__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
_____________________________________

जैन धर्म के बारे में कहा जाता है कि यह सार्वभौम धर्म है इस धर्म को किसी व्यक्ति विशेष ने नहीं चलाया।

जैन धर्म अनादि काल से चला आ रहा है। भगवान आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर ने जैन धर्म के अमर सिद्धांतों का व्यापक रूप से प्रचार किया। यह नहीं कि किसी धर्म विशेष को नए रूप में चलाया।

तीर्थंकरों के तप और समवशरण से धन्य है हस्तिनापुर

जैन धर्म के अनुसार तीर्थंकरों और तीर्थ दोनों का विशेष महत्व है।

हस्तिनापुर तीर्थंकरों की भूमि है। जैन धर्मानुयायियों के लिए हस्तिनापुर अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ क्षेत्र है।

जैन धर्म के अनुसार तीर्थंकर का पद परम प्रभु सत्ता प्राप्ति का पद है- ‘जो लोक कल्याण और आत्म कल्याण को  एकाकार कर दे, जो सेवा, सुश्रवा, वैराग्य के धरातल से जुड़कर आध्यात्मिक हो जाए और जो तृष्णा व वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ले वही तीर्थंकर है।’ तीर्थंकर के आगे स्वर्ग के इंद्र और धरती के चक्रवर्ती भी नतमस्तक होते हैं।

भगवान ऋषभदेव को मुनि बनने के बाद पहली बार आहार हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस ने दिया था।

इसी स्थान पर आदिनाथ भगवान दीक्षा लेने के चार सौ दिनों बाद वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन आए थे। इस अवधि के दौरान उन्होंने चार सौ दिनों के लिए अन्न – जल सब कुछ त्याग दिया था। लोग बाग दूर-दूर से उनके दर्शनों के लिए जाते थे लेकिन वह कुछ ग्रहण नहीं करते थे। राजकुमार श्रेयांश को जब इस बात का ज्ञान हुआ तो उन्हें अपने पूर्वजों की अन्न- जल त्यागने की प्रथा का स्मरण हो आया। उन्होंने आदिनाथ प्रभु से व्रत के समापन के लिए इक्षु रस ग्रहण करने की प्रार्थना की जिसे भगवान आदिनाथ में स्वीकार किया। बाद में इस दिन को अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाने लगा। केवल ज्ञान के बाद ऋषभदेव का समवशरण यहां कई बार आया।

जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ, सत्रहवें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ और अट्ठारहवें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ इन तीनों तीर्थंकरों का जन्म  हस्तिनापुर में ही हुआ । यहां सहेतुक या सहस्त्राभ्र वन में उन्होंने दीक्षा लेकर केवल ज्ञान प्राप्त किया। इस प्रकार तीनों तीर्थंकरों के  गर्भ,जन्म,दीक्षा,और केवल ज्ञान चारों कल्याणक यहां मनाए गए। इस प्रकार हस्तिनापुर में 12 कल्याणक मनाए गए।

इस गौरवमय भूमि पर –

उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ का समवशरण भी हस्तिनापुर में पधारा था।

बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रत स्वामी का पदार्पण भी हस्तिनापुर की भूमि पर हुआ था।

तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी दीक्षा के बाद यहां पधारे, उन्होंने वरदत्त के घर किया था। केवल ज्ञान के बाद भी वे यहां आए। अहिच्क्षेत्र में केवल ज्ञान के बाद हस्तिनापुर के राजा स्वयंभू ने उनका उपदेश सुनकर मुनि दीक्षा ली थी और वे भगवान के प्रथम गणधर बने थे। उनकी पुत्री प्रभावती ने  अर्मिका दीक्षा ली थी।

अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का भी यहां आगमन हुआ और इन्होंने यहां विहार कर इस क्षेत्र को धर्मोपदेश दिया था।  उनकी आराधना स्थली होने और यहां विचरने का सौभाग्य भी हस्तिनापुर को प्राप्त है।

२२ वें तीर्थंकर श्री अरिष्ठनेमी नेमिनाथ के जीव ने इस भव से दो भव पूर्व यहीं पर दीक्षा लेकर बीस स्थानक तप की आराधना करके तीर्थंकर नाम कर्म उपार्जन करके निकाचित बन्ध किया था।

*****

हस्तिनापुर चक्रवर्तियों की भी भूमि है। जैन परंपरा के अनुसार भरत क्षेत्र में   बारह चक्रवर्ती हुए के छह चक्रवर्तियों की राजधानी भी रहा है हस्तिनापुर। यहां जन्मे तीनों तीर्थंकर भी चक्रवर्ती थे। इस प्रकार २४ तीर्थंकरों के काल में हुए १२ चक्रवर्तियों में से चार यहीं हुए। तीनों तीर्थंकरों के नाम पर यहां एक-एक स्तूप बनवाया गया।

चौथे चक्रवर्ती राजा सनत कुमार का जन्म हस्तिनापुर में ही हुआ था और उन्होंने हस्तिनापुर को ही अपनी राजधानी बनाया। यह चक्रवर्ती पंद्रहवें  तीर्थंकर धर्मनाथ के बाद हुए थे। बाद में उन्होंने राजसत्ता को त्याग कर दीक्षा ले ली थी।

