__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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हिन्दी की खड़ी बोली मुज़फ्फरनगर की पहचान है

गंगा-यमुना के इसी भूखंड में राष्ट्रभाषा हिंदी का जन्म हुआ। यह भूमि हिन्दी के भाषायी विकास की साक्षी रही है।

गंगा-यमुना के दोआब की भूमि के यह ठेठ उत्तरी इलाके मुजफ्फरनगर,मेरठ, सहारनपुर सहित सारे पश्चिमी अंचल में खड़ी हिंदी भाषा इस्तेमाल होती है।

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कौरवी भाषा

गंगा यमुना के दोआब – पाश्चिमी उत्तर प्रदेश की कौरवी बोली –

यहां की बोलचाल की भाषा ‘कौरवी’ कहलाती है। हिंदी का मूल प्राकृत रूप यही है। कौरवी बोली ही वर्तमान में खड़ी बोली के नाम से पूरे देश की राष्ट्रभाषा के रूप में ख्याति प्राप्त है।

महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने इस संबंध में बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया है।

गंगा यमुना की धरती पाश्चिमी उत्तर प्रदेश में कौरवी भाषा के प्रति भी लोगो में खासा लगाव है। संभ्रात लोग भी इसका प्रयोग करते हैं।

मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह विश्व विद्यालय और उससे संबद्ध कॉलेजों में तो बाकायदा कौरवी लोक साहित्य के नाम से एक विषय हिंदी के लिए अनिवार्य कर दिया गया है।

विश्वविद्यालय समय के साथ छिन्न-भिन्न हुई कौरवी बोली की पांडुलिपियां एकत्र करके उन्हें प्रामाणिक रूप से तैयार करने के बाद उन्हे स्कैन करके इन्टरनेट पर अपलोड कराएगा।

क्षेत्रीय भाषा के रूप में कौरवी बोली का कोर्स की तैयार कराएगा ताकि यंहा की संस्कृति और अधिक समृद्ध हो सके।

साहित्यिक भाषाएं लोक बोली से ही रस ग्रहण करती हैं। लोक साहित्य जन-जन की भावनाओं को अभिव्यक्त करता है।

कौरवी की एक विशिष्टता यह है कि इसमें कुछ शब्दों पर बहुत बल दिया जाता है। आमतौर पर -ण और -द्वित का प्रयोग बहुत होता है। इनका प्रयोग संभ्रांत लोगों की आम बोलचाल में भी झलकता है। बाजार ने भी कौरवी बोली के महत्व को समझा उसने भी वेस्ट की भाषा को अपना लिया। मॉलीवुड फिल्मों का पूरा कारोबार ही कौरवी बोली के दम पर ही टिका हुआ है। विज्ञापनों, फिल्मों और टेलिविजन मे भी कौरवी बोली में कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। हमारे यहां कहा जाता है कि कोस-कोस पर वाणी बदले। लेकिन इस इलाके में कौरवी बोली के अंदाज में अधिक अंतर नहीं दिखाई देता।

उत्तर प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा मेरठ के चौ.चरणसिंह विश्वविद्यालय में – उत्कृष्ट अध्ययन केन्द्र स्थापित किया गया है। इस केन्द्र के द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कौरवी बोली की पांडुलिपियों के संक्लन, पाठ संपादन, पाठ्यक्रम निर्माण और प्रकाशन पर काम शुरू हो चुका है।

इस परियोजना का उद्ददेश्य कौरवी बोली की लगभग सन 1950-60 से अधिक समय पुरानी पांडुलिपियो को खोज कर उनका पाठ संपादन कर पाठ्यक्रम निर्माण कर उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करना है।
इस परियोजना में मुजफ्फरनगर,मेरठ,सहारनपुर,बागपत, गाजियाबाद,हापुड़, शामली, बुलंदशहर,नोएडा,बिजनौर आदि जनपदों को शामिल किया गया है।

वर्तमान में भी बहुत सी पांडुलिपियां मुजफ्फरनगर परिक्षेत्र के गांवों, कस्बों के घरों में जर्जर अवस्था में पड़ी हुई हैं।जिन्हें खोज कर उनका उचित रख रखाव किया जाना आवश्यक है।

इन पांडुलिपियों के संरक्षण और प्रकाशन के बाद इस क्षेत्र के छात्र-छात्राएं अपनी स्थानीय बोली के साहित्य से परिचित होंगे तथा उन्हें अपनी लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों कथा संस्कृति एवं सभ्यता की बानगी पांडुलिपियों से मिलेगी।

इस कार्य में चौ. घीसा राम, संत गंगा दास, प्रीतम दास,संत शंकर दास, सोहनदास आदि की पांडुलिपियों को खोज कर उनका संकलन किया गया है।

इन पांडुलिपियों का अध्ययन कर कौरवी के खास शब्दों को इंगित किया जा रहा है ताकि कौरवी शब्दकोश भी बनाया जा सके।

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हिंदी शब्दकोश की तर्ज पर कौरवी शब्दकोश पुस्तक रूप में बाजार में आ गया है।

डॉ. कृष्ण चंद्र शर्मा, डॉ. हरद्वारी लाल शर्मा और
डॉ. चंद्रपाल सिंह का मिलाजुला प्रयास थोड़ा रंग लाया और कौरवी शब्दों को संकलित किया गया। बाद में इस संकलन को कौरवी शब्दकोष के रूप में तैयार करने और इसे पुस्तकाकार रूप देने का श्रेय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. नवीन चंद्र लोहनी हो जाता है।
पुस्तकरूपी शब्दकोश में भाषा पर नहीं बोली पर अधिक बल दिया गया है। यह कौरवी शब्दकोश यहां के आम लोगों के साथ ही छात्रो और शोधार्थियों को अपनी भाषा के साथ मूल संस्कृति से परिचित कराता है।

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