_____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के१०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

_____________________________________________

हरिद्वार सनातन हिंदू धर्म का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान एवं भारत का प्रमुख पर्यटन स्थल है। हरिद्वार तथा इसके आसपास बहुत से पौराणिक एवं धार्मिक दर्शनीय स्थल है।

हरिद्वार के कुछ महत्वपूर्ण पौराणिक धार्मिक स्थलों में हर की पौड़ी, मनसा देवी मंदिर, चंडी देवी मंदिर, माया देवी मंदिर एवं आनंद भैरव मंदिर, भीमगोडा, कुशावर्त घाट,नारायणी शिला,नीलधारा,बिल्केश्वर महादेव,दक्षेश्वर महादेव (कनखल),सती कुंड,सप्त सरोवर आदि तथा अन्य धार्मिक स्थलों में भारत माता मंदिर, दूधाधारी, परमार्थ आश्रम, अवधूत मंडल, साधु बेला, पावन धाम, सप्त ऋषि आदि मुख्य हैं।

* हर की पैड़ी-ब्रह्म कुंड –

हरिद्वार का हृदय हर की पैडी ब्रह्मकुंड है। राजा श्वेत ने इस स्थान पर ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए तथा वर मांगने को कहा तो राजा श्वेत ने ब्रह्मा जी से कहा हे प्रभु यह स्थान आपके नाम से प्रसिद्ध हो तथा आप भगवान विष्णु तथा शिवजी के साथ यहां निवास करें। ब्रह्मा जी ने राजा श्वेत को वरदान दिया कि यहां पर जो कोई भी स्नान करेगा उसको तीनों देवताओं ब्रह्मा विष्णु महेश के दर्शन का फल मिलेगा। तब से ही यह स्थान ब्रह्म कुंड कहलाने लगा।

समुद्र मंथन से निकले अमृतकलश की दैत्यों से रक्षा करते समय अमृत की कुछ बूंदें इस स्थान पर भी गिरी थी जिससे प्रत्येक १२ वर्षों बाद हरिद्वार में कुंभ महापर्व का मेला लगता है। महापर्व कुंभ का मुख्य स्नान स्थल यह ब्रह्म कुंड हर की पैड़ी ही होता है।

राजा विक्रमादित्य के भाई राजा भृर्तहरि ने इसी स्थान पर अमृत्व की प्राप्ति की थी। राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई की स्मृति में यहां पैड़िया बनवाई थी, तब से ही यह स्थान हर की पैडी के नाम से जाना जाने लगा।

ब्रह्म कुंड – हर की पैड़ी पर प्रतिदिन संध्या के समय होने वाली गंगा जी की आरती विश्व प्रसिद्ध है।

* कुशावर्त घाट –

ब्रह्म कुंड से कुछ ही दूरी पर दक्षिण दिशा में कुशावर्त तीर्थ स्थित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार दत्तात्रेय ऋषि ने सहस्त्रों वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर यहां तप किया था। मान्यता है कि यहां पितरों का श्राद्ध करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

* कनखल –

हरिद्वार से दक्षिण दिशा की ओर लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर कनखल तीर्थ स्थित है। पुराणों के अनुसार यह भगवान शिव के ससुर दक्ष प्रजापति की नगरी थी। दक्ष ने अपने दामाद भगवान शिव को अपमानित करने के लिए उस समय यहां एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। भगवान शिव के मना करने पर भी देवी सती अपने पिता के द्वारा आयोजित यज्ञ में शामिल होने के लिए आई थी। यज्ञ में अपने पति शिव का अपमान होने पर उन्होंने स्वयं को यहां हो रहे यज्ञ के यज्ञकुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। तब से यह यज्ञस्थल सर्वांगपीठ कहलाया। यहां दक्षेश्वर महादेव का मंदिर है। प्रत्येक सोमवार को भारी संख्या में श्रद्धालु यहां जलाभिषेक करने के लिए आते हैं।

कनखल शक्ति उपासना की दृष्टि से सबसे उपयुक्त स्थान है।

कनखल में गंगा जी पर सतीघाट है। यहां सती घाट पर गंगा जी में दूर-दूर से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की अस्थियां प्रवाहित करने के लिए आते हैं। पौराणिक मान्यता है कि यहां गंगा जी में अस्थियां प्रवाहित करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कनखल के सती घाट पर गुरु अमरदास जी का गुरुद्वारा स्थित है। सिखों के तीसरे गुरु, गुरु अमरदास जी हर वर्ष पंजाब से पैदल चलकर यहां आते थे और गंगा की साधना करते थे।

कनखल एक अत्यंत प्राचीन नगरी है। यह हरिद्वार से भी प्राचीन तीर्थ माना जाता है। यहां के कई प्राचीन भवनों एवं इमारतों पर अत्यंत सुंदर भित्ति चित्र बने हुए हैं।

कनखल में दरिद्रभंजन महादेव मंदिर, तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर, पतितपावन महादेव मंदिर आदि सिद्ध पीठ हैं।

