__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १००कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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मायादेवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं।सनातन हिंदू धर्म के प्राचीन धर्मग्रंथों तथा पुराणों में हरिद्वार का उल्लेख मायापुरी के नाम से किया गया है।

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका।
पूरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्ष दायिका।।

श्रीअयोध्या, मथुरा, मायापूरी (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका उज्जैन तथा द्वारका इन सप्तपुरियों में स्नान, ध्यान, जप, तप तथा निवास करने वाला मोक्ष का अधिकारी होता है।

स्कंद पुराण के केदारखंड के अध्याय 2 के श्लोक 11 में लिखा है –

माया भगवती साक्षात्सृष्टि स्थित्यन्तकारिणी।
तत्क्षेत्र हि समाख्यात् भवमुक्तिप्रदायकम्।।

अर्थात, संसार की रचना, स्थिति और संहार करने वाली साक्षात माया भगवती हैं। वह मुक्ति को देने वाली हैं और यह (हरिद्वार) उनका क्षेत्र है। इसलिए यह ‘मायापुरी’ के नाम से प्रख्यात है।

मायापुरी हरिद्वार को कहते हैं और मायापुरी या हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी भगवती श्री माया देवी हैं। यह अत्यंत प्राचीन तथा पौराणिक स्थान है। माना जाता है कि यह पीठ गंगावतरण से पहले ही स्थापित हो चुकी थी।

स्कंद पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर से रुष्ट होकर अपने यहां कनखल में आयोजित एक विराट यज्ञ आयोजित किया। उसी आग में दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया। लेकिन सती बिना निमंत्रण के भी वहां गई। अपने पिता के यहां आयोजित यज्ञ स्थल में भगवान शिव का अपमान देखकर क्षुब्ध सती ने योगाग्नि से अपना शरीर भस्म कर प्राणोत्सर्ग कर दिया। भगवान शंकर अपने गणों से यह समाचार सुनकर अत्यधिक क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी जटाओं में से एक जटा उखाड़कर पर्वत पर पटक दी जिससे उसके टांके दो टुकड़े हो गए और उनमें से एक में से वीरभद्र तथा दूसरे से काली की उत्पत्ति हुई। क्रोधित भगवान शंकर ने भूत-प्रेतों एवं पिशाचों की एक विकराल एवं विराट सेना वीरभद्र एवं काली के नेतृत्व में दक्ष के यज्ञ को विध्वंस करने के लिए भेज दी। वीरभद्र ने दक्ष के समस्त यज्ञ को तहस-नहस कर दिया और राजा दक्ष का भी शीश काट दिया।

स्वयं महादेव सती के शरीर को लेकर विछोह के उन्माद में उद्विग्न होकर चारों दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव के क्रोध से दसों दिशाओं को बचाने एवं शिव के मोह को भंग करने के लिए विष्णु भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड करके 51 टुकड़ों में परिणित कर दिया। पृथ्वी पर जहां-जहां यह टुकड़े गिरे वह स्थान शक्तिपीठ कहलाते हैं। उन स्थानों में माया देवी का स्थान सबसे प्रमुख है। यहां सती की नाभि गिरी थी, और नाभि शरीर का मूल स्थान होता है। सती अर्थात माया के नाम पर ही हरिद्वार को मायापुरी या मायानगरी भी कहा जाता है। अब भी हरिद्वार में गंगा जी पर संकल्प करवाते समय मायाक्षेत्रे कहा जाता है।

मायादेवी के कोतवाल के रूप में बाबा आनंद भैरव जाने जाते हैं। मायादेवी के मुख्य मंदिर के उत्तरी छोर पर भैरव का मंदिर भी है।

यह स्थान वर्तमान में श्री पंचदशनाम् जूना भैरव अखाड़ा के पास है। भैरव अखाड़ा के नागा सन्यासी जो ब्रह्मचारी भी होते हैं, यहां नित्य इन दोनों माया देवी मंदिर तथा भैरव मंदिर की पूजा-अर्चना करते हैं।

मायादेवी मंदिर की प्राचीनता का प्रामाणिक उल्लेख आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के तात्कालिक जनरल डायरेक्टर एलेग्जेंडर कनिंघम की रिपोर्ट में मिलता है। कनिंघम ने लिखा है –

‘श्री माया देवी का मंदिर पूर्णतया पत्थरों से निर्मित है और प्रवेश द्वार पर ऊपर अवशिष्ट एक शिलालेख से मैं विचार करता हूं कि यह अवश्यमेव दसवीं या ग्यारहवीं शताब्दी पुराना है। मुख्य प्रतिमा को माया देवी कहा जाता है, यह एक लंबे पड़े हुए व्यक्ति के संहार की मुद्रा में चार हाथ वाली स्त्री है। मैं स्वीकार करता हूं कि इसके एक हाथ में चक्र अन्य में नरमुंड तथा तीसरे हाथ में त्रिशूल है। यह प्रतिमा शिव पत्नी की है जिनको विष्णु ने चक्र और शिव ने त्रिशूल दिया था। इनके पास में पालथी मारकर बैठे हुए अष्टभुज पुरुष की जो प्रतिमा है, वह शिव ही हैं। मंदिर के बाहर शिवलिंग तथा नंदीगण की प्रतिमा है।’

कुख्यात मुस्लिम आक्रांता तैमूरलंग दिल्ली को लूटने के बाद मेरठ-बिजनौर से लूटपाट करता हुआ हरिद्वार आया जहां उसने भीषण मारकाट एवं नरसंहार करके अनेक प्राचीन मंदिरों को भूमिसात किया। तैमूरलंग ने यहां माया देवी मंदिर के बाद आनंद भैरव की मूर्ति पर हमला किया तो उसमें से रक्त की धारा बहने लगी वहां से सांपों-बिच्छुओं की सेना निकल पड़ी जिससे भयभीत होकर तैमूरलंग की सेना भाग खड़ी हुई। तैमूरलंग स्वयं भी इस घटना से इतना डर गया कि वह लूटपाट बंद कर सरसावा होते हुए वापस लौट गया।

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