________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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हस्तिनापुर का  जैन धर्म में  विशेष महत्व है।

हस्तिनापुर जनपद मुख्यालय मेरठ से 30 किमी दूर स्थित है।

हस्तिनापुर में दिगंबर तथा श्वेतांबर दोनों ही समुदायों के पृथक – पृथक विशाल एवं भव्य मंदिर बने हुए हैं।

 

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प्राचीन काल में हस्तिनापुर में सम्राट अशोक के पौत्र राजा सम्पत्ति ने यहां अनेक जैन मंदिरों का निर्माण कराया था। यह बस्ती २०० ईसा पूर्व  तक  रही इसके पश्चात १०वीं – १२ वीं शताब्दी से १४वीं शताब्दी तक भारतवंशी राजा हरदत्त राय के समय पुणः बसाई गई। सन१६०० ईसवी में हिंदी जैन साहित्य के अमर कवि श्री बनारसी दास ने हस्तिनापुर की सकुटुंब यात्रा की थी। कविवर बनारसी दास बादशाह शाहजहां के समकालीन थे।

प्राचीन काल में यहां ४ स्तूपों के अतिरिक्त अनेक जैन मंदिरों और निशियों का भी निर्माण हुआ। १८वीं- १९ वीं शताब्दी में यहां मंदिर और निशियों की हालत बहुत जीर्ण-शीर्ण थी। लोगों की प्रार्थना पर सन १८०१ में मुगल बादशाह शाह आलम के खजांची दिल्ली निवासी राजा हरसुख राय जी द्वारा शाहपुर निवासी लाला जय कुमार मल की देखरेख में ५ वर्ष की अवधि में विशाल शिखरबंद दिगंबर जैन मंदिर का निर्माण हुआ। १८०६ में कलशारोहन और वेदी प्रतिष्ठा हुई जिसका समस्त कार्य राजा साहब ने समारोह पूर्वक संपन्न करवाया। उस समय मंदिर में भगवान पार्श्वनाथ की बिना फन वाली प्रतिमा विराजमान की गई। सन १८४० में लाला जयकुमार ने मंदिर का विशाल सिंह द्वार बनवाया। इसके पश्चात मंदिर में बहुत सा कार्य राजा हरसुख राय के पुत्र राजा भुगन चंद ने कराया यह मंदिर श्री शांतिनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है

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***** निशियां जी  –

हस्तिनापुर में दोनों जैन समुदायों के मंदिरों के अतिरिक्त जैन धर्मावलंबी जिन्हें परम पवित्र मानते हैं, ४ प्राचीन निशियां जी हैं। ये चरण – चिन्ह हैं। तपोवन में प्राचीन चार स्तूपों के स्थान पर निशियां तीर्थंकर शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ और मल्लिनाथ के नाम से विद्यमान हैं।

प्राचीन काल में हस्तिनापुर में स्तूपोर के अतिरिक्त जैन मंदिरों और निशिओका भी निर्माण हुआ था हरे भरे विशाल वृक्षों से आच्छादित घने वन के बीच प्राचीन मंदिर से लगभग २ – ३ मील दूर टीलों पर चार जैन निशियां (टोंक) बनी हुई हैं। जिनमें तीर्थंकरों के प्राचीन चरण स्थापित हैं सबसे पहले भगवान शांतिनाथ की निशियां है, जिस पर स्वास्तिक बना हुआ है।

प्रथम निशियां जी का नामकरण शांतिवन के रूप में किया गया है।

इससे आगे दो निशियां भगवान कुंथुनाथ और भगवान अरहनाथ ये दोनों क्रमशः दायीं- बायीं ओर हैं। दोनों चरण की छतरी के नीचे एक पत्थर लगा हुआ है। जिसमें दोनों तीर्थंकरों के जीवन परिचय लिखे हैं। इन दोनों पर चरण बने हुए हैं।

 

##  श्वेतांबर समाज की केवल एक निषिधका है, जो तीर्थंकर शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ के नाम से है।

## निशियां जी के निकट ही श्वेतांबर संप्रदाय के तीन अतिसुंदर मंदिर है। जिनमें शांतिनाथ मंदिर आदिनाथ पारणा मंदिर की शोभा देखते ही बनती है।

हस्तिनापुर में कार्तिक मास में इस स्थान पर विशाल जैन मेला लगता है उस समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु  नर – नारी इन निशिकाओं के दर्शन करने के लिए बड़े सवेरे ही नंगे पांव जाते हैं।

***** श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर हस्तिनापुर –

हस्तिनापुर का प्राचीन दिगंबर जैन बड़ा मंदिर क्षेत्र का गौरव है। इस मंदिर में बेहद प्राचीन चमत्कारी प्रतिमाएं विराजमान हैं। इस मंदिर का विशाल प्रांगण हैं, जिसके बीचों-बीच  ३२ फुट ऊंचा मान स्तंभ है।  तीन शिखरों वाले प्राचीन मंदिर के मुख्य भवन मंदिर के मध्य भाग में लगभग १२०० वर्ष से भी अधिक प्राचीन ५ फुट ११ इंच की अतिशयपूर्ण भगवान शांतिनाथ की खड़गासन प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा १९२८-२९ में तपोवन में दूसरी नसियां जी के निकटवर्ती टीले की खुदाई में प्राप्त हुई थी। इस मंदिर के एक ओर तीर्थंकर कुंठुनाथ का दूसरी ओर तीर्थंकर अरहनाथ का मंदिर है। कुंथुनाथ व अहरनाथ तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भी हस्तिनापुर मैं भूगर्भ से प्राप्त हुई हैं।

*****  इस दिगंबर जैन बड़े मंदिर में ही तीर्थंकर की धर्म सभा यानी समवशरण की अद्भुत व भव्य रचना सुशोभित है। जिसमें तीर्थंकर मल्लिनाथ जी की धर्मसभा का बड़ा ही सजीव चित्रण किया गया है।

इसी मंदिर परिसर में  पांडुक शिला, नंदीश्वर द्वीप, पारसनाथ मंदिर, बाहुबली मंदिर, जल मंदिर स्थित है।

यहीं दिगंबर जैन उत्तर प्रांतीय गुरुकुल भी है। यहां आध्यात्मिक वातावरण में विद्यार्थियों को धर्म शिक्षा दी जाती है।

गुरुकुल के प्रांगण में बाहुबली मंदिर- इस मंदिर में भगवान बाहुबली की काले संगमरमर की सवा १३ फुट ऊंची विशाल प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर के बाएं ओर तीर्थंकर महावीर उद्यान है।

***** कैलाश पर्वत  –

भगवान ऋषभदेव की निर्वाण स्थली कैलाश पर्वत की प्रतिकृति के रूप में अद्भुत व मनोहारी कैलाश पर्वत निर्मित किया गया है। जिसकी ऊंचाई १३१ फुट है। प्राकृतिक सौंदर्य से सुशोभित कैलाश पर्वत पर भगवान ऋषभदेव की खडगासन मुद्रा में प्रतिमा विराजमान है।

* यहां २४ तीर्थंकरों की टीके, निशियां जी, अरहनाथ, कुंथुनाथ व बाहुबली मंदिर, समवशरण मंदिर,नंदीश्वर दीप, महावीर उद्यान, विजय स्तंभ, जल मंदिर, पांडुक शिला, जंबू द्वीप की रचना, श्वेतांबर मंदिर,२० टोंक, साधु संतों की समाधियां, गुरुकुल आदि यात्रियों के आकर्षण के प्रमुख केंद्र है। आधुनिक आकर्षक मंदिर के दृश्य दर्शनार्थियों को मंत्रमुग्ध से कर देते हैं। हर समय यहां देश के कोने कोने से आए यात्रियों का मेला सा भरा रहता है।

*सरकार द्वारा यहां शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध है।

*****  शांतिवन   –

यह पौराणिक वन है। हरिवंश पुराण के अनुसार इसी वन में महाभारत काल में कौरवों और पांडवों ने अपने अंतिम समय में इसी वन में जिन दिक्षा ग्रहण की थी। इसके अलावा इस वन में बारह खंभा टीला के अवशेष आज भी मौजूद हैं। जहां पर कभी पांडवों और कौरवों ने चौपड़( जुआ) खेली थी। जिसके अवशेष आज भी लोगों के आश्चर्य का विषय हैं।

यहां सैकड़ों किलोमीटर दूर तक फैली हरियाली, कल कल कर बहती पतित पावनी गंगा , वातावरण में मुग्ध कर देने वाली फूलों की महक, वन के सन्नाटे में चलती हवा के बीच वन्य पशुओं की आवाजें और पक्षियों का कलरव ।

