_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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भारतीय सनातन संस्कृति को मानने वाले लोगों के मन मस्तिष्क और आत्मा में रचा बसा है, विश्व का अद्वितीय और विशिष्ट महापर्व कुंभ मेला। महापर्व कुंभ दुनिया का सबसे पुराना, बड़ा और लंबे समय तक चलने वाला आयोजन होता है। लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की भागीदारी वाले इस आयोजन की पौराणिक अंतर्कथा दैवीय संदर्भों वाली है।विद्वान और मनीषी लोग इसकी वास्तविकता पर जाने के बजाय इसके विवरणों में छुपे संकेतों को अधिक महत्व देते हैं।

बिना किसी प्रचार, अभियान, घोषणा और निमंत्रण के लाखों-करोड़ों तीर्थयात्री इस महापर्व में सामूहिक रूप से हिस्सा लेते हैं, सामूहिक रूप से स्नान करते हैं और अपने को धन्य मानते हैं।

लाखों करोड़ों की संख्या में आने वाले श्रद्धालु जनों के लिए आस्था, विश्वास, पुण्यभाव, तीर्थ स्नान और साधु-संतों के स्पर्श से धन्य हुई इस धरती का स्पर्श ही पर्याप्त होता है। उनका मानना है महापर्व कुंभ के समय इस तीर्थ स्थान में स्नान करने से सारे पाप दूर हो जाते हैं और मनुष्य जीवन मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।

आवागमन, संपर्क और संचार माध्यमों के न होते हुए भी महापर्व कुंभ मेले का आयोजन अनादि काल से भारतीय जनमानस के मन मस्तिष्क को मानसिक और आध्यात्मिक तृप्ति प्रदान करता रहा है। पश्चिमी संस्कृति की सारी मान्यताएं और भोगवाद इस विराट महापर्व की महत्ता के आगे थोथे प्रतीत होते हैं। महापर्व कुंभ परंपराओं की विराटता का प्रतीक और स्नान पर्वों का गुरु है। आज के भौतिक युग में भी महापर्व कुंभ के प्रति श्रद्धा यात्रा अनवरत जारी है। राष्ट्र, भाषा, जाति, वेशभूषा, प्रांतीयता और ऊंच-नीच के भेदभाव को त्याग कर लाखों-करोड़ों लोग महापर्व कुंभ मेले में जुटते हैं।

हरिद्वार में आयोजित होने वाले महापर्व कुंभ में मनुष्य के लिए जीवन का अभिषेक अमृत से करने का अवसर होता है। बारह वर्षों के अंतराल पर ऐसा अवसर आता है। महापर्व कुंभ पर हरिद्वार में विराट मेला लगता है। देश के कोने कोने से लोग इसमें पहुंचते हैं।

करोड़ों लोगों की महाआस्था से जुड़े इस पर्व में साधु, सन्यासियों तथा तपस्वियों के साथ युवा वृद्ध पुरुष महिलाएं एवं बच्चे तक अध्यात्म के इस अमृत सागर में डुबकी लगाकर अपनी आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। विदेशी मेहमान भी बड़ी संख्या में आते हैं, इसलिए यह कहना न होगा कि यह महापर्व कुंभ का आयोजन एक ऐसी विश्वव्यापी, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक घटना होती है जिसमें हर श्रद्धालु स्नान के माध्यम से अपने जीवन में सद्गति पाने का द्वार खोलने को लालायित रहता है।

विश्व में कोई भी इतना बड़ा राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक संगठन नहीं है, जो लाखों करोड़ों की संख्या में लोगों को एक साथ जोड़ने एवं उनके मध्य चहुंमुखी अनुशासन बनाए रखने के प्रति आश्वस्त हो सकता हो। यह तो महापर्व कुंभ का आयोजन ही है जिसमें श्रद्धालु अपनी आत्मा की आवाज को सुनकर एवं स्नान से जुड़े पारलौकिक विश्वास की परंपरा का निर्वहन करते हुए महापर्व कुंभ के स्थान पर पूर्ण अनुशासन के साथ एकत्रित होते हैं। इसलिए कुंभ का यह महापर्व भारत की इस धर्म परायण संस्कृति की उच्चता को ही प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि देश की सामाजिक व सांस्कृतिक विभिनताओं के साथ में अनेक समुदायों के बीच धार्मिक व आध्यात्मिक संवाद की परंपरा का अग्रदूत भी बनता है।

