_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
_____________________________________

लकड़ी पर नक्काशी

लकड़ी पर नक्काशी का काम

****************************************

देवबंद – ( जनपद सहारनपुर )

_______

पीपी बाजा व कागज के रंगीन चश्मे

______________

किसी समय पूरे भारतवर्ष के मेलों-ठेलों और तीर्थ स्थलों पर बिकने वाला बच्चों का प्यारा पारंपरिक बाजा पीपी जिसे देखते ही नन्हे- मुन्नों के चेहरे पर मुस्कान बिखर जाती थी और उसे लेने के लिए छोटे-छोटे बच्चे मचलने लगते थे। जब यह पीपी लेकर नन्हे- मुन्ने बच्चे इसे बजाते तो इसकी पीपी की आवाज से बच्चे खुशी के मारे फूले नहीं समाते थे। छोटे बच्चे पूरे रास्ते इसे बजाते हुए ही घर लौटते थे।

पीपी बच्चों का सबसे सस्ता और सुलभ बाजा है। जिसके द्वारा गरीब से गरीब माता-पिता भी अपने प्यारे नौनिहालों के नटखट चेहरों को कुछ मुस्कान और खुशियां दे सकते हैं।

नन्हे – मुन्नों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर देने वाला सुरीला और सुलभ यह पीपी बाजा अपने देश में केवल देवबंद में बनता है।

वह मेला ही क्या जिसमें पीपी का स्वर मुखरित न हो रहा हो। लेकिन बहुत कम लोग ही जानते हैं कि भारतवर्ष के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मेले में बहुत ही सस्ती कीमत में बिकने वाला नन्हे – मुन्नों के परंपरागत और आकर्षक बाजे पी पी के निर्माण कला को विकसित करने का श्रेय भी इसी नगर देवबंद नगर को है।

नन्हे- मुन्नों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर देने वाला सुरीला और सुलभ यह पीपी बाजा अपने देश में केवल देवबंद में बनता है।

यह पीपी ‘नरकुल’ से बनती है। यह नरकुल नदी – नालों व खेतों के किनारे स्वयं ही उग आती है और काटने के बाद एक साल में फिर तैयार हो जाती है।

नजीबाबाद, कोटद्वार, रामपुर, टनकपुर, देहरादून, सहारनपुर की शिवालिक पर्वतमालाओं की घाटी तथा ऋषिकेश के ऊपर गुल्लर दोगी की घाटी में यह नरकुल बहुतायत में होता है।

देवबंद के पठानपुरा, किला, कायस्थवाड़ा,बैलूनकोटला, बड़जियाउलहक आदि स्थानों पर इन कारीगरों को पीपी बनाते हुए देखा जा सकता है। पीपी बनाने के काम ज्यादातर अंसारी (जुलाहा) बिरादरी के लोग करते हैं। पुश्तैनी तौर पर यह काम कर रहे कारीगर बताते हैं कि उनके परिवार में यह काम कई पीढ़ियों से होता चला आ रहा है।

आरी, छोटे-बडे दो चाकू, दांती और सुआ बस इन कुछ छोटे-छोटे औजारों की मदद से पीपी तैयार की जाती है। आरी के द्वारा नारसन के निर्धारित आकार में टुकड़े काट कर छोटे चाकू से छोटा और बड़े चाकू से बड़ा पत्ता बनाया जाता है। तिकोरा से दांते बनाकर और कांती से नारसन को छीलकर साफ कर देते हैं। सुआ नारसन को अंदर से साफ करने के काम आता है।

पीपीके तीन भाग होते हैं। इसके नीचे के भाग में तीन या चार छेद किए जाते हैं। फिर उसमें पतली नारसन का पत्ता तराश कर फिट कर देते हैं। उसके बाद मोटी नारसन का कवर जो पत्ते को पूरी तरह से ढक ले चढ़ा दिया जाता है। इस प्रक्रिया के द्वारा पीपी तैयार की जाती है। सजावट के लिए इसके ऊपर लाल- पीली, नीली – हरी कागज की एक-दो पट्टी चिपका दी जाती है। इससे पीपी आकर्षक लगने लगती है। इसी पीपी में जब एक गुब्बारा बांध दिया जाता है तो सांस के साथ गुब्बारा फूलता है और देर तक पीपी में से सुरीली आवाज निकलती रहती है।

आज के आधूनिक युग में बच्चों के लिए एक से बढ़कर एक खिलौने आ गए हैं। बच्चों के मनोरंजन के साधनों का चाहे जितना भी विकास हो गया हो लेकिन उन दिनों के मेले – ठेलों में मिलने वाली पीपी की सुरीली आवाज सुनकर बच्चों के मासूम चेहरों पर आने वाली मुस्कान की बराबरी कोई नहीं कर सकता।

__________

कागज के रंगीन चश्मे
______

पीपी के साथ ही एक और कुटीर उद्योग देवबंद में कागज के रंगीन चश्मे बनाने का है।

भारत के मेले – ठेलों में पी पी के साथ साथ छोटे बच्चे कागज के रंगीन चश्मे भी लेकर बहुत खुश होते हैं।

ये कागज के रंगीन चश्मे बनते हैं। पुराने गत्ते, पुरानी साइकिल की ट्यूब, पुराना पतला टीन और रंगीन सनलाइट पेपर, इस कच्चे माल से देवबंद में ये रंगीन चश्मे तैयार किए जाते हैं। बहुत ही मामूली कीमत के यह साधारण से कागज के चश्मे जब छोटे-छोटे बच्चे अपनी आंखों पर लगा कर और पीपी बजाते हुए मेलों में घूमते हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *