___मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा -यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र____________________

 

 

यहां गंगा -यमुना की इस धरती पर जैन धर्म के सबसे बड़े तीर्थो में एक हस्तिनापुर है।
कई अतिशय क्षेत्र है , नए व पुराने भव्य – विशाल मंदिर  है।

  •    जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को प्रथम आहार गन्ने का रस राजकुमार श्रेयांश ने हस्तिनापुर में ही दिया था। दान के प्रथम प्रवर्तक के रूप में प्रतिष्ठित श्रेयांश ने आहार दान के स्थान पर एक रत्न मय स्तूप बनवाया। केवल ज्ञान के बाद ऋषभदेव का समवशरण यहां कई बार आया जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 3 तीर्थंकरों -१६वें तीर्थंकर शांतिनाथ, १७ वें तीर्थंकर कुंठुनाथ और १८ वें तीर्थंकर अहर नाथ का जन्म हस्तिनापुर में ही हुआ था। यहां के सहस्त्र अभ्र वन में उन्होंने दीक्षा लेकर केवल ज्ञान प्राप्त किया। तीनों तीर्थंकरों के गर्भ, जन्म, दीक्षा व केवल ज्ञान कुल १२ कल्याणक यहां यहां मनाए गए।
  •    जैन धर्म के १९ वे तीर्थंकर भगवान मल्लीनाथ का समवशरण भी यहां आया I
  •   जैन धर्म के २३ वे तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ दीक्षा लेने के बाद यहां पधारे थे। भगवान पार्श्वनाथ केवल ज्ञान के बाद भी यहां आए थे। भगवान पार्श्वनाथ के अहि क्षेत्र में केवल ज्ञान के बाद हस्तिनापुर के राजा स्वयंभू ने उनका उपदेश सुनकर मुनि दीक्षा लेकर भगवान के प्रथम गणधर बने थे। उनकी पुत्री प्रभावती नेअर्मिका दीक्षा ली थी।
  •  २४ वे व अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर भी यहां पधारे थे। उन्होंने यहां विहार कर धर्मोप्देश दिया था।
  •  जैन धर्म के २४  तीर्थंकरों के काल में हुए १२ चक्रवर्तीओं में से ४ यही हुए। यहां जन्मे तीनों तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ, भगवान कुंठुनाथ व भगवान अहरनाथ भी चक्रवर्ती थे। चौथे चक्रवर्ती सनत कुमार ने भी हस्तिनापुर को ही अपनी राजधानी बनाया था।
  • जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ    ऋषभदेव जी का  जन्म अयोध्या में हुआ था। आदिकाल में ऋषभ राजा बने। इन्होंने अनेक प्रकार का योगदान समाज को दिया।
  • एक दिन राजसभा में राजा ऋषभदेव अपूर्व सुंदरी नीलांजना का अद्भुत नृत्य देख रहे थे। नृत्य करते-करते नीलांजना पराकाष्ठा पर पहुंच गई और अकस्मात उसकी वही मृत्यु हो गई। भगवान ऋषभदेव को वैराग्य हो गया। भगवान ऋषभदेव ने भरत का राज्य अभिषेक किया और बाहुबली को युवराज पद पर स्थापित किया।
  • भगवान ऋषभदेव सिद्धार्थ वन में पहुंचे और वटवृक्ष के नीचे बैठकर कठिन तपस्या की। भगवान ऋषभदेव ६ माह बाद आहार को निकले। तब लोगों को जैन साधुओं के भिक्षा नियमों की जानकारी नहीं होती थी।
  •  नगरी नगरी, गांव गांव विचरण कर भगवान ऋषभदेव हस्तिनापुर पहुंचते हैं। जहां श्रेयांश राजकुमार के यहां विधि मिलने पर उन्हें गन्ने के रस का आहार मिलता है। भगवान ऋषभदेव के प्रथम आहार दाता श्रेयांश बने।

 

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शामली जनपद
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अतिशय क्षेत्र- जलालाबाद ( जनपद – शामली )

दिल्ली सहारनपुर मार्ग पर शामली से 22 किलोमीटर दूर

अद्भुत चमत्कारिक अतिशय क्षेत्र जलालाबाद जैन समाज की अटूट आस्था का केंद्र है।

प्राणी मात्र को सुख प्रदान कर दुखों को दूर करने वाला परम शांति का संदेश देता है यह स्थान।
यहां के प्राचीन जैन मंदिर में विराजमान चतुर्थ कालीन
भगवान पार्श्वनाथ की मन को मोह लेने वाली प्रतिमा अपने सभी विराजमान है। भगवान पार्श्वनाथ के चिंतामणि कल्पतरू कामधेनु संकट मोचन विग्रहा नाम यहां मात्र विशेषण नहीं अपितु प्रतिमा के प्रभाव के वाचक बन गए हैं। श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं भगवान पार्श्वनाथ पूर्ण कर देते हैं।

भगवान पार्श्वनाथ की अतिशय पूर्ण चमत्कारी प्रतिमा के दर्शन करने के लिए रोजाना यहां देश के कोने-कोने से अनेकों श्रद्धालु आते हैं और यहां के शांत मनोहारी वातावरण में एकांत चित से प्रभु का स्मरण और दर्शन करते हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को अपार मानसिक शांति का अनुभव होता है।

जलालाबाद कस्बा एक बहुत प्राचीन नगर है। इस नगर का अपना हजारों वर्षों का इतिहास है। यह कई बार उजड़ा , समय-समय पर इसके कई बार नाम बदले गए इन सब के बावजूद आज भी यह कस्बा अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए हैं। इस नगर में जहां आज भी कई राजाओं और मराठों के बनाए हुए मंदिर इस नगर की शोभा बढ़ाते हैं।
वहीं नवाबो द्वारा बनाई गई मस्जिदें और अन्य पुराने स्थान इस नगर की गाथा को कहते हैं।

इस नगर के जैन मंदिर का इतिहास भी यहां अपना विशिष्ट स्थान रखता है। यहां स्थित जैन मंदिर के तहखाने से
23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की काले पाषाण की साले प्ल 4 इंच की एक प्रतिमा मिली। ऐसा माना जाता है कि कभी इस स्थान पर भव्य एवं विशाल दिगंबर जैन मंदिर रहा होगा, किसी काल खंड में समय के प्रभाव से खंडित हो गया।

किसी समय जलालाबाद नगर में सैकड़ों जैन परिवार रहते थे। सन 1910 में यहां पर प्लेग की महामारी फैलने के कारण बहुत जनहानि हुई। यहां से जैन समाज का पलायन हो गया था। प्राचीन इमारत में जैन समाज का एक ही परिवार यहां रहता था। यही जैन परिवार यहां स्थित मंदिर की देखभाल करता था। बताया जाता है कि आसपास के स्थानों के जैन समाज के लोगों की बैठक में प्रतिमा को सहारनपुर ले जाने का निर्णय लिया गया। लेकिन तभी संबंधित जैन समाज के लोगों को स्वप्न आया और सपने में उन्हें अज्ञात धोनी ने सचेत किया कि यदि इस स्थान की मूर्तियों को अन्यत्र स्थान पर ले जाकर स्थापित किया जाएगा तो घोर विपत्ति का सामना करना पड़ेगा। अनिष्ट की आशंका से प्रतिमा को यहां इसी चैताल्य में ही स्थापित करना पड़ा।

सन 1970 में राष्ट्रीय संत दिगंबर जैन मुनि आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज का यहां पदार्पण हुआ। जैन मुनि इतनी प्राचीन प्रतिमा के दर्शन करके आश्चर्यचकित रह गए। आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज ने प्रतिमा को बहुत प्राचीन और अतिशय युक्त बताया। आचार्य श्री उस समय यहां 3 दिन रहे।
उनकी प्रेरणा से समीपवर्ती नगरों के जैन समाज के लोगों में इस क्षेत्र के जीर्णोद्धार की भावना प्रबल हुई किंतु गति धीमी रही।

सन 1983 में वार्षिक रथ यात्रा के अवसर पर वयोवृद्ध
तपस्वी दिगंबर जैन मुनि आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज यहां पधारे। उनकी प्रेरणा से जीर्णोद्धार कार्यों को गति मिली।
इस समय यह एक विशाल एवं भव्य शिखर युक्त दिगंबर जैन मंदिर का रूप धारण कर चुका है। मंदिर में कांच का भरपूर काम किया गया है। राजस्थानी कलाकारों द्वारा मंदिर का मन को प्रभावित करने वाला द्वार बनाया गया है।
मंदिर के अंदर दीवारों पर रंगीन कांच द्वारा दर्शाई गई विभिन्न प्राचीन घटनाएं यहां दर्शन करने के लिए आए श्रद्धालुओं के मन पर अमित छाप छोड़ती हैं।
इस क्षेत्र को अपनी चरण धूल से मां कौशल जी, श्री 108 ज्ञान सागर जी महाराज ने भी पवित्र किया।

आज यह जैन अतिशय क्षेत्र जैन श्रद्धालुओं के लिए एक तीर्थ नगरी बन गया है। देश के कोने-कोने से जैन बंधु यहां अब प्रत्येक समय भगवान पार्श्वनाथ की अतिशयकारी प्रतिमा के दर्शन करने के लिए आते रहते हैं।
प्रत्येक वर्ष यहां वार्षिक भव्य रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है।

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कैराना – ( जनपद शामली )

यहां भव्य जैन मंदिर व जैन बाग स्थित है।

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गंगा जमुना की इस भूमि पर स्थित दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र

कांधला – गंगेरू

शामली – गांव पुरमाफी

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जैन स्थानक – कांधला – ( जनपद – शामली)

कांधला एक चमत्कारी स्थान है जिसके स्मरण व भाव वंदन करने मात्र से दुखों से छुटकारा प्राप्त हो जाता है।

कांधला क्षेत्र में स्थानकवासी जैन समाज के साथ एक
हृदयग्राही घटना जुड़ी हुई है।

आगमों में वर्णन है की विक्रम संवत १७७४ में जैन आचार्य भागचंद महाराज नागौर राजस्थान से चल कर यमुना पार कर उस समय के म्यानदाव प्रदेश में भगवान महावीर के संदेश की प्रभावना बांटते हुए ११ संतो के साथ कांधला नगरी में पहुंचे थे। जिस समय यह सब संत कांधला नगरी में पहुंचे उस समय शाम होने वाली थी। उस समय कांधला नगरी में कोई जैन परिवार नहीं होने के कारण उन संतो के सामने रात को किस स्थान पर ठहरे यह समस्या हो गई। उन संतो को ठहरने के लिए कोई स्थान नहीं मिला। तभी मार्ग में उन संतो को एक वैश्य अग्रवाल मिला। उस वैश्य ने संतो से कहा कि आप सब उसकी दुकान के आगे बने हुए छप्पर में खड़े हो जाइए। थोड़ी देर बाद घर का कार्य निपटाने के बाद मैं आपके पास आऊंगा, तब मैं आप के ठहरने की व्यवस्था कर दूंगा।

घर जाकर वह वैश्य अपने घर के काम काज के बीच उन मुनि जनों के बारे में भूल गया। उधर, सभी मुनि जन पूरी रात उस कड़कड़ाती रात में उस वैश्य की दुकान के आगे बने छप्पर के नीचे खडे रहे। सुबह जब वह वैश्य अपनी दुकान पर आया,तब उसने सभी मुनियों को कमर बांधे खड़ा देखा।
उसने संतो से पूछा कि आप सब इतनी ठंडी रात में अभी तक खड़े हैं। आचार्य प्रवर ने कहा कि आपने हमें केवल खड़े होने की आज्ञा दी थी, इसलिए हम सब अभी तक खड़े हैं। आचार्य ने कहा कि जैन संत दी गई आज्ञा की सीमा में ही रह सकता है। आज्ञा के विरुद्ध काम करना जैन संत के लिए नियम और साधुता के विरुद्ध है।

वह वैश्य उन मुनी जनों के त्याग और उनकी ओजस्वी वाणी को सुनकर आश्चर्यचकित हो गया। उसने पश्चाताप करते हुए जैन संतों से क्षमा मांगी। इसी समय वहां लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई। सभी ने उन संतों से आग्रह किया कि आप सब कुछ दिन हमारे नगर में ही ठहरे। कांधला के दीवान सेठ लक्ष्मी चंद्र ने सभी संतो को अपने महल में ठहराया।
इस दौरान आचार्य श्री के ओजस्वी धर्म प्रवचन सुनकर सेठ लक्ष्मीचंद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना महल संतो को ठहरने के लिए दे दिया। यह भी कहा जाता है कि आचार्य के ओजस्वी प्रवचनों का इतना असर हुआ कि कांधला के तीन सौ वैश्य परिवार स्थानकवासी जैन धर्मानुयायी बन गए।
दीवान सेठ लक्ष्मीचंद का महल जैन स्थानक कहा जाने लगा।
यह जैन स्थानक आज भी महल के रूप में ही है।

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गंगा यमुना की इस भूमि ने हजारों सालों तक न जाने कितनी बार विदेशी बर्बर आक्रमण सहे।

यह विक्रमी संवत १८१६ आसपास का समय था विदेशी बर्बर आक्रमणकारी अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण कर भयंकर बर्बर अत्याचार मचा रखा था।
यहां गंगा यमुना की भूमि पर चारों ओर अराजकता फैली हुई थी। यह समय यहां पर बड़ा उथल पथल का था। उन्हीं दिनों बलोची पठानों की एक सेना पानीपत की तरफ से यमुना पार करके कांधला पहुंची।

कांधला में संयोगवश उस समय पूज्य खेमचंदजी महाराज,
लक्ष्मी चंद जी महाराज, सादाराम जी महाराज यहां के जैन
स्थानक में विराजमान थे। उन्हें अपने ज्ञान बल के द्वारा घटना का पूर्वाभ्यास हुआ। उन्होंने पहले ही दिन, रात्रि के समय उनके पास आए हुए श्रावक वर्ग को सावधान कर दिया कि कुछ समय बाद भयंकर उपद्रव होने वाला है। जिन श्रावकों को मुनी जनों पर श्रद्धा थी और उनका उनकी बातों पर विश्वास था, वे रातों रात कांधला को छोड़ कर दूर चले गए थे।

पांचों जैन मुनि भी मरणान्तिक उपसर्ग काल को जानकर अनशन और संथारा करके ध्यानस्थ मुद्रा में कयोत्सर्ग में लीन हो गए।

इधर प्रातः काल के समय किसी स्थानीय शिकारी की गोली बलोची पठानों की सेना के किसी सैनिक को लग गई। वह घायल पठानी सैनिक अपने सरदार के पास पहुंचा। तो उस पठान बलोची सरदार ने अपने सैनिकों को हिंदुओं का कत्लेआम करने का हुक्म दे दिया। बलोची पठान सैनिक मारकाट मचाते हुए विशाल महल सरीखे जैन स्थानक में भी पहुंच गए। वहां पहुंचकर उन सैनिकों ने जैन मुनियों की विचित्र वेशभूषा देख कर संतो से कड़ककर पूछा कौन हो तुम -जैन मुनि श्री खेमचंद जी महाराज ने प्रसन्न भाव से उत्तर दिया कि भाई हम जैन साधु हैं। उन सैनिकों ने कहा कि हम किसी जैन को नहीं जानते, यह बताओ कि हिंदू हो या मुसलमान। उन संतों के सहज भाव से हिंदू बताए जाने पर क्रूर सैनिकों ने खेमचंद जी महाराज, गोविंद राम जी महाराज और साहब राम जी महाराज का बेरहमी से कत्ल कर दिया। उन सैनिकों ने सादा राम जी महाराज व लक्ष्मी चंद जी महाराज को बंधक बना लिया और अपने साथ ले गए। इन दोनों जैन संतो को कुछ समय के बाद शांति कायम होने पर लोगों ने बड़ी कठिनाइयों के बाद पास के कोताना गांव में जाकर छुड़वाया था।

उसी समय से यह तीनों संत अपने भक्तों की रक्षा के लिए एवं उनके सभी कष्टों को दूर करने के लिए यहां दिव्य रूप से विद्यमान है, और देव बनकर समाज की रक्षा कर रहे हैं। महल जैसे जैन स्थानक के शीर्ष पर उनका देव स्थान एक चबूतरे के रूप में बना हुआ है। यहां पर भाव पूर्वक वंदन करने मात्र से ही सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। अनेक जैन संत प्रतिवर्ष इस स्थान पर एकांत साधना करने आते हैं।

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गांव पुरमाफी – जनपद शामली

शामली से लगभग 12 किलोमीटर दूर गांव पुरमाफी में एक मकान की खुदाई के दौरान एक प्राचीन प्रतिमा मिली। जैन समाज के लोगों को जब इस प्रतिमा के बारे में पता चला
तो जैन समाज के लोगों ने गांव जाकर इस प्रतिमा को देखा।
इसके बाद जैन समाज के लोगों ने प्रतिमा के संबंध में जैन मुनि अरुण सागर जी से चर्चा की। मुनि अरुण सागर जी प्रतिमा के दर्शनों के लिए गांव पुरमाफी गए और इसे अत्यंत चमत्कारिक तथा चतुर्थ शताब्दी की भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा बताया। प्रतिमा की शुद्धि के उपरांत दिगंबर जैन मंदिर, गढ़ी पुख़्ता में स्थापित किया गया। मूर्ति स्थापना के बाद जैन मुनि अरुण सागर जी ने इस मंदिर को अतिशय (चमत्कारिक) क्षेत्र घोषित कर दिया। प्रतिमा की शुद्धि तथा स्थापना के समय घटी चमत्कारिक घटनाओं को लेकर अनेक चर्चाएं हैं।

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बिजनौर
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पारसनाथ का किला – ( बढापुर – बिजनौर )

