_______________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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भारत वर्ष की पहचान है हर की पैड़ी।
जहां ब्रहमा – विष्णु – शिव सदैव निवास करते हैं –
हर की पैड़ी – हरिद्वार ।

हर की पैड़ी से कई पौराणिक कथाएं एवं किंवदंतियां जुड़ी हैं। इन्हीं कथाओं और किंवदंतियों से इस स्थान के प्रति श्रद्धालुओं की श्रद्धा का उभार मुखरित होता है। यह कथाएं लोगों की श्रद्धा को इस स्थान के प्रति स्थिर और प्रगाढ़ बनाती हैं।

** राजा श्वेत ने इसी स्थान (हर की पैड़ी) पर ब्रह्मा जी की बड़ी तपस्या आराधना की थी। राजा श्वेत की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें वर मांगने को कहा।

राजा श्वेत ने ब्रह्मा जी से कहा कि यह स्थान आपके नाम से प्रसिद्ध हो और यहां पर आप( ब्रह्मा जी) भगवान विष्णु तथा महेश के साथ निवास करें। इस स्थान पर सभी तीर्थों का वास हो एवं इस स्थान का ऐसा महत्व हो की सब तीर्थों का फल यहां प्राप्त हो जाए।

ब्रह्मा जी ने कहा-‘ऐसा ही होगा! आज से यह कुंड मेरे नाम से प्रख्यात होगा और इसमें स्नान करने वाले परम पद के अधिकारी होंगें।’

तब से यह स्थान ब्रह्मकुंड( हर की पैड़ी) के नाम से प्रसिद्ध है।

** महादेव शंकर ने देवऋषि नारद के द्वारा अपनी प्रिया सती जी के प्राण त्याग का समाचार सुनकर वीरभद्र को उत्पन्न किया। वीरभद्र ने अपने संपूर्ण प्रथम गणों के साथ कनखल जाकर दक्ष के यज्ञ का नाश कर दिया। बाद में ब्रह्मा जी की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उस विध्वंस से विकृत हुए यज्ञ को पुनः संपन्न किया। जहां दक्ष तथा देवताओं ने यज्ञों के स्वामी साक्षात भगवान विष्णु का स्तवन किया था, वह स्थान हरि तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। जो मनुष्य उस हरिपद तीर्थ (हरि की पैड़ी)-में स्नान करता है, वह भगवान विष्णु का प्रिय तथा मोक्ष का अधिकारी होता है। इस स्थान पर सब लोग त्रिपथगा गंगा जी के साक्षात दर्शन करते हैं।

** उज्जैन के महाराज भर्तहरि संसार से विरक्त होकर हरिद्वार आ गए थे। भृतहरि विक्रम संवत चलाने वाले उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। भर्तहरि ने इसी स्थान पर तपस्या करके अमर पद पाया। यहीं उन्होंने संस्कृत के प्रसिद्ध ‘वैराग्य शतक’ और ‘नीति शतक’ जैसे ग्रंथों का सर्जन किया था।

महाराज भर्तृहरि की स्मृति में राजा विक्रमादित्य ने पहले- पहल ब्रह्म कुंड पर पैड़ियां( सीढ़ियां) बनवाई थी। किवदंती है कि भर्तहरि के नाम से ही घाट और सीढ़ियों को भर्तहरि की पैड़ी कहा गया। बाद में इसे श्रद्धालुओं के द्वारा हरि की पैड़ी कहा जाने लगा।

** अमृतपान करने के लिए देवताओं और दैत्यों के द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश से इस धरती पर चार स्थानों पर छलक कर अमृत की बूंदें गिरी थीं। उन चार स्थानों में से एक स्थान हरिद्वार का ब्रह्म कुंड था। जहां उस समय अमृत कलश से अमृत की बूंदें गिरी थी। समुद्र मंथन से निकले अमृत के कण प्राप्त करने का गौरव हरिद्वार की इसी हर की पौड़ी को भी हुआ था।

** हर १२ वर्षों के बाद होने वाले महाकुंभ के अवसर पर साधु-संतों का मुख्य शाही स्नान यहीं ब्रह्म कुंड-हर की पैड़ी पर होता है।

साधु संतों के द्वारा हर की पैड़ी पर ही स्नान करने के आग्रह का कारण इस स्थान का पौराणिक महत्व और इस स्थान की प्राचीनता है।

इन्हीं पौराणिक कथाओं और इस स्थान की प्राचीनता से ही आम श्रद्धालु जन की भी मन में यही अभिलाषा होती है कि ब्रह्मकुंड की हर की पैड़ी पर ही गंगा जी में स्नान किया जाए।

** हर की पैड़ी ब्रह्म कुंड के बीचों-बीच कुछ दशक पहले तक गंगा जी का छत्रीनुमा गोल मंदिर था। जो राजा मानसिंह की छतरी के नाम से प्रसिद्ध था। आमेर के नरेश मिर्जा राजा जयसिंह ने हर की पैड़ी ब्रह्म कुंड के बीच में एक अष्टकोणिय छतरी के रूप में इसे बनवाया था।

कुछ दशकों पहले राजा मानसिंह की छतरी के प्राचीन स्वरूप के स्थान पर एक नए रूप में नया मंदिर बनवाया जा रहा था। लेकिन किसी विवाद के कारण यह मंदिर कई दशकों से अधूरा ही पड़ा हुआ है।

** हर की पैड़ी पर स्थित मंदिर –

* अठखंभा मंदिर – यह मंदिर गंगा जी की धारा से ऊंचाई पर घाट के ऊपर प्रतिष्ठित है। यह गंगा जी का प्राचीन मंदिर है।

हर की पैड़ी घाट पर लक्ष्मी नारायण मंदिर और गंगाधर राव का मंदिर हैं। जो बहुत पहले रिहायशी हवेलियों के रूप में थे। बाद में इन्हें मंदिर का रूप दे दिया गया। इन मंदिरों के तलघर में भी मंदिर स्थित हैं।

अस्थि प्रवाह घाट पर भी गंगा मंदिर स्थित है।

**हर की पैडी घाट पर ही ‘विष्णु चरण पादुका’ स्थित है।

हर की पैड़ी पर अब खोका नुमा छोटे-छोटे मंदिर बना दिए गए हैं। मुख्य मंदिर के चारों ओर ऐसे ही कई मंदिर यहां देखे जा सकते हैं। यह सभी मंदिर इनके मालिकों के द्वारा ठेके पर चढ़ाए जाते हैं और एक निश्चित अवधि के लिए ठेकेदार को सिपुर्द कर देते हैं। बदले में समयानुसार तय राशि लेते रहते हैं।

** अठखंभा गंगा जी मंदिर के पास ही शंकराचार्य के मठ श्रृंगेरी पीठ की एक शाखा है। इसमें जगतगुरु आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित है।

** मालवीय द्वीप -ब्रह्म कुंड – हर की पैड़ी

हर की पैड़ी पर गंगा के दूसरी ओर बने टापू को मालवीय द्वीप कहते हैं। मालवीय द्वीप व हर की पैड़ी की सीढ़ियों के बीच जिस स्थान पर गंगा जी बह रही हैं – यही स्थान ब्रह्म कुंड है।

** मालवीय द्वीप के बीचों-बीच बिड़ला बंधुओं में से राजा बलदेव दास बिड़ला द्वारा बनवाया हुआ घंटाघर है। यह बिड़ला टावर के नाम से प्रसिद्ध है और हरिद्वार की हर की पैड़ी की पहचान है। यह टावर अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।

मालवीय द्वीप पर ही एक स्तंभ पर महामना मालवीय जी की प्रतिमा स्थापित है।

इसी मालवीय द्वीप पर एक अन्य स्तंभ पर जगतगुरु आद्य शंकराचार्य और उनके चार शिष्यों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। जिन्हें कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य ने स्थापित करवाया था।

यहां गंगा जी के दोनों किनारों व मालवीय द्वीप के चारों ओर पक्के घाट बने हैं। गंगा जी के तेज बहाव से बचने के लिए लोहे की रेलिंग व जंजीरों से लैस घाट बने हैं।

** पुराने समय में हर की पैड़ी लाल पत्थर से बनी अर्धवृत्ताकार सीढ़ियों का घाट था। महाकुंभ के मुख्य शाही स्नान पर्व के अवसरों पर साधु संतों एवं श्रद्धालस्नानार्थियों की भारी भीड़ के समय यह घाट छोटा पड़ जाता था। श्रद्धालु तीर्थ यात्रियों को हर की पैड़ी पर स्नान करने में सुविधा को ध्यान में रखकर प्रशासन द्वारा महाकुंभ के अवसरों पर हर की पैड़ी का विस्तार करके वर्तमान रूप प्रदान किया गया। हर की पैड़ी का घाट अब संगमरमर पत्थर से निर्मित एक विशाल आकार का भव्य एवं आकर्षक घाट है। ब्रह्म कुंड का प्राचीन हर की पैड़ी वाला घाट अभी भी पुराने स्वरूप में लाल पत्थर की सीढ़ियों वाला घाट है।

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