______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी. दायरे मेंं गंगा- यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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झंडा मेला, गुरु राम राय के देहरादून आगमन की स्मृति में लगता है। प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला झंडारोहण समारोह, उससे जुड़े कर्मकांड और झंडा मेला देहरादून की संस्कृतिक परंपरा बन ग‌ए हैं। यह मेला प्रत्येक वर्ष होली के पांचवे दिन गुरु राम राय के जन्मदिन चैत्र कृष्ण पंचमी से प्रारंभ होता है। झंडा मेला का सबसे महत्वपूर्ण क्षण झंडारोहण होता है। कहा जाता है कि यहां आने पर गुरु राम राय ने जिस स्थान पर सर्वप्रथम अपना चाबुक रखा था उसी स्थान पर झंडारोहण होता है।

गुरु मंदिर के शिलालेख के अनुसार श्री गुरु राम राय ने स्वयं अपने गुरु मंदिर के आगे झंडा स्तंभ स्थापित किया था। गुरु जी के जीवन काल में ही झंडारोहण का उत्सव प्रचलित हो गया था।

श्री गुरु राम राय के जय-जयकारे लगाते हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ दरबार साहिब में झंडे को चढ़ाया जाता है और इसके साथ ही दून के ऐतिहासिक झंडा मेला की विधिवत शुरुआत हो जाती है।

श्री गुरु राम राय की धरती दरबार साहिब और आसपास का पूरा इलाका सुबह से ही उत्सव के रंग में डूब जाता है। दोपहर बाद श्रद्धालु महंत जी के मार्गदर्शन में झंडा साहिब को चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। धीरे-धीरे धरती से उठ कर आसमान का रुख करते हुए झंडे साहिब को देखकर श्रद्धालु निहाल हो जाते हैं। जैसे ही नए झंडे जी अपने स्थान पर विराजमान होते हैं, हजारों श्रद्धालुओं के कंठ से निकले श्री गुरु राम राय जी की जय-जय कार से वातावरण गूंज उठता है।

बाबा जी की यादगार के रूप में विशाल दरबार भवन की प्राचीन इमारत के पश्चिमी द्वार पर लगभग 100 फुट ऊंचा झंडा प्रतिवर्ष चढ़ाया जाता है। होली के पांचवे दिन चैत्र मास की पंचमी को बाबा के जन्म दिवस पर देहरादून का विशाल झंडा मेला झंडारोहण के साथ शुरू होता है। मेला प्रारंभ होने से पहले ही पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित विभिन्न स्थानों से हजारों श्रद्धालु यहां श्री गुरु राम राय दरबार में पहुंच चुके होते हैं। अनगिनत अनुयाई पवित्रता के प्रतीक दरबार के दर्शन कर अपने भावी सुखद भविष्य की कामना करते हुए मन्नत मांगते हैं।

बड़े-बड़े बुर्जोंवाले ऊंचे परकोटे से घिरे मुगल वास्तु शैली में निर्मित हवेलीनुमा इमारत दरबार साहब के पश्चिमी द्वार के सामने लहराता लगभग एक सौ फीट ऊंचा झंडा। हरे-पीले, सुनहले-रुपहले गोटों से सजा संवरा यह लंबा-तिकोना झंडा केवल झंडा नहीं है, अनुयायियों की दृष्टि में यह इस झंडे के संस्थापक गुरु राम राय की आध्यात्मिक-चमत्कारिक शक्तियों से प्राण-प्रतिष्ठित का प्रतीक है। गुरु महाराज ने दरबार में लोक कल्याण के लिए एक विशाल झंडा लगाकर लोगों को इसी ध्वज से आशीर्वाद प्राप्त करने का संदेश दिया। इसी के साथ झंडा साहब के दर्शन की परंपरा शुरू हो गई। श्रद्धालु झंडा साहब का दर्शन कर मन्नत मांगते हैं। अब यह दरबार झंडा साहब जन आस्था के साथ लोककल्याण स्थली रूप में चर्चित हो गया है।

