_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के१०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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हरिद्वार सनातन हिंदू धर्म का परम पावन तीर्थ स्थल है।

पुराणों में हरिद्वार के कई नाम यथा गंगाद्वार, हरिद्वार, मोक्षद्वार, कपिला तथा मायापुरी आदि नाम बताए गए हैं –

केचिदूचू: हरिद्वारं मोक्षद्वारं तथापरे।

गंग द्वारं च के प्याहु: केचिन्मायापुरं पुन:।। -(स्कंद पुराण)

हरिद्वार नगरी की गनना प्राचीन सात पुरियों में की गई है।

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका।

पुरी द्वारावती ज्ञेया सप्तैता मोक्षदायिका।।

हरिद्वार तीर्थ का माहात्म्य वर्णनातीत है। पद्मपुराण और नारद पुराण आदि हरिद्वार की महिमा से भरे पड़े हैं।

पद्मपुराण में हरिद्वार की महिमा के बारे में बताया गया है कि हरिद्वार स्वर्ग के द्वार के समान है, यहां जो कोई एकाग्र होकर कोटितीर्थ में स्नान करता है, उसे पुंडरीक यज्ञ का फल प्राप्त होता है। वह अपने कुल का उद्धार कर देता है और जो कोई एक रात्रि यहां निवास करता है उसे सहस्त्र गोदान का फल मिलता है। यहां के तीर्थों में देवर्षिपितृ तर्पण करने वाला पुण्य लोक में प्रतिष्ठित होता है तथा यहां कनखल में स्नान करके तीन रात उपवास करें, ऐसा करने वाला अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त करके स्वर्गगामी होता है।

स्वर्गद्वारेण तत् तुल्यं गंगाद्वारं न संशय:।

तत्राभिषेकं कुर्वीत कोटितीर्थे समाहित:।।

लभते पुण्डरीकं च कुलं चैव समुद्धरेत्।

तत्रैकरात्रिवासेन गोसहस्रफलं लभेत्।।

सप्तगंगे त्रिगंगे च शक्रावर्ते च तर्पयन्।

देवान् पितॄंश्र्च विधिवत् पुण्ये लोके महीयते।।

तत्:कनखले स्नात्वा त्रिरात्रोपोषितो नर:।

अश्वमेघमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति।। – (पद्मपुराण)

पुराण में वर्णन है स्कन्द नारद जी से कहते हैं -हे नारद, मैं तुम्हें मनुष्यों की मुक्ति का एक उपाय बताता हूं जो कोई मनुष्य एक बार भी हरिद्वार में गंगा स्नान करते हैं उन्हें फिर संसार में जन्म नहीं लेना पड़ता चाहे करोड़ों कल्प बीत जाएं।

श्रृणु नारद वक्ष्यामि लोकानां मुक्तिकारणम्।

स‌कृत्स्नानं तु यैर्मत्यै‌‌र्गगांद्वारे शुभावहे।।

न तेषां पुनरावृत्ति: कल्पकोटिशतैरपि।।

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तिस्र: कोट्यो र्द्धकोटी च तीर्थानां मुनिसत्तम।

भजन्ते सन्निधिं तत्र स्नात: सर्वत्र जायते।।

स्कन्द नारद से कहते हैं- हे मुनि हरिद्वार में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ निवास करते हैं। जिसने भी हरिद्वार तीर्थ में स्नान किया उसे समस्त तीर्थों में स्नान करने का फल मिलता है।

पुराणों में वर्णन है –

गंगाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते।

स्नात्वा च कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते।।

अर्थात हरिद्वार, कुशावर्त ‌, बिल्केवश, नीलपर्वत तथा कनखल तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य को पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।

पुराणों में हरिद्वार में सोमवती अमावस्या में अथवा अन्य किसी भी मास की अमावस्या में एवं माघ, वैशाख तथा कार्तिक मास में हरिद्वार तीर्थ के दर्शन तथा स्नान आदि का बहुत महत्व बताया गया है –

सोमवारान्वितायां वा यस्यां कस्यामथापि वा ।

अमायां च तथा माघे वैशाखे कार्तिकेपि वा ।।

गंगा जी का जन्मदिन जेष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन (गंगा दशहरा)-के दिन केवल स्नान करने से परमधाम की प्राप्ति होती है जो कि योगियों के लिए भी दुर्लभ है –

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे दशम्यां स्नानमात्रत:।

प्राप्यते परमं स्थानं दुर्लभं योगिनामपि।।

हरिद्वार उत्तराखंड की देवभूमि एवं तपोभूमि का प्रवेशद्वार ही नहीं माना जाता है अपितु इसे मोक्ष द्वार भी कहा गया –

हरिद्वारे कुशावर्ते नीलके विल्व पर्वते।

कनखले तीर्थे स्नात्वा पुनर्जन्म न विद्यते।।

पुराण की एक कथा है कि राजा श्वेत ने यहां ब्रह्मा जी की तपस्या की थी। राजा श्वेत की तपस्या से प्रसन्न होकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने दर्शन देकर उनसे वर मांगने के लिए कहा। तब राजा श्वेत ने कहा ‘हे प्रभु यह स्थान आपके नाम पर प्रसिद्ध हो भगवान विष्णु और शिव के साथ आप यहां निवास करें तथा इसी तीर्थ में मनुष्य को सब तीर्थों का फल मिल जाए।’

ब्रह्मा जी ने प्रसंन्नता से राजा श्वेत से उसी समय कहा–‘तथास्तु! आज से है कुंड और यह स्थान मेरे नाम से और सिद्ध होंगे। इस ब्रह्मकुंड में जो स्नान करेगा, उसे मोक्ष मिलेगा उसका पुनर्जन्म नहीं होगा।’

प्राचीन काल से इस स्थान को देवताओं की भूमि के रूप में प्रसिद्धि मिली है। यह भी माना जाता है कि किसी समय इस क्षेत्र का उद्भव ऋषियों- मुनियों की तपस्या के लिए हुआ था। इसलिए प्राचीन काल से सनातन धर्म के ऋषि-मुनि, साधु-संत साधना एवं तपस्या के लिए इस क्षेत्र में आते रहे।

ब्रह्मकुंड के पास ही कुशावर्त‌ घाट में भी गंगा स्नान का बहुत महत्व पुराणों में बताया गया है। हरिद्वार के पंचपुण्य स्थानों में कुशावर्त घाट भी महत्वपूर्ण है। महर्षि दत्तात्रेय ने यहां एक पांव पर खड़े होकर एक हजार वर्ष तपस्या की थी।

गंगा जी जब महाराज भगीरथ के पुरखों का उद्धार करने के लिए पृथ्वी पर उतर कर महाराज भगीरथ के पीछे-पीछे चलते हुए पर्वतों से उतर कर इस स्थान से आगे चली तो उनकी तेज धार महर्षि दत्तात्रेय के कुश और कमंडल बहा ले गई। लेकिन महर्षि दत्तात्रेय के तप के प्रभाव से गंगा उस स्थान आगे ने बढ़कर उसी स्थान पर वृत्ताकार रूप में चक्कर लगाने लगी। ब्रह्मा जी के अनुरोध पर दत्तात्रेय ने गंगा को शाप से मुक्त किया और गंगा जी अपनी आगे की यात्रा पर चली। तभी से इस स्थान का नाम कुशावर्त पड़ा।

शिव पुराण के अनुसार वर्तमान कनखल दक्ष प्रजापति की राजधानी थी। तब इसका नाम अमरावती था। नीलधारा और भागीरथी के संगम स्थल पर अमरावती के अवशेष का पता आज भी वहां के गंगा तट को देखने से चल जाता है। इसी तट पर दक्षेश्वर महादेव का मंदिर है। हरिद्वार के पंचपुण्य स्थानों में ‌यह भी महत्वपूर्ण है।

शिव पुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपने जामाता शिव को अपमानित करने के लिए अपनी राजधानी कनखल में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ में अपने पति की उपेक्षा होने पर दक्षकन्या देवी सती ने यज्ञकुंड में स्वयं की आहुति दे दी। भगवान शिव को समाचार मिलने पर क्रोध में आकर उन्होंने दक्ष के यज्ञ को नष्ट भ्रष्ट करने का वीरभद्र को आदेश दिया। भगवान शिव के गण वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ को ध्वंस कर दिया और दक्ष के सिर को काट कर यज्ञ कुंड में भस्म कर दिया। सती के वियोग में भगवान शिव उनकी मृत देह को लेकर पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे। भगवान शिव के मोह को दूर करने के लिए एवं सृष्टि के कल्याण के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती की मृत देह के टुकड़े टुकड़े कर दिए। सती की देह के वे अंग जिस-जिस भी स्थान पर गिरे वह स्थान शक्तिपीठ के नाम से जाने जाते हैं।

बाद में भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ। भगवान शिव ने एक बकरे का सिर दक्ष की देर से जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित किया। इसलिए यहां शिव दक्षेश्वर के नाम से पूजे जाते हैं और वह यज्ञकुंड सती कुंड के नाम से प्रसिद्ध है।

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