_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.- भारत) के१०० कि.मी. के दायरे के निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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देहरादून जनपद के जौनसार बावर क्षेत्र में जहां पांडवों की पूजा की जाती है और इस इलाक़े के हर कार्य में पांडव संस्कृति की झलक देखने को मिलती है तो वहीं इसी इलाके से सटा हुआ एक इलाका है रवाईं क्षेत्र, यहां का रवाईं समाज दुर्योधन की पूजा करता है।

दुर्योधन को दुर्गुणी अर्थात क्रूर,अनीति-पथगामी, विद्वेषी, कपटी,छली और भी न जाने क्या-क्या माना जाता है। कभी-कभी दुर्योधन धर्म और नीति की बातें करता हुआ भी दिखाई देता है लेकिन फिर भी दुर्योधन की छवि अधर्मी की मानी जाती है। दुर्योधन को पांडवों की तरह आदर की दृष्टि से नहीं देखा जाता। लेकिन रवाईं समाज दुर्योधन की पूजा करता है, दुर्योधन रवाईं समाज के ईष्ट देवता हैं। रवाईं इलाके के इक्कीस गांवों में दुर्योधन के चौदह मंदिर हैं। रवाईं क्षेत्र में दुर्योधन की तो पूजा होती ही है, यही नहीं उसके परम मित्र कर्ण की भी यहां पूजा होती है। इसी इलाके में कर्ण का भी भव्य मंदिर विद्यमान है।

देहरादून जनपद के जौनसार बावर इलाके से सटा हुआ ही रवाईं क्षेत्र है। देहरादून से 132 कि.मी. दूर रवाईं क्षेत्र का नौगांव एक अच्छा कस्बा है। यमुना नदी के किनारे बसा नौगांव कस्बा यमुना घाटी का व्यवसायिक केंद्र है। यमुनोत्री धाम इसके पास ही स्थित है। नौगांव से 19 कि. मी. दूर यमुना नदी पार करके टौंस घाटी में पुरोला एक अच्छा नगर है। यमुना और टौंस नदियां रवाईं क्षेत्र को सौंदर्य प्रदान करने के साथ-साथ धन-धान्य से भी परिपूर्ण करती हैं।

पुरोला और उसके आसपास के इलाके के गांवों में तो पांडवों की ही पूजा होती है। जौनसार बावर क्षेत्र की तरह ही यहां इस इलाके के गांवों में भी पांडवों के प्रतीक गदा और धनुष बाणों को रखे हुए देखा जा सकता है।

पुरोला से आगे 45 कि.मी. चलने पर वह स्थान आता है जहां रुपिन और सूपिन इन दो नदियों का संगम होता है। ये दोनों नदियां मिलकर ही टोंस नदी बनती है। लेकिन अचरज की बात है कि जहां कहीं दो नदियों का संगम होता है उस स्थान को पवित्र प्रयाग कहा जाता है और उस संगम स्थान पर स्नान करना पुण्यदायक माना जाता है, लेकिन रुपिन और सूपिन नदियों के संगम को दुर्भाग्यवश पवित्र प्रयाग नहीं कहा जाता। यहां तक की इस सारे इलाके को स्वर्ग समान बनाने वाली टोंस नदी को भी यहां अपवित्र नदी माना जाता है। यहां इस स्थान पर टोंस नदी में स्नान करना तो दूर, इसके जल का स्पर्श करना भी वर्जित है।

इसी संगम स्थल पर टोंस नदी के किनारे ही स्थित है नैटवाड़ गांव। बस लगभग यहीं से ही दुर्योधन का इलाका आरंभ हो जाता है। और इसी स्थान के दाहिनी और कर्ण का इलाका है।

यहीं हैं मुनोरा सेरा (यानी कुछ हरे-भरे समतल खेत), इन से ही दुर्योधन और कर्ण के इलाकों की सीमाओं का निर्धारण होता है।

मध्य हिमालय क्षेत्र की हर पट्टी यानी इलाके के अपने-अपने देवता होते हैं। इन देवताओं का अपने क्षेत्र में बहुत प्रभाव होता है। कोई भी व्यक्ति उस इलाके के देवता की इच्छा के विरुद्ध आचरण नहीं कर सकता और न ही उनका अपमान कर सकता है, अगर वह ऐसा करता है तो उसे भारी दंड चुकाना पड़ता है। कभी-कभी तो उस व्यक्ति को अपने धन संपत्ति से ही हाथ धोना पड़ सकता है। यहां के लोक विश्वास और सामाजिक मान्यताएं इस प्रकार की हैं कि पहाड़ के संपूर्ण जीवन के केंद्र यही देवता होते हैं।

रवाईं इलाके की पंचगाई पट्टी के देवता दुर्योधन हैं तो इससे लगते इलाके की ही सिंगतूर पार्टी के देवता कर्ण हैं।

रवाईं क्षेत्र की टोंस घाटी की पंचगाई पट्टी और फतेह पर्वत के कुछ गांवों में दुर्योधन की पूजा बड़े धूमधाम से की जाती है। कोई भी छोटा बड़ा मांगलिक अवसर हो या फिर मेलों का आयोजन, यहां के लोग अपने इष्ट देवता दुर्योधन की पूजा करते हैं। उत्सव यात्राओं के समय दुर्योधन की मूर्ति को चांदी की डोली में बिठाकर यहां के लोग झूमते-नाचते और गाते हुए पूरे इलाके में गांव-गांव घुमाते हैं। यह उत्सव यात्राएं बहुत रोचक होती है। देवता की उत्सव यात्रा के साथ यहां के लोग दूर-दूर के गांवों में घूम आते हैं और अपने सगे-संबंधियों से भी मिल लेते हैं। उत्सव यात्रा प्राचीन पर्यटन का ही एक रूप हैं। यहां के लोग खेती-बाड़ी के कार्यों से फुरसत पाकर देवता की यात्रा के साथ देशाटन भी कर लेते हैं। इस इलाके में इस प्रकार की उत्सव यात्राओं की परंपरा अभी भी है। जब बड़ी उत्सव यात्रा का आयोजन होता है तो रवाईं इलाके के प्राय: सभी देवी-देवता हर बार तय किए गए गांव में एकत्रित होते हैं और सभी की बड़े धूमधाम से पूजा की जाती है।

रवाईं क्षेत्र के 21 गांव दुर्योधन देवता के अधीन हैं और इनमें ही – पांव (उपला), पॉव (निचला), धारा, फिताड़ी, सिर्गा, सौड़, लेवाड़ी, कोटगांव, सिदरी, ओसला, गंगाड़, ढ़ाटमीर, सनकुण्डी तथा जखोल इन कुल 14 गांवों में दुर्योधन 14 मंदिर हैं।

रवाईं इलाके के गांव हरे-भरे खेतों के बीच बसे होते हैं। इन गांवों में प्रायः दो या तीन मंजिले मकान पूरी तरह लकड़ी के बने होते हैं। आधुनिकता से दूर परंपरागत रूप में सजे-धजे होते हैं यहां के गांव। यह इलाका और जगहों से हर तरह से भिन्न दिखाई देता है। नौगांव से ही यह भिन्नता इस इलाके की बोली (रवॉल्टी) और यहां की वेशभूषा में दिखाई देने लगती है। यहां के लोगों का खान-पान, रहन-सहन भी अलग है और उनके आचार-विचार भी अलग हैं।

यहां की महिलाएं आंगड़ी शैली की कुर्ती या कमीजों के साथ ऊनी पैजामे पहनती हैं, कुछ धोती – ब्लाउज पहने भी मिल जाएंगी। यहां की अधिकांश महिलाओं के पास लंबे कोट जैसे लबादे होते हैं जो उन्हीं के द्वारा भेड़ की ऊन से बनाए गए होते हैं। इन्हें यहां पुरुष भी पहने हुए दिखाई दे जाएंगे,वे बुशहरी गोल टोपी पहनते हैं । महिलाएं सिर पर चटक रंगों के ‘ढांटू’ लगाए होती हैं।

यहां की महिलाओं की नाक में ठुड्डियों तक को छूती हुई लंबी – लंबी बुलोकें चमकती हैं। उनके गले में चांदी के सिक्कों के हार या मालाएं होती है और कान मुर्कियों से भरी होते हैं।

सड़कों से दूर बसे गांवों में भेड़ की ऊन के बुने कपड़े ही पहने जाते हैं और लोग ज्यादातर ऊन के जूते पहनते हैं।

