_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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गुग्गा जाहरवीर

 

लोक कथाओं के अनुसार गुग्गा का जन्म नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ जी की अनुकंपा और आशीर्वाद से हुआ था। इनका नाम भी गुरु गोरखनाथ जी द्वारा प्रसाद रूप में प्रदत गुग्गल के कारण पड़ा जो बाद में गुग्गा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

किवदंती है कि तपस्वी शिव योगी गुरु गोरखनाथ के मंत्र सिद्ध गुग्गल का प्रसाद सेवन कर रानी बाछल के गर्भ से महान यशस्वी और कीर्तिवान जहारवीर गोगाजी का जन्म हुआ था।

गुरु गोरखनाथ जी ने जो गुग्गल का प्रसाद रानी बाछल को दिया था। रानी ने वह प्रसाद पूर्ण ग्रहण न करते हुए उसको विभाजित कर अपनी निसंतान घोड़ी, सखी, महिला सफाईकर्मी और एक अन्य महिला को खिला दिया था। फलस्वरूप रानी बाछल ने तो जहारवीर गोगा जी को जन्म दिया। वहीं घोड़ी ने नीले रंग के घोड़े को जन्म दिया। जिसका नाम नीलांतजी रखा गया। रानी की सखी के पुत्र का नाम नरसिंह पांडे और सफाई कर्मी के पुत्र का नाम भज्जू रखा गया। वहीं जहारवीर ने उनके साथ पैदा हुए सभी बालकों को सखा रूप अपनाकर छुआछूत का विरोध किया। उनके साथी घोड़े नीलांतजी ने भी मृत्युपर्यंत जहारवीर का पूरा साथ दिया।

 

कहते हैं कि सांपों को साधने में गोगा जी को महारत हासिल थी वह गूग्गल नाम की औषधि से सांप के काटे का इलाज करते थे। अपने नीले घोड़े से भी उन्हें अत्यधिक प्रेम था। कथा किवदंती बताती है कि गोगाजी एक भयंकर रेतीले तूफान में घोड़े  समेत ही धरती में समा गए थे। गोगाजी के प्रति श्रद्धा रखने वाले उनके श्रद्धालु अनुयायी सांप, घोड़ा व गाय की  भी पूजा करते हैं और इन्हें कोई कष्ट नहीं देते। मान्यता है कि ऐसा करने से उनके आराध्य देव गोगा जी नाराज हो जाएंगे।

 

जोर जुल्म के खिलाफ अपने मौसेरे भाई अर्जन और सर्जन के साथ युद्ध करके उन्हें मौत के घाट उतार देने वाले जाहरवीर की वीरता की गाथा आज भी जोगी लोग और बागड़ यात्रा के यात्री लोकगीतों के द्वारा पूरी लय के साथ गाते देखें और सुने जा सकते हैं l

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इस क्षेत्र में गोगा जी एक लोक देवता के रूप में। प्रतिष्ठित हैं। जगह-जगह इनकी स्मृति में माढी की स्थापना की गई है और यहां पर प्रतिवर्ष मेलों का आयोजन किया जाता है। यह एकमात्र लोक देवता हैं जिनकी हिंदू और मुसलमान दोनों में एक पीर के रूप में मान्यता है।
गोगाजी के बारे में कई तरह की किंवदंतियां और गाथाएं प्रचलित है। लेकिन गोगाजी के बारे में सबसे ज्यादा वर्णन लोकगीतों के रूप में ही मिलता है। मान्यता है कि गोगाजी गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य थे। इनका पूरा जीवन देवीय गुणों और शक्तियों से ओतप्रोत है। कई बड़ी लड़ाइयों और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए भी इन्हें याद किया जाता है।

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इस क्षेत्र में सावन माह का दूसरा पखवाड़ा शुरू होते ही बागड़ यात्रा में जाने वाले श्रद्धालु जाहरवीर गोगा की छडियों के साथ लोकगीतों को गाते हुए सड़कों पर निकल पड़ते हैं। गोगाजी के श्रद्धालु भक्तों की  यह टोलियां भादो माह के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि तक चलती हैं। क्षेत्र के गांव कस्बों के गलियारे गोगाजी के जयकारों और ढोल की थाप के साथ उनकी वीरता के गीतों से गुंजायमान होते रहते हैं। जाहरवीर के अनुयाई पीली पोशाकें पहनकर अपने निकट की माढी पर छड़ी चढ़ाकर जात उतारने निकलते हैं। गोगा के इन श्रद्धालुओं में मुस्लिम समुदाय के लोग भी शामिल होते हैं। गोगा जी के श्रद्धालुओं में हिंदू एवं मुसलमान दोनों समुदाय के लोग होते हैं। वास्तव में गोगा जी दोनों समुदायों के साझा लोक देवता हैं।