कुंभ महापर्व के आयोजन में हरिद्वार में एक लघु भारत बस जाता है। जाति, भाषा, प्रांत व अन्य मत मतांतरों को भुलाकर लोग अनेकता में एकता का जो प्रमाण प्रस्तुत करते हैं वह दुनिया के इतिहास में बेमिसाल होता है और यह हजारों वर्षों से चले आ रहे इस महापर्व मेले का मूल आधार भी है।

कुंभ महापर्व भारतीय संस्कृति की सनातन परंपरा रुढ मान्यता नहीं है जिसे अंधविश्वास कहकर झुठलाया जा सके। श्रद्धालु जन आस्था का आधार लेकर एकता के अपूर्व सूत्र में बंधकर अमृत तत्व प्राप्त करने के लिए कुंभ महापर्व के स्नान के लिए जुटते हैं। इसके लिए उन्हें कोई निमंत्रण नहीं भेजता फिर भी करोड़ों श्रद्धालु जन अमृत की खोज में उमड़ आते हैं।

कुंभ महापर्व का आयोजन संपूर्ण भारत के लिए आकर्षण का केंद्र होता है। महापर्व के आकर्षण और गंगा की श्रद्धा से कोई अछूता नहीं है। नर-नारी, आबाल-वृद्ध, धनी-निर्धन सभी चुंबकीय आकर्षण की भांति गंगा तट पर स्नान करने के लिए हरिद्वार की ओर खींचे चले आते हैं। सभी महापर्व में स्नान का पुण्य प्राप्त करने को उत्सुक रहते हैं। इस अवसर पर उनके लिए हरिद्वार आगमन का कोई कष्ट मायने नहीं रखता। सैकड़ों हजारों किलोमीटर दूर से यात्रा करके श्रद्धालु तीर्थयात्री हरिद्वार पहुंचते हैं और इस पुण्य भूमि पर कदम रखते ही वह रोमांच से भर उठते हैं। श्रद्धालुओं का यह रोमांच महापर्व के इस अवसर पर केवल गंगा स्नान कर अमृत लाभ प्राप्त करने का ही नहीं है, अपितु इस अवसर पर हरिद्वार में आए दुर्लभ संतों के दर्शनों का भी होता है।

भारत देश का ऐसा कोई भी प्रांत नहीं जहां से श्रद्धालु तीर्थयात्री हरिद्वार न पहुंचते हो। हरिद्वार के आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश हिमाचल प्रदेश से बहुतायत की संख्या श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचते हैं। अन्य राज्यों गुजरात, बिहार, बंगाल, आसाम, महाराष्ट्र आदि प्रांतों से भी भारी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इतना ही नहीं विदेशी श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को भी महापर्व कुंभ आकर्षित करता है।वे भी भारतीय संस्कृति व इसकी विराट परंपराओं के आगे नतमस्तक होते हैं। बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक भारत की पारंपरिक वेशभूषा पहने गंगा स्नान की सुखद अनुभूति प्राप्त करने के लिए कुंभ महापर्व में पहुंचते हैं। कुंभ महापर्व ने भारतीयों को ही नहीं विदेशियों को भी मंत्रमुग्ध किया है।

हरिद्वार नगरी हमेशा ही तीर्थ यात्रियों व पर्यटकों की चहल-पहल से भरी रहती है लेकिन कुंभ महापर्व के अवसर पर लाखों-करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु रेलगाड़ियों, बसों और अन्य वाहनों से यहां पहुंचते हैं। जो नहीं जा पाते हैं वे भी कम से कम मानसिक रूप से तो जा ही रहे होते हैं और हरिद्वार के कुंभ महापर्व की चर्चा कर रहे होते हैं।

