_____________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १००कि.मी. के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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बागपत जनपद में बरनावा के अति प्राचीन लाक्षागृह टीले पर उस गुरुकुल परंपरा का निर्वाह आज भी किया जा रहा है जैसा कि गुरु द्रोणाचार्य के समय में यहां पर किया जाता था। यहां के गुरुकुल में शिक्षार्थियों को संस्कृत शिक्षा के साथ- साथ शास्त्रों का अध्ययन एवं शस्त्र का प्रशिक्षण गुरुकुल पद्धति के माध्यम से ही दिया जाता है।

आज के समय में भी बरनावा ऋषि-मुनियों द्वारा संजोई गई वैदिक भारतीय संस्कृति के कारण श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा एवं आस्था का केंद्र बना हुआ है।

प्राचीन ऐतिहासिक स्थान होने के कारण यह स्थल पुरातत्व विभाग के द्वारा संरक्षित है। सन १९६० तक यह एक निर्जन और उजड़ा हुआ स्थान था। इसी वर्ष इस स्थान पर आध्यात्मिक जगत की महान विभूति, पुनर्जन्म के साक्षात चमत्कार एवं अद्भुत योगी ब्रह्मचारी कृष्ण दत्त जी का आगमन हुआ। कृष्ण दत्त जी महाराज गाजियाबाद जिले के खुर्रम पुर गांव के रहने वाले थे। माना जाता है कि कृष्ण दत्त जी महाराज पूर्व जन्म में श्रृंगी ऋषि थे। जिस समय वे समाधि की अवस्था में होते थे। उनमें श्रृंगी ऋषि की आत्मा प्रवेश करती थी और वह धारा प्रवाह संस्कृत भाषा में प्रवचन करते थे। समाधि की अवस्था में ब्रह्मचारी कृष्ण दत्त जी के प्रवचन करते समय ऐसा लगता था जैसे कोई आदि ऋषि अपनी शिष्य मंडली को इहलोक और परलोक की गाथा सुना रहा हो।

उन्होंने इस प्राचीन स्थली को ही अपना निवास स्थान बना लिया। इनसे प्रेरणा लेकर आसपास के ग्राम वासियों ने यहां गांधीधाम समिति (रजि.) की स्थापना की जिसके अंतर्गत हिंडन और कृष्णा नदी के संगम पर स्थित बरनावा के प्राचीन लाक्षागृह टीले पर वर्ष 1977 में श्री महानंद संस्कृत माध्यमिक गुरुकुल की स्थापना की गई थी। यहां प्राचीन वैदिक पद्धति के अनुसार विद्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा एवं उनके आवास का प्रबंध है।

यहां पांच विशाल यज्ञशालाएं श्री महानंद मंदिर श्री महानंद हाल गौशाला आदि विशेष रूप से दर्शनीय है। ब्रह्मचारी जी ने अथक प्रयत्नों से यहां की ऊंची नीची भूमि को समतल करवाया था। अब यहां लहलहाती खेती और विभिन्न प्रकार के फूल पौधों के साथ यहां के रमणीक वातावरण को देखकर यहां आने वाले का मन प्रसन्न हो जाता है।

इस गुरुकुल से अब तक कई हजार छात्र शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं, जिन्हें चारों वेद कंठस्थ हैं। यहां के छात्रों को उत्तर प्रदेश बोर्ड की पुस्तकों के अध्ययन के साथ- साथ शास्त्रों का ज्ञान भी कराया जाता है। कई प्रांतों से आने वाले छात्रों को वेदों के अध्ययन के साथ-साथ प्राचीन अस्त्र शस्त्र जैसे लाठी भाला फरसा आदि चलाने में भी पारंगत किया जाता है।

इस ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल का पुनरुद्धार करने के लिए आदि श्रृंगी ऋषि की आत्मा पूज्य ब्रहमचारी कृष्णदत्त जी महाराज यहां आए। निरक्षर होते हुए भी वह वेदों के प्रकांड विद्वान थे। चारों वेद उनको कंठस्थ और वैदिक संस्कृति का उन्हें पूरा ज्ञान था। लेकिन उनमें यह सारा वैदिक ज्ञान समाधि की अवस्था में ही होता था। समाधि की अवस्था से बाहर निकलने के बाद वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही होते थे।

उनका जन्म एक जुलाहा परिवार में हुआ था। परिवार की आर्थिक तंगी के कारण उनकी शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं हो सका था। आत्म संचित पूर्व जन्म के सांसारिक ज्ञान होने के कारण ब्रह्मचारी जी बचपन से ही धारा प्रवाह प्रवचन करने लगे थे। बचपन में भूत प्रेत का साया मानकर उनके परिवार वाले उन्हें कई स्थानों पर जादू- टोने का इलाज कराने के लिए भी ले गए थे। 10 वर्ष की उम्र में उनके परिजनों ने ब्रह्मचारी जी को बरनावा के एक त्यागी परिवार में छोड़ दिया। यहां ब्रह्मचारी जी जैसे ही लेटते वैसे ही प्रवचन की मुद्रा में आ जाते थे। उन्होंने प्रवचन में ही बरनावा लाक्षागृह का उल्लेख किया था। इसके बाद ब्रह्मचारी जी बरनावा के लाक्षागृह के टीले पर रहने लगे थे।

ब्रह्मचारी कृष्ण दत्त जी पूर्व जन्म के साक्षात प्रमाण थे। इसके बारे में बताया जाता है कि ब्रह्मचारी जी पूर्व जन्म में श्रृंगी ऋषि के नाम से जाने जाते थे। उन्हें ब्रह्मा जी ने श्राप दिया था कि उन्हें कलयुग में जन्म लेना पड़ेगा और निरक्षर रहते हुए भी उन्हें वेदों और वैदिक संस्कृति का पूरा का ज्ञान रहेगा। समाधि लगाने के बाद ही वह शास्त्रों पर बोलेंगे। समाधि खत्म होने के बाद वह एक साधारण व्यक्ति की तरह ही वे रहेंगे।

”ब्रह्मा जी ने श्रृंगी ऋषि को क्यों श्राप दिया था। इसके पीछे एक रोचक कथा है। ब्रह्मा जी के पुत्र अटूटी मुनि को घोर तपस्या करने के बाद यह अभिमान हो गया कि उनसे अधिक ज्ञानवान कोई नहीं है। यहां तक कि उनके पिता ब्रह्मा जी भी नहीं। अपने मन की यह बात उन्होंने ब्रह्मा जी के शिष्य श्रृंगी ऋषि से भी कहीं श्रृंगी ऋषि को उनकी है बात बुरी लगी। उनके समझाने पर भी अटूटी मुनि पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ तो श्रृंगी ऋषि ने कुपित होकर यह श्राप दे दिया कि वह तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो जाएं। श्रृंगी ऋषि के श्राप के कारण ब्रह्मा जी के पुत्र अटूटी मुनि  की तुरंत ही मृत्यु हो गई इससे हाहाकार मच गया। ब्रह्माजी जी ने ऋषि मुनियों की एक सभा बुलाई और उसमें श्रृंगी ऋषि को कहा गया कि उन्हें ब्रह्मा जी के पुत्र को मृत्यु का श्राप नहीं देना चाहिए था इसलिए दंड स्वरूप उन्हें सजा दी गई कि वह अपना सारा ज्ञान भूल जाएं और धरती पर बार-बार जन्म लेते रहें। इस पर श्रृंगी ऋषि ने अपने गुरु ब्रह्मा जी से क्षमा याचना करते हुए अपने उद्धार का मार्ग पूछा तो ब्रह्मा जी ने कहां की वे सभी युगों में श्रृंगी ऋषि के रूप में जन्म लेते रहेंगे लेकिन उन्हें मोक्ष कलयुग में ही मिलेगा। कलयुग में श्रृंगी ऋषि के रूप में जन्म लेने पर उन्हें पूर्व जन्मों का स्मरण नहीं रहेगा केवल समाधि की अवस्था में ही उन्हें श्रृंगी ऋषि की अवस्था प्राप्त होगी।”

पूर्व जन्म में उन्हें मिले श्राप के कारण ही ऐसा होता था। ब्रह्मचारी जी ने पहले ही अपना शरीर त्यागने की भविष्यवाणी कर दी थी। मात्र 50 वर्ष की उम्र में देह त्याग कर मोक्ष प्राप्त किया।

ब्रह्मलीन ब्रह्मचारी श्री कृष्ण दास जी महाराज ने ‘महाभारत रहस्य’ पुस्तक लिखी है। उसमें भी उन्होंने बरनावा लक्षागृह का उल्लेख किया है। उन्होंने इस पुस्तक में लिखा है कि गुरु द्रोणाचार्य का विद्यालय लाक्षागृह पर ही चलता था। इसमें ५000 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे। इस पुस्तक में यह भी बताया गया है कि महाभारत के युद्ध के बाद भी बरनावा में विशाल विद्यालय चलता था। इसमें महाबली भीम के पुत्र घटोत्कच, धनुर्धर अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव से संबंधित साहित्य मौजूद था। इनकी विज्ञानशाला बरनावा में ही चलती थी और अंतरिक्ष में जाने के यंत्र के आविष्कार की विज्ञान शाला और नाना प्रकार की धातुओं को जानने की प्रयोगशालाएं भी यहीं थी।
इन सब से संबंधित हर प्रकार का साहित्य यहां पर बाहर से आए हुए आक्रमणकारियों ने आग में जला दिया था।

ब्रह्मचारी कृष्ण दत्त जी महाराज यहां प्रतिवर्ष चतुर्वेद पारायण यज्ञ करवाते थे, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों के विद्वान सम्मिलित होते थे। लाक्षागृह से सटी हुई यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद की एक-एक और ऋग्वेद की दो यज्ञशालाएं बनी हुई है। जहां हर साल महाशिवरात्रि के बाद चतुर्वेद पारायण महायज्ञ का आयोजन होता है। आठ दिन तक चलने वाले इस यज्ञ में देशभर से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। यज्ञ की समाप्ति पर बड़ा मेला भी लगता है।

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