बढ़ापुर में पारसनाथ के किले के अवशेषों की खुदाई में जैन धर्म से संबंधित तमाम ऐतिहासिक महत्व की चीजें निकली है।

बिजनौर जिले की नगीना तहसील के कस्बा बढ़ापुर से 5 किमी की दूरी पर स्थित पारसनाथ किला अपनी भव्य एवं विशाल इमारतों और कलात्मक जैन मंदिरों के लिए कभी देश भर में सुप्रसिद्ध रहा है। माना जाता है कि इस किले का निर्माण मध्यकाल में हुआ था। इस बात की पुष्टि यहां पर मिलने वाले शिलालेखों से होती है।
इस किले के बारे में अनेक जन श्रुतियां प्रचलित है। एक जन श्रुति के अनुसार पारस नाम के एक राजा ने यह किला बनवाया था। इस स्थान पर हुई खुदाई के दौरान मिलने वाली जैन धर्म से संबंधित खंडित मूर्तियां एवं किले के अवशेष यहां पर विशाल जैन सभ्यता के होने की गवाही देते हैं।

इस स्थान के संबंध में बताया जाता है कि बिजनौर जिले का मौजा काशी वाला यह स्थान पुराने समय में घना जंगल था। सन 1952 तक यहां पर भयानक जंगल था इसलिए यहां तक पहुंचना आसान नहीं था। पंजाब से आए अवकाश प्राप्त जवानों ने यहां जंगल साफ करके इस स्थान को कृषि योग्य बना दिया। प्रशासन की तरफ से भी यहां की जमीन कृषकों को खेती के लिए आवंटित की गई थी। ऊंची नीची भूमि को समतल कर कृषि योग्य बनाने के दौरान यहां हजारों वर्ष पुरानी जैन धर्म से संबंधित मूर्तियां व पत्थर के टीले मिले। इससे यह अनुमान लगाया गया कि इस स्थान पर किसी जैन राजा का राज्य या फिर जैन संस्कृति से जुड़ी बड़ी बस्ती थी।
यहां कई वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में प्राचीन मंदिरों और किले के भग्नावशेष बिखरे पड़े हुए हैं। इन अवशेषों का कोई विधिवत अध्ययन नहीं किया गया है। जो कुछ उत्खनन किया गया है उस उपलब्ध सामग्री के अध्ययन से यह पता चलता है कि प्राचीन समय में यह स्थान जैन धर्म का प्रमुख केंद्र था इसलिए इस स्थान का नाम पारसनाथ पड़ा।
समय-समय पर इस स्थान से जैन मूर्तियां और जैन मंदिरों से संबंधित सामग्री मिलती रही है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि निश्चित ही मध्यकाल में इस स्थान पर एक भव्य एवं कलात्मक जैन मंदिर था। उज्जैन मंदिर के चारों ओर सुदृढ परकोटा बना हुआ था, इसी से इस स्थान को पारसनाथ का किला कहा जाता है।
इस किले के स्थान से मिली मूर्तियां और कुछ अवशेष बिजनौर, धामपुर और नगीना के दिगंबर जैन मंदिरों में भेज दी गई है।
यह स्थान और इसके आसपास के अन्य स्थान जैन धर्म के प्रमुख केंद्र रहे हैं। इस बात के प्रमाण समय-समय पर मिलते रहे हैं। सन 1905 में नहटौर कस्बे के पास तांबे का एक पिटारा निकला था। इस पिटारे में जैन धर्म के २४ तीर्थंकरों
की मूर्तियां मिली थी। संभवत किसी समय विदेशी आक्रमणकारियों के हमले के डर से इन जैन मूर्तियों को जमीन में दबा दिया गया होगा। यह मूर्तियां इस समय नहटौर के जैन मंदिर में है। नहटौर के पास ही गांगन नदी में एक पाषाण का फलक मिला था। इस फलक पर पांच तीर्थंकरों की मूर्तियां बनी है। यह पाषाण फलक भी जैन मंदिर नहटौर में स्थापित है।

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नानौता – ( जनपद – सहारनपुर )

यहां मोहल्ला सरावज्ञान में लगभग 500 वर्ष प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर स्थित है। इस प्राचीन जैन मंदिर में भगवान महावीर स्वामी की मुख्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है।
मोहल्ला अफगानान में लगभग 150 वर्ष प्राचीन जैन चैत्यालय के रूप में मंदिर है।

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अंबेहटा – ( जनपद – सहारनपुर )

यहां जैन समाज का भव्य जिनालय धार्मिक आस्था का केंद्र है।

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