रवाईं क्षेत्र में दुर्योधन देवता के मंदिर गांव में प्राय: ऊंचाई पर और पूरी तरह लकड़ी के बने होते हैं। मंदिर के सामने चौपाल होती है।इन मंदिरों में दुर्योधन देवता की अष्ट धातु की प्रतिमा है और यह मंदिर कभी-कभी या विशेष अवसरों पर ही दर्शनों के लिए खुलते हैं।

महाभारतकालीन संस्कृति इस इलाके में आज भी किस तरह रची-बसी है यह जानना भी दिलचस्प है। रवाईं क्षेत्र से ही लगा हुआ हिमाचल प्रदेश का सीमावर्ती भाग है। हिमाचल प्रदेश के इस मांझीवन भाग वाले इलाके में अर्जुन की पूजा होती है। अर्जुन इस इलाके के लोक देवता हैं।

मांझीवन के इस भाग में हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाके मिलते हैं और यहां पर इन सभी स्थानों के भेड़पालक अपनी भेड़ों के झुंड को चराने के लिए लाते हैं। इन भेड़पालकों के बीच में एक दूसरे की भेड़ें चुराने पर आपस में झगड़े शुरू हो जाते हैं। रोचक बात यह है कि यह झगड़े अर्जुनपक्ष और दुर्योधनपक्ष में बदल जाते हैं। प्राचीन संस्कृति का प्रभाव आज भी है कि कर्णक्षेत्र में निवास करने वाले भेड़पालक ऐसे में स्वत: ही दुर्योधन पक्ष के भेड़पालकों के साथ होते हैं और उनके साथ अर्जुनपक्ष वाले भेड़पालकों से लड़ते हैं।

प्राचीन संस्कृति की एक और विशेषता इस रवाईं क्षेत्र में देखने को मिलती है। यहां किसी को आदर देने के लिए ‘मामटी’ यानी मामा जी कहना बहुत सम्मानजनक संबोधन होता है। रवाईं क्षेत्र‌ में दुर्योधन की पूजा की जाती है और दुर्योधन के मामा शकुनि थे। दुर्योधन के द्वारा अपने मामा शकुनी को कितना आदर दिया जाता था उसी से इस क्षेत्र में अपने से बड़े किसी भी अनजान व्यक्ति को भाई जी अथवा अंकल जी के स्थान पर ‘मामटी’कहने पर वह अवश्य बहुत प्रसन्न होता है।

महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र के इलाके में हुआ था जो इस स्थान से बहुत अधिक दूर नहीं है। यहां के लोग मानते हैं कि वे लोग महाभारत के युद्ध में कौरव पक्ष की ओर से लड़े थे।

*** क‌‌र्ण का मंदिर —-

इस इलाके में दुर्योधन के मित्र अंगराज कर्ण का एकमात्र मंदिर देवरा नामक गांव में स्थित है। लकड़ी से निर्मित कर्ण का यह मंदिर काफी बड़ा मंदिर है और दुर्योधन के मंदिर की शैली में ही बना हुआ है। मंदिर के दरवाजे पर पुराने समय से सैकड़ों की संख्या में चांदी, तांबे आदि धातुओं के सिक्के और सूर्य आदि के चिन्ह कीलों से ठोके हुए हैं।

रवाईं अंचल में दुर्योधन और कर्ण की पूजा करने की परंपरा कितनी पुरानी है यह तो नहीं कहा जा सकता और यह बताया जा सकना भी कठिन है कि मंदिर प्राचीन है या उस मंदिर में बैठी हुई प्रतिमा। लेकिन जनश्रुतियों को न मानकर प्राचीन उल्लेखों के अनुसार लगभग 2000 वर्ष पूर्व रवाईं के पंचगाई पट्टी में दुर्योधन की पूजा की जाती थी। इस क्षेत्र में प्राचीन काल में यक्षों की पूजा करने की प्रथा रही है। भगवान शिव के घंटाकर्ण, मणिभद्र, विनायक, महाकाल आदि यक्ष अनुचर रहे हैं। विद्वानों ने दुर्योधन को भी यक्ष मानने की पुष्टी की है। यहां के ‘जखोल’ नामक स्थान पर दुर्योधन का प्राचीन मंदिर है। यक्ष के अपभ्रंश से जख बना है। खोल का अर्थ होता है स्थान अर्थात जख+ खोल मिलकर बना जखोल।

इस पर्वतांचल में आज भी पांडवों के साथ दुर्योधन और उसके मित्र कर्ण की पूजा बड़ी श्रद्धापूर्वक की जाती है।

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