* माया देवी मंदिर –

हरिद्वार नगर के मध्य में माया देवी मंदिर स्थित है। यह देवी का शक्तिपीठ स्थल है। देवी सती ने जब अपने पिता के द्वारा आयोजित महायज्ञ में अपने पति शिव के अपमान को देखकर स्वयं को यज्ञकुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। भगवान शिव शोकावस्था में अपनी पत्नी सती के जले शव को लेकर पृथ्वी पर घूम रहे थे। भगवान विष्णु ने भगवान शिव के मोह को दूर करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव के क्या ५१ टुकड़े कर दिए। सती के शव का एक हिस्सा इस स्थान पर गिरा जो मायादेवी पीठ कहलाया। यहां पर अष्टभुजा देवी त्रिमस्तक दुर्गा की मूर्तियां हैं। यह स्थान हटयोगियों का प्रमुख केंद्र है।

* भैरव मंदिर –

हरिद्वार में माया देवी मंदिर के पास में ही भैरव बाबा का अत्यंत प्राचीन मंदिर स्थित है। यह एक सिद्धपीठ स्थान है। कहते हैं कि जब विदेशी हमलावर तैमूरलंग ने हरिद्वार में भयंकर नरसंहार करके लूटपाट की उस समय उसने भैरव बाबा की मूर्ति को भी तलवार से वार करके तोड़ना चाहा। जैसे ही तैमूरलंग ने भैरव बाबा की मूर्ति पर वार किया मूर्ति से रक्त की धारा बहने लगी। यह दृश्य देखकर तैमूरलंग कांप उठा। भयभीत तैमूर वापस लौट गया और यहीं से उसका अंत शुरू हो गया।

* मनसा देवी मंदिर –

हरिद्वार के प्रसिद्धतम स्थलों में मनसा देवी मंदिर का प्रमुख स्थान है।बिल्व पर्वत पर मनसा देवी का मंदिर स्थित है। मंदिर के गर्भगृह में पांच भुजाओं और तीन सिरों वाली प्रतिमा विराजमान है। मंदिर प्रांगण में ही इच्छा पूर्ण करने वाला वृक्ष है। जिसके विषय में कहा जाता है कि जो कोई भी अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए इस वृक्ष के किसी स्थान पर धागा या मौली बांधता है उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है ।मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु पुण: यहां आकर देवी के दर्शन करते हैं और पेड़ ने बंधे एक धागे को खोलते हैं। इस मंदिर के पीछे थोड़ी दूरी पर सूर्यकुंड है।

मनसा देवी के दर्शन करने के लिए ऊपर पहाड़ी पर जाने के लिए पैदल रास्ता है और रोपवे (उड़नखटोले) की सुविधा भी उपलब्ध है। रोपवे से पंचपुरी हरिद्वार का नयनाभिराम दृश्य दिखाई देता है।

* चंडी देवी मंदिर –

हरिद्वार में यह मंदिर गंगा जी की नीलधारा के दूसरी तरफ नीलपर्वत के शिखर पर स्थित है। यहां पैदल जाने के लिए दो रास्ते हैं। श्रद्धालु यात्री एक रास्ते से जा कर दूसरे रास्ते से आते हैं। ऊपर चंडी देवी मंदिर में दर्शन करने जाने के लिए यहां रोपवे (उड़नखटोला) की सुविधा उपलब्ध है।

चंडी देवी मंदिर के पास ही कुछ दूरी पर पर्वत शिखर पर ही हनुमान जी की माता अंजना देवी का मंदिर है।

हरिद्वार से चंडी देवी मंदिर जाने के रास्ते में ही गंगाजी मुख्यधारा नीलधारा के दूसरी ओर ही पौराणिक महत्व के नीलेश्वरमहादेव मंदिर, गौरीशंकर मंदिर एवं दक्षिण काली मंदिर स्थित है।

* सप्तऋषि आश्रम –

पुराणों के अनुसार जब गंगा मैया राजा भगीरथ के पुरखों का उद्धार करने के लिए गंगोत्री से यहां भागीरथ जी के पीछे- पीछे चलती हुई यहां पहुंची तो उन्हें हरिद्वार में सप्तऋषियों कश्यप, वशिष्ठ, यान ,विश्वामित्र ,जमदग्नि, भारद्वाज और गौतम के आश्रम मिले। गंगा जी संशय में पड़ गई कि जिस भी ऋषि के आश्रम से होकर वह नहीं गुजरी तो उन्हें उनके क्रोध व श्राप का कोपभजन बनना पड़ेगा। गंगा जी तब सभी सप्तऋषियों के लिए सात धाराओं में विभक्त होकर सभी सातों ऋषियों के आश्रम से होकर आगे बढ़ीं। इसलिए यह स्थान सप्त सरोवर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहां तपोवन बसा हुआ है।

* भीमगोड़ा –

मान्यता है कि भीमसेन ने यहां तपस्या की थी और उनके पैर के घुटने (गोडा) टेकने से यह कुंड बन गया और इसी कारण यह स्थान भीमगोडा के नाम से जाना जाने लगा। यहां पहाड़ी के नीचे एक मंदिर है उसके आगे ही चबूतरा तथा कुंड है।

* बिल्केश्वर महादेव मंदिर व गौरीकुंड –

हरिद्वार रेलवे स्टेशन के पास बिल्व पर्वत की तलहटी में पौराणिक बिल्केश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर स्थित है। देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए इस स्थान पर कठिन तपस्या की थी। मंदिर के निकट ही पौराणिक गौरीकुंड स्थित है। प्रत्येक सोमवार एवं महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक करने के लिए आते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *