___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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हापुड़ शहर दिल्ली से लगभग 60 किलोमीटर दूर पश्चिम उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख और व्यापारिक शहर है। पुराने समय से हापुड़ गुड़ और गल्ला मंडी के लिए देश-विदेश में विख्यात है।

हापुड़ शहर को कब और किसने बसाया इस बारे में कई
किवदंतिया प्रचलित हैं। कहते हैं कि बहुत पहले इसका नाम हापड़ था। इस शब्द का अर्थ उद्यान होता है। माना जाता है कि उस समय यहां एक बहुत बड़ा उद्यान था, जिससे इसका नाम हापड़ पडा। हापड़ शब्द ही समय के साथ बदल कर बाद में हापुड़ हो गया। लेकिन ग्रामीण इलाके के लोगों की जबान पर इसका नाम हापड़ ही चढ़ा हुआ है। आम बोलचाल में वे इसे आज भी ‘हापड़’ ही कहते हैं।

हापुड़ नाम के बारे में एक और जनश्रुति है कि इस नगर को सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने बसाया था। उनके नाम पर इसका नाम हरिपुर था। जो बाद में बदल कर हापुड़ हो गया।
इस जनश्रुति पर लोगों को बहुत विश्वास है, लेकिन कोई लिखित में दस्तावेज नहीं है। कहते हैं इस नगर को वरण के राजा हरिदत्त ने बसाया था। हापुड़ के निकट के ही नगर बुलंदशहर का नाम बहुत पहले वरण था।

समय के साथ हरिपुरा से बदलते – बदलते हापुड़ नाम का यह शहर, कहते हैं बहुत पहले एक किले के भीतर बसा हुआ था। उस किले के पांच दरवाजे थे। जो आज के समय में कोठी गेट, गढ़ गेट, सिकंदर गेट, मेरठ गेट, दिल्ली गेट इस शहर के विभिन्न इलाकों के रूप में जाने जाते हैं।
किले के चारों ओर खाई थी। यहां का मोहल्ला खाई उसी की याद दिलाता है। मुगल काल में यहां कुछ सराय बनाई गई। उनमें से करम इलाही सराय और नूर इलाही सराय उसी समय की बनी हुई है। आज का तगा सराय मोहल्ला भी किसी समय एक सराय ही था।

यहां की काली मस्जिद को अल्तमश ने सन 1217 ई.में तथा जामा मस्जिद को औरंगजेब ने सन 1670 ई.में बनवाया था।

औरंगजेब के बाद के समय में जब दिल्ली पर मराठों, सिखों, रूहेलों, अफ़गानों ने दिल्ली पर आक्रमण किए तब उसकी प्रतिक्रिया यहां हापुड़ में भी हुई थी।

1761ई.में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई थी उस समय हापुड़ पर नाजिब खां नाम के सरदार का राज था। जाटों ने सन 1770ई.में उसकी हत्या कर दी।

मराठा सरदार सिंधिया ने सन 1800ई.में इसे अपनी सेना के फ्रांसीसी जनरल पैरन की जागीर में सम्मिलित कर दिया था।1803 ई. में इस नगर पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।

पिंडारी सरदार अमीर खां ने अपने 600 साथियों के साथ सन 1805 ई. में हापुड़ पर हमला किया। लेकिन इब्राहिम अली के प्रयासों से यह शहर बच गया था।

सन 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में हापुड़ का बहुत बड़ा योगदान है। धौलाना गांव के अनेक क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने यहां के दिल्ली रोड पर स्थित पीपल के पेड़ पर जिंदा ही लटका दिया था।सन 1975 में यहां उन क्रांति वीरों की याद में एक शहीद स्मारक की स्थापना की गई थी।

सन 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में यहां के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। 11 अगस्त के दिन यहां के प्रसिद्ध अतरपुरा चौराहे पर शांतिपूर्ण जुलूस निकाल रहे निहत्थे आंदोलनकारियों पर अंग्रेजों की पुलिस ने गोली चला दी थी। जिसमें कई आंदोलनकारी शहीद हो गए थे। अतरपुरा चौराहे पर उनकी स्मृति में बेरी के नीचे शहीद समाधि की स्थापना की गई है।

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