यह यहां के प्राकृतिक वातावरण की सुंदरता का वह अद्भुत नजारा है। जो यहां आने वाले श्रद्धालु और प्रकृति प्रेमियों को अध्यात्म और प्रकृति की सुंदरता से सम्मोहित कर देता है।

शांतिवन 2073 वर्ग किलोमीटर में फैले हस्तिनापुर वन्य अभयारण्य में स्थित है। चारों ओर फैले प्रदूषित और तनावपूर्ण वातावरण से यहां आकर मानसिक और आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है। चारों ओर दूर तक फैली हरियाली, रेतीले टीले, वन्य जीवन के अद्भुत नजारे, चारों ओर दूर तक फैले विशाल वृक्षों से आच्छादित घने वनों के बीच स्थित पौराणिक और आध्यात्मिक स्थल और पवित्र और जीवनदायिनी गंगा नदी भी इसी क्षेत्र से होकर गुजरती है। यह सब यहां आने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन भर के लिए यादगार पल बना देते हैं।

शांतिवन के घने जंगल में शीशम, साल, चंदन, सागौन, जामुन,आम, अर्जुन, सेमल, बरगद, अशोक, नीम, आंवला, खैर, चीड़, बेर, बांस, चीड़, कीकर, यूकेलिप्टस सहित सैंकड़ों प्रकार की प्रजातियों के औषधिय और कीमती इमारती लकड़ी वाले विशाल वृक्ष बहुतायत में मिलते हैं।

भारत में  औषधिय पौधों के लिए जो वन्य क्षेत्र जाने जाते हैं उसमें यह वन्य क्षेत्र औषधीय पौधों की प्रचुरता से पाए जाने के लिए भी जाना जाता है। इस वन्य में क्षेत्र में मुख्य रुप से हरड, बेल, बहेड़ा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, आखा, बांसा, शतावर, हार सिंगार, वन तुलसी, धतूरा, नागरमोथा, सफेद मूसली, दूधली, हैड, अडूसा, महानिम्ब, बंशलोचन, पचौली, गुर्च आदि विभिन्न प्रकार की देसी जड़ी बूटियां प्रचुरता से पाई जाती हैं। इन वन औषधियों का विभिन्न असाध्य बीमारियों के इलाज में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा विभिन्न आयुर्वेदिक एवं सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कंपनियां  इनका उपयोग विभिन्न प्रकार के हर्बल शीतलपेय,  च्यवनप्राश, पाचक चूर्ण, अगरबत्ती, साबुन और तेल आदि बनाने में करती हैं।

यह वन्य क्षेत्र विभिन्न प्रकार के पशु पक्षियों का भी अचरज भरा संसार है। यहां दुर्लभ हिरन, बारहसिंघा, तेंदुआ, जंगली सूअर, सेही, बंदर, नीलगाय, पाड़ा, लोमड़ी, सियार जैसे जंगली जानवर मिलते हैं। इस जंगल में भोजन पानी की उपलब्धता और आसानी से छिपने और निवास के लिए लंबी – लंबी टाटा घास उपलब्ध है। यहां के घने जंगल के ऊंचे – ऊंचे विशाल वृक्षों पर तरह-तरह के वन्य पक्षी निवास करते हैं।

सर्दियों के समय में यहां की झीलों और दलदली जमीन पर भोजन की उपलब्धता और अनुकूल वातावरण मिलने से विदेशी प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में आते हैं। लाखों की संख्या में आने वाले विदेशी पक्षी जैसे सारस, साइबेरियन क्रेन, जलीय मुर्गाबी, किंगफिशर आदि अनेकों प्रजाति के पक्षी जो दूर देशों साइबेरिया और यूरोपीय देशों से हजारों किलोमीटर की यात्रा करके सर्दी के मौसम में यहां प्रजनन और भोजन के लिए आते हैं।जिन्हें यहां आसानी से देखा जा सकता है।

इस वन्य क्षेत्र से ही होकर गुजर रही गंगा नदी में जलीय जीव – जंतु कछुआ , घड़ियाल, मगरमच्छ और राष्ट्रीय जल जीव डॉल्फिन भी निवास करते हैं।

अनुकूल वातावरण मिलने से राष्ट्रीय पक्षी मोर का यह मनभावन स्थान है। इस जंगल में मोर बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। यहां आसानी से मोरों के झुंड के झुंड को विचरण करते हुए देखा जा सकता है।

 

 

 

 

 

 

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