_______________________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के१०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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कुंभ को पुराणों में वर्णित समुद्र मंथन की कथा से जोड़कर देखा जाता है। हरिद्वार और यहां का कुंभ महापर्व कई मायनो में विशिष्ट है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण, शिव पुराण, ब्रह्मांड पुराण, तीर्थ दर्पण, ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि धर्म ग्रंथों में कुंभ का वर्णन मिलता है।

पौराणिक शास्त्रों के अनुसार समुद्र मंथन में निकले अमृत कुंभ के लिए देवताओं और दैत्यों में विवाद हो गया था। इंद्र के पुत्र जयंत अमृत कुंभ ले भागे और दैत्य उनके पीछे भागे। देवताओं और दैत्यों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस संघर्ष में जयंत अमृत कुंभ को लेकर भागते रहे और दैत्य भी उनका पीछा करते रहे। इस अवधि में जिन स्थानों पर अमृत कुंभ रखा गया वहां अमृत की कुछ बूंदे गिर गई और वे स्थान पवित्र बन गए।

अमृत कुंभ की रक्षा चंद्रमा, सूर्य, बृहस्पति और शनी ने की थी। बृहस्पति ने अमृत कुंभ को दैत्यों के द्वारा अपहरण से, सूर्य ने अमृत कुंभ को फूटने से, चंद्रमा ने अमृत कुंभ से अमृत को छलकने से तथा शनि ने कहीं जयंत अकेला ही अमृत को उडा न ले इससे अमृत कुंभ को बचाया था। इस कारण इन ग्रहों के विभिन्न योग से पृथ्वी पर कुंभ महापर्व मनाए जाते हैं।

बृहस्पति ग्रह के चार विभिन्न राशियों में प्रत्येक बारहवें वर्ष प्रवेश के उपलक्ष में पृथ्वी के चार अलग-अलग स्थानों पर कुंभ महापर्व आयोजित होता है।पृथ्वी के ये चार स्थान हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक हैं । इन चार स्थानों पर ही कुंभ महापर्व का आयोजन होता है।

भारतवर्ष की सनातन संस्कृति के सूक्ष्मदर्शी ज्योतिर्विदों, ऋषियों, एवं आचार्यों के अनुसार सूर्य के मेष राशि तथा बृहस्पति के कुंभ राशि में आने पर अमृत वर्षा अधिक शुद्ध रूप में केवल हरिद्वार में होती है । बृहस्पति के कुंभ राशि के प्रवेश करने पर स्नान की महिमा बढ़ जाती है।

ज्योतिषीय गणना के आधार पर ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थितियों के आधार पर हर बारहवें वर्ष कुंभ महापर्व मनाया जाता है। कुंभ महापर्व का ज्योतिषपरक पक्ष भी विशेष महत्वपूर्ण है। विष्णु पुराण में कुंभ का नियंत्रण इस प्रकार किया गया है –

पद् मिनी नायको मेरे कुंभ राशि गणों गुरु: ,

गंगाद्वारे भवेद् योग: कुंभ नाम तदोत्तम:।

अर्थात गंगा द्वारे यानी हरिद्वार में जब सूर्य (पद्मिनी नायक) मेघ राशि तथा बृहस्पति कुंभ राशि पर होते हैं तब यहां कुंभ का योग पड़ता है।

ज्योतिर्विदों के अनुसार महाकुंभ पर्व के कारक ग्रहों में तीन प्रधान ग्रह हैं – बृहस्पति, सूर्य व चंद्रमा। ये तीनों ग्रह जब किन्ही निश्चित राशियों पर क्रमश: संक्रमण करते हैं तो ‘कुंभ योग’ होता है। कुंभ महापर्व के बनने का सीधा संबंध सौरमंडल के ग्रहों की गति से है। सौर मंडल के विशिष्ट ग्रहों के विशिष्ट राशियों में पहुंचने पर बने खगोलीय संयोगों के कारण कुंभ महापर्व का आयोजन होता है।

महापर्व कुंभ हमारी पौराणिक संस्कृति का पर्व है। भारतवर्ष में जिसकी परंपरा सहस्त्रों वर्षों से अनवरत चली आ रही है। इस परंपरा को अंधविश्वास कहकर झूठलाया नहीं जा सकता। इस परंपरा का संबंध वेद, पुराण, धर्म, अध्यात्म, समाज, इतिहास, ज्योतिष शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, खगोल शास्त्र तथा विज्ञान की कसौटी पर भी खरा उतरता है।

विज्ञान भी बताता है कि विभिन्न ग्रहों, उपग्रहों एवं नक्षत्रों के निरंतर घूमते रहने के फलस्वरूप यह पृथ्वी कभी जीवनवर्धक तत्वों और कभी जीवनसंहारक तत्वौं से परिपूर्ण हो जाती है। पृथ्वी के जिस क्षेत्र में विभिन्न ग्रह नक्षत्रों की विशिष्ट स्थिति के कारण जिस काल में जीवनवर्धक तत्व प्रमुखता से सर्वाधिक एवं प्रचुर मात्रा में हो उन स्थानों पर कुंभ महापर्व का आयोजन किया जाए जिससे उस स्थान की नदी के जल में स्नान करने पर मनुष्य निरोगी एवं दीर्घजीवी बने।

पौराणिक मान्यता भी यही है कि उस समय ग्रहों के संयोग पर जिस घड़ी और पल में पृथ्वी पर अमृत की बूंदें छलकी थी वही ग्रह नक्षत्रों का संयोग उसी घड़ी और पल में बनने पर अवतरित हो उठता है। उस समय नदी के जल की एक एक बूंद अमृत से परिपूर्ण होकर पतित पावनी बन जाती है और उस पावन जल में मनुष्य स्नान करके अपने जन्म जन्मांतर के पापों और व्याधियों को दूर कर लेता है।

ज्योतिष के आधार पर पर्वों का निश्चय होता है और एक विश्वास के साथ बिना बुलाए कितने लोग विभिन्न क्षेत्रों से एक ही स्थान पर एकत्र हो जाते हैं।

महाकुंभ पर्व का यह ज्योतिषीय पक्ष मनुष्य को सक्रियता प्रदान करता है। जिसके फलस्वरूप देश विदेश की भाषा जाति, वर्ण, रंग, आयु तथा साधन आदि के अनेक भेदों और अंतरों को भुलाकर और संकुचित विचारों से ऊपर उठकर आस्था बलवती होकर विघटनकारी तत्वों को ध्वस्त कर देती है।

कुंभ महापर्व वस्तुतः संपूर्ण समाज की विचार शुद्धि का महान पर्व है। इस विशिष्ट अवसर पर विश्व के प्रत्येक भाग से उमड़ कर आया अपार जनसमूह न केवल तीर्थ के पवित्र जल में स्नान कर पुण्य अर्जित करता है अपितु उस तीर्थ में संतों के उपदेश रूपी अमृत का लाभ प्राप्त करके आत्म शुद्धि भी करता है।

कुंभ महापर्व के अवसर पर भारतीय सनातन धर्म और संस्कृति मानने वाले सभी संप्रदायों के धर्मानुयायी एकत्रित होकर अपने समाज, धर्म एवं राष्ट्र की एकता अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए विचार विमर्श करते हैं। स्नान, दान, तर्पण तथा यज्ञ के पवित्र वातावरण से देवगन भी आकृष्ट हुए बिना नहीं रह सकते। ऐसी मान्यता है कुंभ महापर्व पर सभी देवगन तथा अन्य पितृ, यक्ष-गंधर्व आदि भी पृथ्वी पर उपस्थित होकर न केवल मनुष्यमात्र अपितु जीवमात्र को अपनी पावन उपस्थिति से पवित्र करते रहते हैं।

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