_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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हर की पैड़ी हरिद्वार सनातन हिंदू धर्म का महान धार्मिक एवं पवित्र स्थल है।हर की पैड़ी की पवित्रता और महत्व को समाप्त करने के लिए अंग्रेजों ने एक साजिश के तहत सन 1914 में यू. पी. के तत्कालीन गवर्नर सर जेम्स मेस्टन की हिदायत पर नहर विभाग ने एक ऐसी योजना तैयार की कि हर की पैड़ी ब्रह्म कुंड से होकर बह रही गंगा जी की अविरल धारा को एक बांध के द्वारा रोक कर इसे नियंत्रित करके मनमर्जी से बहने दिया जाए।

अंग्रेजों के इस घृणित षडयंत्र का पता चलते ही सनातन हिंदू धर्म के अनुयायियों में जबरदस्त असंतोष फैल गया। हरिद्वार के साधु-संतों, महंतों, पंडो-पुरोहितों के अलावा देश भर के सनातन धर्मी हिंदुओं ने पंडित मदन मोहन मालवीय जी के नेतृत्व में जन आंदोलन शुरू कर दिया।

इस जन आंदोलन को दरभंगा, जयपुर और अलवर रियासतों के नरेशों के अलावा देश के महत्वपूर्ण व्यक्तियों प्रसिद्ध न्यायधीश श्री चटर्जी, सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर राजा ज्वाला प्रसाद, पंडित देवरत्न शर्मा, एमएलसी सुखबीर सिंह, महंत लक्ष्मण दास तथा श्री आनंद नारायण, तीर्थ पुरोहित सूजी बाबू पंडा और पंडित परमानंद आदि ने इस आंदोलन को पूर्ण सहयोग प्रदान किया।

पंडित मदन मोहन मालवीय जी के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन के परिणाम स्वरूप गवर्नर ने बांध योजना को त्याग देने का आश्वासन दे दिया और यह घोषणा भी कर दी कि गंगा जी की प्राकृतिक अविरल धारा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।

इस आश्वासन पर हिंदू समाज के नेताओं ने आंदोलन समाप्त कर दिया। लेकिन आंदोलन समाप्त कर दिए जाने के बाद नहर विभाग ने पुण: गंगा जी पर बांध बनाना प्रारंभ कर दिया।

पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने अंग्रेज गवर्नर के द्वारा अपनी घोषणा से मुकर जाने के बाद फिर से आंदोलन और संघर्ष करने का बिगुल बजा दिया।

लगातार दो वर्ष तक भारत भर में समस्त धार्मिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं के द्वारा हरिद्वार में ब्रह्म कुंड- हरकी पैड़ी पर गंगा जी की अविरल धारा बहती रहने के लिए जोरदार आंदोलन किया। इस आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम का रूप धारण कर लिया जिससे अंग्रेज घबरा गए। यू.पी. के गवर्नर जेम्स मेस्टन को विवश होकर सनातन हिंदू धर्म के नेताओं के साथ 18,19 दिसंबर 1916 को हरिद्वार में एक विशाल सम्मेलन करना पड़ा।

इस सम्मेलन में अलवर, जयपुर, ग्वालियर, बीकानेर, पटियाला, बनारस, कासीम बाजार आदि रियासतों के एक दर्जन राजा- महाराजाओं के अलावा देशभर के विख्यात सनातन हिंदू धर्म के नेता सम्मिलित हुए।

इस सम्मेलन में 2 दिन के विवाद के बाद अंग्रेज सरकार से एक लिखित समझौता हुआ कि हर की पैड़ी से एक मील नीचे तक गंगा नदी पर कोई बांध नहीं बनाया जाएगा तथा गंगा जी की प्राकृतिक अविरल धारा के साथ भविष्य में कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।

अंग्रेज फिर कभी भविष्य में अपने समझौते से मुकर न जाएं इस पर नजर रखने के लिए तथा हरिद्वार जैसे महत्वपूर्ण तीर्थ की मान मर्यादा भंग न हो इसके लिए पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने हरिद्वार के महंतो और तीर्थ पुरोहितों के सहयोग से सन 1916 में हरिद्वार की श्री गंगा सभा की स्थापना की।

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