मंदिर की चारों दिशाओं में क्रमशः    २ -४ -८ तथा १० जिनबिंब अर्थात २४ भगवान विराजमान किए गए हैं।

भगवान की प्रतिमाओं के वर्ण  शास्त्रों में वर्णित भगवान के वर्ण के अनुरूप ही हैं। संपूर्ण मंदिर संगमरमर से बना है। जो शिल्प कला की दृष्टि से विश्व में अद्वितीय है।

***** कमल मंदिर     – –

जंबूद्वीप परिसर में कमल मंदिर स्थित है।

 

***** सुमेरु पर्वत

जम्मू दीप परिसर में सुमेरु पर्वत की प्रतिकृति का निर्माण किया गया है। सुमेरु पर्वत जैन भूगोल की साकार कल्पना है

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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