_______________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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गंगा-यमुना के इस क्षेत्र में भित्तिचित्रकला का स्वर्णिम इतिहास रहा है। भारतीय कला और संस्कृति के नयनाभिराम भित्ति चित्रों को आज भी यहां देखा जा सकता है।

लेकिन अब बदलते परिवेश में यह कला लुप्त होने के कगार पर है। बदलती हुई रुचियों में भित्तिचित्रों की यह परंपरा अब समाप्त हो रही है। एक दिन इतिहास की गवाह बची यह कुछ दीवारें भी संरक्षण के अभाव में नष्ट हो जाएंगी और इस परंपरा को इतिहास के पन्नों में ही तलाशना पड़ेगा।

भित्ति चित्रों को बनाने के विषय धार्मिक हैं। भगवान श्री कृष्ण और श्री राम के जीवन पर चित्र अधिक मात्रा में बनाए गए हैं। श्री कृष्ण, राम ,शिव, विष्णु, दुर्गा आदि से संबंधित प्रसंगों को रोचकता से दर्शाया गया है।

इसके अतिरिक्त उस समय के सामंती और संपन्न व्यक्तियों, साधारण लोक जीवन की दिनचर्या, प्रेम प्रसंग, बिहारी सतसई से प्रेरित कुछ श्रंगारिक भावपूर्ण विषय, ऐतिहासिक प्रसंग, लोक गाथाओं के रोचक अंश, उस समय के कुछ व्यक्तियों के पोर्ट्रेट पशु- पक्षियों के चित्र इसके अलावा फूल पत्तियों रूप अलंकारों के द्वारा सजाए गए एक से बढ़कर एक सुंदर पैनल, आलेखन और बारीक सजावट अपने आप में बहुत ही अनूठी और अनोखी है। इन चित्रों में ऐसा सम्मोहन है कि राह चलते दर्शकों के बढ़ते कदम अनायास रुक जाते हैं और इन चित्रों से निगाहें हटती ही नहीं है।

भित्तिचित्रों का चित्रण कुशल हाथों से हुआ है। इन भित्ति चित्रों को बनाने के लिए रंगो को खनिज और वनस्पति तथा रासायनिक पदार्थों हरड़, पलाश, कुसुम, मेहंदी, गेरू, सिंदूर, सफेदा, काजल आदि से तैयार किया जाता था तथा शंख का लेप भी। उड़द की पीठी का भी प्रयोग होता था।

इन चित्रों को बनाने में भारतीय चित्रकला की जानी-मानी मुगल, पहाड़ी और कंपनी चित्र शैलियों की मिली जुली विशेषताओं और इन चित्रों को बनाने वाले चित्र कारों की अपनी स्वयं की विशेषताओं के समावेश से बनी एक नई चित्र शैली में इन चित्रों को बनाया गया है।

इन चित्रों की मानवाकृतियों की वेशभूषा तथा अन्य सामग्री से हिंदू ,मुगल और अंग्रेजी संस्कृति की छाप दृष्टिगोचर होती है।

कलात्मक भित्ति चित्रों का निर्माण यहां उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से लेकर बीसवीं शताब्दी के लगभग मध्यकाल तक होता रहा। इस क्षेत्र में सहारनपुर जनपद और हरिद्वार जनपद में ही इस काल में बने कुछ बचे हुए पुराने भवनों पर कलात्मक महत्व के भित्ति चित्र को  देखा  जा सकता है । लगभग सौ  वर्षों के उस काल की गाथा इन चित्रों में संजोयी हुई है। इससे पहले के 18वीं  शताब्दी के काल में भी इस क्षेत्र में भवनों पर भित्तिचित्रण की परंपरा रही होगी लेकिन उस समय के भवन अब काल के गर्त में समा चुके हैं।

जिन लोगों ने इन नयनाभिराम चित्रों को बनाया है। उन चित्रकारों ने चित्रों पर या अन्य किसी स्थान पर अपना नाम या कोई पहचान तक नहीं छोड़ी है लेकिन समाज को एक अमूल्य निधि दे डाली। यह चित्र समूचे गंगा- यमुना के ठेट पश्चिमी – उत्तरी  इलाके की सांस्कृतिक धरोहर है।

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हरिद्वार जनपद
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हरिद्वार केवल एक तीर्थ स्थल ही नहीं बल्कि कला और संस्कृति का भी केंद्र रहा है। हरिद्वार जनपद के कनखल, झबरेड़ा ,भगवानपुर, मंगलौर ,लंढोरा आदि कस्बों के पुराने भवनों पर सुंदर भित्ति चित्र बने हुए हैं