पांचवे चक्रवर्ती राजा शांतिनाथ का जन्म भी हस्तिनापुर में हुआ था । शांतिनाथ भी भरत क्षेत्र के छह खंडों पर विजय प्राप्त करके चक्रवर्ती राजा बने थे इन्होंने भी हस्तिनापुर को ही अपनी राजधानी  बनाया।  सुख वैभव का त्याग करके जिन की दीक्षा ग्रहण की और केवल ज्ञान पाकर सोलहवें तीर्थंकर बने।

छठे चक्रवर्ती राजा कुंथुनाथ नाथ का जन्म भी हस्तिनापुर में हुआ। इनके पिता का नाम शूर और माता का नाम श्रीदेवी था। इनके पिता शूर ने हस्तिनापुर की राज सत्ता को प्राप्त किया बाद में अपने पुत्र कुंथुनाथ को राज्य देकर दीक्षा ग्रहण की। कुंठुनाथ में भी अपने पिता की परंपरा को अपनाते हुए राजपाट को त्याग कर केवल ज्ञान की दीक्षा ली और सत्रहवें तीर्थंकर बने।

सातवें चक्रवर्ती राजा अरहनाथ का जन्म भी हस्तिनापुर में ही हुआ I भारतवर्ष पर राज सुख प्राप्त कर वैराग्य को प्राप्त हुए और अट्ठारहवें तीर्थंकर बने।

आठवें चक्रवर्ती राजा शुभूम का जन्म स्थल भी हस्तिनापुर है। इन्होंने छह खंडों में विजय प्राप्त की। सातवें खंड की विजय प्राप्त करने की चेष्टा में इनका प्राणांत हो गया।

नवें चक्रवर्ती राजा महापद्म ने भी हस्तिनापुर का राज्य सुख प्राप्त किया। बाद में उन्होंने राज्यसत्ता को त्याग कर दीक्षा ग्रहण कर ली। पौराणिक गाथा के अनुसार राजा पदम के चार मंत्रियों बली, नमूची, प्रहलाद और बृहस्पति ने अपने पिछले द्वेष के कारण आचार्य अकम्पन के संघ के ७०० मुनियों पर घोर उपसर्ग किया। यहां पदम के दूसरे भाई मुनि विष्णु कुमार ने प्राप्त वैक्रयिक ऋद्धि के द्वारा वामन ब्राह्मण का रूप धारण कर ७०० मुनियों पर छाए घोर उपसर्ग का यही निवारण किया था । वह दिन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का था। नगर वासियों ने सोमी तथा खीर द्वारा मुनियों को आहार दिया। इस दिन मुनियों की रक्षा होने के कारण ‘रक्षाबंधन’  पर्व की शुरुआत हुई।

इस प्रकार यह भूमि  भरत क्षेत्र के छह चक्रवर्ती राजाओं जन्मस्थली तथा राजधानी भी रही है। इन छह चक्रवर्ती राजाओं में तीन जैन तीर्थंकर बने।

जैन मान्यता के अनुसार चक्रवर्ती शुभूम को छोड़कर शेष सभी चक्रवर्ती राजा स्वर्ग में गए और मोक्ष मिला।

यहां अनेक ऐतिहासिक घटनाएं घटी हैं। यहां के नरेश गुरुदत्त ने मुनि दीक्षा लेकर एक मील का उपसर्ग सहा और केवल ज्ञान प्राप्त किया।

हस्तिनापुर भारत के गौरव स्वरूप पांडवों – कौरव की जन्मस्थली एवं क्रीड़ा स्थल भी है । एक बार मुनि दमदत्त यहां एक उद्यान में ठहरे। अपनी दुष्ट प्रकृति के कारण कौरवों ने उनकी निंदा की और पत्थर बरसाए। थी थोड़ी देर बाद पांडवों ने उनकी वंदना की और स्तुति कर उपसर्ग दूर किया। ध्यानलीन मुनि को उसी समय केवल ज्ञान हो गया। देवों ने आकर उत्सव मनाया।

कुरुक्षेत्र के मैदान में पांडवों और कौरवों के बीच घोर युद्ध हुआ I जैन मतानुसार युद्ध के बाद अंतिम समय में पांचो पांडव मुनि बन कर वन को चले गए तथा घोर तपस्या व उपसर्ग सहन युधिष्ठिर भीम अर्जुन को मोक्ष प्राप्त हुआ तथा नकुल व सहदेव सर्वार्थ सिद्धि विमान में देव हुए।

 

पंचकल्याणक

जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक तीर्थंकर के पांच कल्याणक होते हैं – च्यवन( माता के गर्भ में आना), जन्म, दीक्षा, केवल ज्ञान तथा निर्वाण।

तीन तीर्थंकरों सोलहवें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ , सत्रहवें तीर्थंकर कुंथुनाथ, अट्ठारहवें तीर्थंकर अरहनाथ के चार – चार कल्याणक गर्भ, जन्म, दीक्षा और केवल ज्ञान हस्तिनापुर में हुए। इस प्रकार तीर्थ नगरी हस्तिनापुर की भूमि को 12  कल्याणक होने का गौरव भी प्राप्त हुआ। देश के संभवतः किसी एक अन्य क्षेत्र को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं है कि 3 तीर्थंकरों के इतने कल्याणक किसी एक स्थान पर संपन्न हुए हो।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *