___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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सनातन संस्कृति एवं मूल्यों वाले देश भारतवर्ष में तीर्थों पर पंडो एवं पुरोहितों का निवास प्राचीन काल से ही रहा है। तीर्थों पर होने वाले शुभ संस्कार तथा मृतक के कर्मकांड तीर्थ के पंडो और पुरोहितों के द्वारा ही कराए जाते हैं। अनादि काल से देश भर से श्रद्धालु तीर्थो पर आते रहे हैं।

हरिद्वार का नाम सामने आते ही सबसे पहले गंगा जी का स्मरण मन मस्तिष्क में होता है उसके बाद यहां के साधु संत और उनके आश्रमों तथा हरिद्वार के पंडों पुरोहितों का चित्र मन मस्तिष्क में छा जाता है।

पूरे देश से आने वाले श्रद्धालु यजमान यहां हरिद्वार तीर्थ पर धार्मिक कर्म कराने के लिए अपने पंडे-पुरोहितों के पास ही ठहरते थे। श्रद्धालु यजमान अपने नियत पंडा के पास ही ठहरते हैं और उसी के द्वारा सभी धार्मिक कर्मकांड कराते हैं।

हरिद्वार के पंडे-पुरोहितों ने प्राचीन समय से ही गांव-क्षेत्र और उस समय के राज्यों और रियासतों के आधार पर यहां आने वाले यात्रियों का विभाजन अपने बीच में कर रखा है।

यहां के पंडे पुरोहितों के द्वारा हरिद्वार में आने वाले अपने श्रद्धालु यजमानों के पीढ़ियों के ज्ञान को उनके नाम, जाति और गोत्र के अनुसार वंश दर वंश अपनी लंबी-चौड़ी भारी-भरकम बहियों में लिख रखा है।

कहते हैं पुराने समय में यजमानों की पीढ़ियों को श्रवण और स्मरण के द्वारा कंठस्थ जाता था। कालांतर में यह कंठस्थ ज्ञान पहले भोजपत्रों पर लिखा गया बाद में कागज के आविष्कार के बाद कागज की बहियों पर लिखकर रखा जाने लगा।

हरिद्वार के पंडे-पुरोहितों के पास तीन सौ से लेकर पांच सौ वर्ष पुरानी बहियां मिल जाती हैं। इन बहियों में अपने देश के लाखों-करोड़ों परिवारों का ऐसा विराट इतिहास छुपा हुआ है जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।

आज के समय में भी हरिद्वार में रोजाना हजारों की संख्या में श्रद्धालु यजमान अपने पंडे-पुरोहितों के पास आते हैं।

हरिद्वार तीर्थ पर आकर बहियों में अपना नाम दर्ज कराना एक अनिवार्यता बन गया है। पंडों के द्वारा अपनी बाहियों में यजमानों की तीन पीढ़ियों के नाम लिखने का चलन है। इनकी बहियों में बीस से पच्चीस पुरखों के नाम सहजता से मिल जाते हैं। इनमें आगे नई पीढ़ियों के नाम जुड़ते जाने से देशभर के श्रद्धालु तीर्थयात्रियों के वंशवृक्ष पंडो की बहियों में बढ़ते जाते हैं। पंडे-पुरोहितों के द्वारा इन बहियों को जाति और स्थान क्षेत्र के अनुसार दोनों ढंग से सुरक्षित रखा गया है।

सामान्य तौर पर हम सभी को अपनी तीन या चार पीढ़ियों के नाम याद रहते हैं किंतु हरिद्वार के अपने तीर्थ पुरोहित की बही में सैकड़ों वर्ष पूर्व अंकित अपने २०-३० पीढ़ियों के पूर्वजों का वास्तविक वर्णन व नाम पढ़ा-देखा जा सकता है। यही नहीं अपने शिक्षित पुरखों के हस्ताक्षर देखकर यहां आने वाले श्रद्धालु चमत्कृत हो जाते हैं।

हरिद्वार के पंडो की बहियों में पुरखों के हस्ताक्षर, राजाओं की मुहरें, रजवाड़ों की निशानियां ऐसे ऐतिहासिक सुरक्षित एवं संरक्षित दस्तावेज हैं जो और किसी भी स्थान पर नहीं मिल सकते।

सनातन हिंदू परिवारों की वंशावली, उनके मूल जन्म स्थान तथा परिवार के संदर्भ की जानकारी को संजोकर रखना एक बड़ा सामाजिक दायित्व है। जिसका निर्वहन तीर्थ के पंडों-पुरोहितों के द्वारा बड़ी जिम्मेदारी से किया गया है।

अनादि काल से मृतकों की अस्थियों को गंगा जी में प्रवाहित करने का प्रचलन है। नित्य हजारों श्रद्धालु यजमान हरिद्वार में धार्मिक कृत्य करने के लिए आते हैं। इन श्रद्धालुओं में बड़ी संख्या में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, दिल्ली, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के निवासी अपने मृतक सगे-संबंधियों की अस्थियां गंगा जी में प्रवाहित करने हरिद्वार आते हैं। इससे संबंधित सभी धार्मिक संस्कारों को यहां के पुंडे-पुरोहित ही कराते हैं।

रेलगाड़ी या बस से उतरते ही यात्री को रिक्शा, टेंपो या ई-रिक्शा वालों का समूह घेर लेता है। इन्हीं के बीच में माथे पर चंदन लगाएं कोई शख्स आपसे आप की जाति किस गोत्र के हैं और कहां से आए हैं पूछेगा। यह शख्स और कोई नहीं हरिद्वार का पंडा ही होगा।

तीर्थों के पंडे-पुरोहितों के बारे में एक रोचक कथा बताई जाती है कि पंडो का संबंध भगवान राम के समय से जुड़ा है।

श्रुतियों के अनुसार बताया जाता है – रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्री राम माता सीता व लक्ष्मण के साथ १४ वर्ष के वनवास की अवधि पूरी करके अयोध्या लौट आए। भगवान श्री राम का राज्याभिषेक होने व शासन व्यवस्था संभालने के पश्चात उन्होंने विजय यज्ञ किया। यज्ञ के पूर्ण होने के बाद उन्होंने ब्राह्मणों को ब्रह्मभोज के लिए बुलवाया। लेकिन ब्राह्मणों ने उनके यहां आकर दान दक्षिणा ग्रहण करने से स्पष्ट मना कर दिया। क्योंकि रावण एक ब्राह्मण था और उन्हें रावण का वध करने के कारण ब्रहम हत्या का दोष लगा था। इस विकट स्थिति में कुलगुरु वशिष्ठ जी के कहने पर ऋषियों के आश्रमों में अध्ययन कर रहे ब्राह्मण छात्रों को बुलाकर भोजन इत्यादि कराने के धन पश्चात दान दक्षिणा दिया। किंतु जब इस घटना का पता छात्रों के माता पिता को चला तो उन्होंने उन्हें घर से निकाल दिया।

जब उन छात्र ब्रह्मचारियों ने अपनी व्यथा को अयोध्या के कुलगुरु वशिष्ठ जी को सुनाई तो गुरु वशिष्ठ ने श्री राम से आज्ञा दिलवाकर उन्हें अलग अलग तीर्थों में रहने और तीर्थयात्रियों के धार्मिक संस्कार करा कर दान लेने का अधिकार मात्र उन तीर्थ पुरोहितों को दिला दिया।

कहा जाता है ऐसे ही पंडागिरी की शुरुआत हुई थी और तब से यह प्रथा लगातार चली आ रही है।

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