इस समारोह में संगत, विशेषतया-पंजाब हरियाणा की ओर से आने वाली संगत का सामाजिक-ऐतिहासिक महत्व है। दरबार से भेजे गए हुकुमनामे के आधार पर संगत चंडीगढ़ के पास खराड़ तहसील में बसे बहलोलपुर में इकट्ठा होती है। फिर वहां से पैदल चलकर बड़े गांव गोपाल मोचन, खिजराबाद आदि गांव में ठहरती हुई फाल्गुन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को यह संगत र‌इयॉवाला पहुंचती है, यह स्थान देहरादून से लगभग 45 किलोमीटर दूर यमुनापार हरियाणा में बसा एक गांव है। यहां परंपरा के अनुसार महंत उसकी अगवानी करते हैं। कहा जाता है कि दून घाटी में आने से पहले गुरु राम राय जी ने यहां अपना झंडा फहराया था। संगत और आसपास के ग्राम वासियों के साथ यहां प्रतिवर्ष गुरु राम राय का झंडा चढ़ाया जाता है। इसके दूसरे दिन सहसपुर संगत की अगवानी करने के बाद फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी को दरबार से केवल तीन किलोमीटर दूर कॉवली से महंत के पीछे पीछे चलती संगत दर्शनी दरवाजे से दरबार में प्रवेश करने के बाद गुरु की समाधि पर मत्था टेक कर समाधि की परिक्रमा करती है। पैदल ही संगत के आने के साथ साथ संगत बढ़नी शुरू हो जाती है।

झंडारोहण के लिए स्तंभ बनाने हेतु लट्ठा देहरादून सहारनपुर की सीमा पर नागसिद्ध नामक वन के दूधली के जंगल (राजाजी नेशनल पार्क) से लाया जाता है। प्रयास यही किया जाता है कि एक ही लट्ठे का प्रयोग किया जाए, जरूरत पड़ने पर दो लट्ठे भी जोड़ दिए जाते हैं।

भारत के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालु दरबार साहब के तालाब में भोर के समय स्नान करते हैं। सुबह प्रातः काल दरबार साहब में पूजा अर्चना के बाद पुराने झंडे को उतारने की प्रक्रिया शुरू होती है। सबसे पहले बड़ी-बड़ी सिढ़ियों के सहारे झंडे की पुरानी रस्सियां बदली जाती हैं, इसके बाद नई रस्सियों और बल्लियों के सहारे झंडे को जमीन पर लाया जाता है और उसका खोल उतार दिया जाता है। श्रद्धालु झंडे जी से उतारे गए वस्त्रों को बतौर गुरु की निशानी अपने पास रखते हैं। लगभग सौ फीट लंबे नए झंडे जी को दूध, दही और गंगाजल से नहलाने के बाद लट्ठे पर दही, चंदन तथा हल्दी का लेप किया जाता है उसके बाद नए वस्त्रों से लट्ठे को सुसज्जित किया जाता है। सबसे पहले मार्किन के 41 वस्त्रों का गिलाफ चढ़ाया जाता है, इसके बाद मनोकामना पूरी होने पर शनील के गिलाफ चढ़ाए जाते हैं। दोपहर तक दर्शनी गिलाफ चढ़ाने के बाद झंडा साहब को चांदी के कलश, लोहे की सीक, चांदी की चैन से लपेटा जाता है। दरबार की ओर से दिए गए पीले मखमली खोल को लट्ठे में पहनाकर, ऊपर से सुनहले-रुपहले तारों से कढ़ा गहरी लाल रंग का मखमली खोल पहनाया जाता है और भक्तों के द्वारा अर्पित सुनहरी झालर वाले लाल नारंगी रुमाल और चिटे बांधे जाते हैं। यह कार्य दिन ढलने तक चलता रहता है।

दिन ढलते जब संध्या का आगमन होने लगता है तब महंत जी के इशारे पर संगत झंडा चढ़ाने की रस्म अदा करती है। पहले छोटी-छोटी बिल्लियों की टेक और झंडे से बंधी रस्सियों के सहारे झंडे का अगला भाग धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाया जाता है। हाथ जोड़े, अल्पक, मंत्रमुग्ध सी खड़ी श्रद्धालु संगत जब गड्ढे में झंडे के बैठने की धम्म की आवाज सुनती है तो उसके मुंह से ‘गुरु राम राय की जय’, ‘गुरु गोविंद सिंह की जय’, ‘गुरु नानक की जय’, ‘झंडा साहब की जय’ के जय- जयकारे फूट पड़ते हैं।

अर्धरात्रि तक श्रद्धालु संगत द्वारा झंडा, भंडारी चौक, रामलीला बाजार, हनुमान चौक, दर्शनी गेट, बारहदरी और झंडे के बीच परिक्रमा चलती रहती है। यह परिक्रमा-परिधि देहरादून की पुरानी मूल सीमा है।

श्रद्धालु इस पर प्रसाद चढ़ाकर मत्था टेकते हैं और मन्नत मांगते हैं।

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