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कनखल –

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पौराणिक नगरी कनखल का धार्मिक रूप से बहुत महत्व है। कनखल में साधु-संतों के अखाड़ों एवं आश्रमों की भरमार है। धार्मिक स्थान होने के कारण पुराने समय में सेठ – साहूकारों ने भी यहां बड़ी-बड़ी हवेलियों का निर्माण करवाया था।

कनखल नगरी के मोहल्लों और सड़कों – बाज़ारों में घूमते हुए प्राचीन अखाड़ों और सेठ साहूकारों द्वारा बनवाई गई हवेलियों के खंडहर जहां-तहां दिखाई पड़ जाते हैं। इन प्राचीन टूटे हुए खंडहरों पर कलात्मक और बहुत ही सुंदर भित्तिचित्र अंकित है। साधुओं के अखाड़ों की हवेलियां तो किले के किले जैसी प्रतीत होती हैं। अखाड़ों की यह विशाल हवेलियों के खंडहर भी भित्तिचित्रों से सजे हुए हैं। इन प्राचीन हवेलियों को देखकर यह समझा जा सकता है कि ऐतिहासिक युग में यह कनखल नगरी विशालकाय कलात्मक भवनों का नगर रही होगी।

यहां के पुराने मकानों में आज भी भित्ति चित्र बने हुए मौजूद है बहुत से पुराने मकानों के कमरों की दीवारों के चित्र तो मिटा दिए गए हैं। लेकिन बाहरी हिस्सों में वह आज भी दिखाई देते हैं।

कनखल में प्रजापति मंदिर तथा निर्मल अखाड़ा इस भित्ति चित्रकला के गौरवशाली इतिहास के गवाह हैं। इनके अलावा कई पुराने भवनों में भी यह कला आज भी जिंदा है।

मंगला बांदी की हवेली – इस हवेली के द्वार में बने भित्तिचित्र आज भी स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं।

कनखल में नजीबाबाद के नवाब के खजांची लाला भारामल ने अनेकों भवनों एवं हवेलियों का निर्माण करवाया था यह इमारतें अब खंडहर के रूप में है। लेकिन इन हवेलियों के खंडहरों पर बने भित्तिचित्र स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते हैं।

इन हवेलियों के भित्ति चित्रों के विषय धार्मिक कथा कहानियों के चित्रों के अलावा ऐतिहासिक महापुरुषों लोक रुचियों, पशु पक्षी एवं और पुरुषों के अलंकरण के चित्र भी बने हैं। राजस्थान और मुगल शैली में भी चित्र बने हैं। इन भित्तिचित्रों पर युवा चित्रकारों ने शोध भी किए हैं।

कनखल पौराणिक और ऐतिहासिक नगरी के साथ कला की दृष्टि से भी किसी समय संपन्न और समृद्ध नगरी थी। धार्मिक श्रद्धालु देवी सती और दक्षेश्वर महादेव के दर्शनों के लिए यहां आते हैं तो पर्यटक और कला प्रेमियों के लिए यहां प्राकृतिक दृश्य और कला से भौतिक सुख और आनंद है।

हरिद्वार आएं तो एक बार अवश्य कनखल के गली बाजारों में घूमते हुए आज भी सजीव भित्ति चित्रों को देखने का आनंद लें।

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सहारनपुर जनपद

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सहारनपुर जनपद में भित्ति चित्र कला के रूप में सांस्कृतिक धरोहर  आज भी देखी जा सकती है। जनपद के नकुड, गंगोह,  देवबंद ,कोटा  आदि कस्बों एवं ग्रामीण  क्षेत्र के  चिल्काना ,सुलतानपुर आदि अन्य गांवों के अनेक भवनों पर  भित्तिचित्र देखे जा सकते हैं। सहारनपुर नगर के कई प्राचीन भवनों में भी सुंदर भित्तिचित्र बने हुए हैं। इन भवनों के छज्जे, खिड़कियां, कंगूरे मेहराब, साए, छत, कोने, छतरी, गुमटी, आले, दीवारें आदि छोटे- बड़े भित्ति चित्रों व फूल – पत्तियों की आकर्षक सजावटों से अटे पड़े हैं।

इन भवनों में कोई – कोई हवेली तो इतनी ऊंची है कि किसी जमाने में इन पर बनी सुंदर चित्रकारी को राह चलते  व्यक्ति यकायक ठिठक कर  देखते तो देखते ही रह जाते थे।  भवनों पर बनी सुंदर चित्रकारी को  भरपूर नजरों से ऊपर तक देखने वालों की टोपियां तक गिर जाया करती थी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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