हस्तिनापुर भगवान आदिनाथ की प्रथम आहार भूमि है। 

भगवान पार्श्वनाथ,  भगवान महावीर भी यहां पधारे थे।

जैन धर्म के तीन तीर्थंकरों की जन्मभूमि है यह धरा।

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जैन धर्मानुयायियों के लिए हस्तिनापुर अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ क्षेत्र है। हस्तिनापुर वर्षभर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना रहता है फिर भी मेलों, पर्व और महोत्सवों के अवसर पर यहां की रौनक और  चहल-पहल दर्शनीय होती है।

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हस्तिनापुर में जैन धर्म का वार्षिक मेला कार्तिक  (अष्टाह्निका ) शुक्ला ८ से १५ तक मनाया जाता है।

जैन मान्यताओं के अनुसार वर्ष में तीन बार अर्थात कार्तिक, फाल्गुन तथा आषाढ़ के आखिरी ८ दिनों में देवता नंदीश्वर की वंदना के लिए जाते हैं।  जिसे अष्टान्हिका पर्व कहते हैं। परंतु नंदीश्वर मानव पहुंच से बाहर होने के कारण यह उत्सव तीर्थ स्थानों पर मनाया जाता है। इसी क्रम में हस्तिनापुर में वार्षिक मेला (अष्टान्हिका ) कार्तिकी शुक्ला अष्टमी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है।

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भगवान ऋषभदेव को गन्ने के रस का प्रथम आहार देने का गौरव इसी नगर हस्तिनापुर को मिला और वह दिन अक्षय तृतीया के नाम से पर्व के रूप में आज तक मनाया जाता है।

अक्षय तृतीया को यहां एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में देश- विदेश से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है l ‘अक्षय तृतीया’ के इस आयोजन में श्रद्धालु वर्ष भर के कठोर व्रतों का समापन गन्ने का रस पीकर करते हैं। इस अवसर पर यहां साधु-संतों का विशेष सानिध्य प्राप्त होता है। विशाल रथ यात्रा में दूर-दराज के क्षेत्रों के श्रद्धालु भक्त उमड़ पड़ते हैं। मनचाही इच्छाएं पूरी होने की चमक हर श्रद्धालु के चेहरे पर साफ चमकती है।

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माघ के महीने में भगवान ऋषभदेव निर्वाणोत्सव के मेले पर भी श्रद्धालु भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। भगवान के मोक्ष प्राप्त करने की स्मृति में श्रद्धालु सफेद लड्डू चढ़ाकर अपना जीवन धन्य समझते हैं।

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यहां अनेक ऐतिहासिक घटनाएं घटी है

हस्तिनापुर में महापदम नाम के चक्रवर्ती हुए।  उनके पुत्र राजा पद्म के बली, नमूची, प्रहलाद और बृहस्पति नामक चार मंत्रियों ने अकम्पनाचार्य एवं उनके संघ के ७०० मुनियों पर घोर उपसर्ग किया तो उनके भाई मुनि विष्णु कुमार ने अपनी विक्रिया ऋद्धि द्वारा वायन ब्राह्मण का रूप धारण कर उसका निवारण किया। कहते हैं ‘रक्षा – बंधन’ का महापर्व यहीं से शुरू हुआ।

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कार्तिक पूर्णिमा और वैशाख शुक्ल तृतीया को श्वेतांबर जैन मंदिर में और कार्तिक शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा के बीच दिगंबर जैन मंदिर में कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।

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