महापर्व कुंभ के अवसर पर दूरदराज के क्षेत्रों से हरिद्वार पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के चेहरे पर कोई थकान नहीं होती। उनके लिए यात्रा का कष्ट भी कोई मायने नहीं रखता। उन्हें रेल या बस में बैठने की जगह मिली अथवा नहीं इसका भी कोई महत्व नहीं होता। कुंभ महापर्व स्नान के पुण्य के समक्ष सभी कष्ट गौन हो जाते हैं। महापर्व कुंभ स्नान के पुण्य में भागीदारी के लिए सभी वर्गों के लोग यहां पहुंचते हैं। अपने सामान व कपड़ों की पोटली सिर पर रखे या बगल में दबाए गंगा जी की और बढे चले जाते हैं। उन्हें कोई चिंता नहीं होती कि ठहरने के लिए कोई स्थान मिलेगा अथवा नहीं, भोजन की भी उचित व्यवस्था होगी अथवा नहीं। गंगा के तट पर धरती पर ही अपना बिछौना बिछाकर और घर से अपने साथ लाए गए चना-चबेना को खा कर पेट भर जाने से ही श्रद्धालु आनंद से भर जाता है ।

कुंभ महापर्व से ज्यादा व्यवस्थित और संगठित कोई आयोजन हो ही नहीं सकता। क्योंकि इसमें लोगों को बुलाने के लिए कोई प्रचार विज्ञापन नहीं किया जाता। पंचाग या कैलेंडर में छपी तिथियां देखकर लोग बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने आप पहुंच जाते हैं। बुलाने के लिए नहीं बल्कि ज्यादा संख्या में श्रद्धालु न पहुंचे या आयोजन स्थल पर न रुकें इसके लिए प्रबंध करने पड़ते हैं।

जो श्रद्धालु आते हैं वह गजब का आत्मानुशासन लेकर पहुंचते हैं, क्योंकि इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर पिछले कुछ दशकों में शायद ही कभी कोई बड़ी दुर्घटना घटी हो। दुर्घटना की जांच रपटें बताती है कि इसका कारण यात्रियों का बेकाबू हो जाना नहीं था, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने में बरता गया अति उत्साह और लापरवाही का मिलाजुला विस्फोट ही था।

सैकड़ों वर्षों से बिना किसी निमंत्रण और सामूहिक व्यवस्था के एक दूसरे से अपरिचित लाखों-करोड़ों लोग दूर-दूर से खिंच कर कुंभ महापर्व की निश्चित तिथि पर हरिद्वार एकत्रित हो जाते हैं। लंबे समय तक यहां रहते हैं, साधु-संतो के दर्शन करते हैं, कथा-प्रवचनों में ज्ञान-लाभ प्राप्त करते हैं, महापर्व की निश्चित तिथि पर गंगा स्नान करते हैं और बिना किसी व्यवस्था या दुर्घटना के अपने-अपने स्थानों को वापस लौट जाते हैं।

कुंभ महापर्व के मेले की विशालता, व्यवस्था एवं स्वयंस्फूर्तता से पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वान चकित होते हैं।

महापर्व कुंभ दरअसल भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। देश के हर क्षेत्र हर कोने से यात्री यहां आते हैं। क्षेत्रों और पंथों की बहुरंगी अनेकता, रहन-सहन की विभिन्नता और ऐसी कितनी ही बातों के बावजूद वह अपने को एक ही संस्कृति के अंग के रूप में अनुभव करते हैं।

कुंभ महापर्व मेले के कितने ही आयामों के रूप अब बदल गए हैं। आज के समय में श्रद्धालु रेलगाड़ी, बस या अन्य मोटर वाहन में आते हैं और शीघ्र लौट जाते हैं। महापर्व का वह रंग अब नहीं रह गया जब पुराने समय में लाखों लोग रथों, बैल गाड़ियों, घोड़ा गाड़ियों वगैरह में लंबी यात्राएं करके सह परिवार कुंभ मेले में पहुंचते थे और लंबे समय तक यहां रहते थे। साधु संतों से ब्रह्म ज्ञान और दुनियादारी का ज्ञान अर्जित करने के साथ सत्संग-सुधा का पान करते थे। मेले में लगने वाले खेल तमाशों से मन बहलाते थे। इस अवसर पर नई-नई बातें देखते और सीखते थे। श्रद्धालु तीर्थयात्री अधिक अनुभव प्राप्त करके, अधिक जागरूक होकर और अधिक परिपक्व होकर अपने घर और स्थान को लौटते थे। तन-मन और धन सभी से सम‌द्ध होकर। कुंभ महापर्व अपने आप में संपूर्ण है, आखिर कुंभ (घट) को पूर्णता का प्रतीक जो माना गया है और कुंभ से छलकी अमृत की बूंदे उस अनुभव के रूप में होती हैं जो श्रद्धालु तीर्थयात्री महापर्व कुंभ के मेले से लेकर लौटता है।

जीवन को सत्यं शिवं सुंदरं की ओर अग्रसर करने का मूलमंत्र जो भारत की परंपरा का मूल आधार है और उसके घट-घट में व्याप्त है, जिससे यह भारत भूमि प्रदीप्त, ज्योतित और ऊर्जावान है।

कुंभ महापर्व हमारी भारतीय संस्कृति की निष्ठा, इसकी चिंतनधारा और हमारे जनमानस की महानता की विराटता और हमारी शाश्वत सांस्कृति की गौरवमयी परंपरा की अमूल्य धरोहर है। लेकिन आज के आधुनिक समय के साथ-साथ हमारी आस्था बदलती जा रही हैं। जिससे महापर्व कुंभ मेले के स्वरूप में भी परिवर्तन आता जा रहा है। आज के समय में आधुनिक परिवेश और पाश्चात्य सभ्यता ने हमारी धार्मिक अभिरुचियों को भी बदल दिया है।

कुछ दशक पहले तक की बात है जब कुंभ स्नान या किसी तीर्थ स्थान से लौटे तीर्थयात्री की चरण रज माथे पर लगा कर तीर्थ स्नान का पुण्य लाभ पाने की कल्पना कर ली जाती थी। उस समय कुंभ स्नान करके लौटे श्रद्धालु तीर्थयात्री अपने पूरे गांव को भोजन कराते थे तथा अपने घर पर भी पूजा कराते थे तथा दान दक्षिणा देते थे। इस प्रकार के कार्य हमारे संस्कारों का परिष्कार करते थे और अन्य लोगों को भी ऐसे ही सत्कर्म करने की प्रेरणा देते थे। लेकिन आज के आधुनिक समय में आवागमन के साधन और सुविधाएं बढ़ जाने और मारुति संस्कृति ने इस प्रकार की तीर्थयात्राओं को मात्र पर्यटन में बदल कर रख दिया है। उस समय श्रद्धालु कई कई दिनों तक दुर्गम पैदल यात्राएं करके तीर्थों पर पुण्य लाभ प्राप्त करते थे लेकिन आज के समय में मात्र पर्यटन के उद्देश्य से लोग इन तीर्थ स्थानों को देखने भर के लिए जाते हैं।

भले ही आज सरकारी व्यवस्थाओं और प्रशासनिक सुविधाओं के कारण गंगा के पावन तट पर स्नान, पूजा, वंदना करना आसान हो गया है लेकिन हमारी संस्कृति का वह पारंपरिक स्वरूप और पहचान सुविधाओं के अंबार में खो गई है जो हमारे मन मस्तिष्क को एक सूत्र में बांधे रखती थी।

आज आवश्यकता है इन महान पर्वों के सांस्कृतिक स्वरुप के संरक्षण की, इस महान पर्व के पौराणिक महत्व तथा इसके मूल तत्वों की पहचान के संरक्षण की, इस महान पर्व के गौरव और गरिमा के संरक्षण की जिससे हमारी आने वाली भावी पीढ़ियां इसके पौराणिक स्वरूप और इसके मूल उद्देश्यों को आत्मसात कर सकें तभी इन महान पर्वों की सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।

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