जिन भक्तों की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं वे भक्त गोगा की माढी पर जात चढ़ाते हैं। श्रावण माह के मध्य से ही गोगा की माढी पर जात चढ़ाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस क्षेत्र में इन दिनों गांव दर गांव गोगा की गाथाओं का वर्णन लोकगीतों के रूप में गूंजने लगता है।

गोगा जी की मुख्य माढी राजस्थान के गंगानगर जिले में स्थित है। इस क्षेत्र के गांव कसबों में भी सैकडो की संख्या में माढी स्थित है। इन दिनों इस क्षेत्र से सैकड़ों लोग नित्य राजस्थान के गंगानगर जिले में स्थित माढी पर जात चढ़ाने जाते हैं।

जो श्रद्धालु  गंगानगर में स्थित मुख्य माढी पर जात चढ़ाने बागड़ जाते हैं। उनके भक्त बागड़ यात्रा में  ढोल धमाकों के साथ गलियों में निकल पड़ते हैं और छोटे-छोटे गांवों गलियारों नगरों में सड़कों का वातावरण जाहरवीरमय हो जाता है। बड़ी संख्या में महिलाएं बच्चे युवा व प्रौढ  सब पीले वस्त्रों की छटा बिखेरते हुए सड़कों पर उतरते हैं।  हाथ में छड़ी  और गोगा की गाथा वाले  लोकगीत गाते हुए यह अपने घर से पास के रेल व बस स्टेशन तक पैदल ही जाते हैं। जातरूओं को बागड़ की यात्रा के लिए रवाना करते समय महिलाएं पंखा झलती हुई चलती हैं और जातरू के आगे ढोल बजता चलता है। रास्ते में भोजन को मांग कर खाने की परंपरा अभी भी है। यद्यपि जोगियों की जमात और दोतारे या सारंगी, डबक डबक की आवाज करती डुगडुगी के साथ शाक्के (किस्से) गाने वाली परंपरा गांव में भी अब नदारद है। किंतु कुछ जोगी समाज के लोग अपने पुराने कर्तव्य  का निर्वहन आज भी करते नजर आ जाएंगे।

श्रद्धालुओं के जात देने के लिए घर से निकलने के बाद ही उस घर का माहौल पूरी तरह उत्सवमय हो जाता है। उस घर में गीत संगीत और नाच उत्सव का दौर लगातार चलता है। घर में सात्विक भोजन बनाया जाता है। उस परिवार के परिजन घर में आने वालों की पूरी आव भगत सम्मान करते हैं। पास पड़ोस की परिचित महिलाएं उस घर में  उबले गेहूं चने और प्याज देकर आती है जिसे चाब दे कर आना कहा जाता है। उस घर में चाब का आना और प्रसाद का वितरण लगभग हर समय होता रहता है। इसमें एक बात देखने वाली है कि जहां अन्य देवी देवताओं की पूजा प्रसाद में प्याज निषिद्ध होती है लेकिन गोगा जी के प्रसाद में प्याज शामिल होती है। इसके अतिरिक्त गोगा जी के प्रसाद में बाजरे के व्यंजन और गुड और आटे से बने फल भी प्रसाद में होते हैं।

इस दौरान गाए जाने वाले लोकगीतों में गोगा जी की जीवन से जुड़ी वीरता की कथा – कहानियों का वर्णन होता है।  उनकी पत्नी के विरह का वर्णन और उनकी माता बाछल के ममत्व को लोकगीतों में गाया जाता है।गुरु गोरखनाथ को भी लोकगीतों के द्वारा याद किया जाता है। लगभग एक सप्ताह बाद गोगा माडी की यात्रा पूरी करके जब श्रद्धालु अपने घर वापिस आते हैं तो गांव से बाहर उनका स्वागत कर ढोल धमाके के साथ उन्हें घर पर लाया जाता है। यात्रा पूरी करके वापस लौटने पर घरों में धार्मिक अनुष्ठान करने की परंपरा है।  वापस लौटने के तुरंत बाद पत्तल भरना का कार्य होता है इसके बाद कंदूरी के साथ ही यात्रा को पूरी तरह संपन्न माना जाता है।

कंदूरी उस सामूहिक भोज को कहा जाता है।  जिसमें जातरू परिवार  अपने सभी रिश्तेदारों मित्रों पास पड़ोस गांव मोहल्ले एवं जान पहचान के सभी लोगों को आग्रह पूर्वक इस भोज में बुलाता है और सह भोज करा कर अपने को धन्य मानता है। गोगा जी की गौरव गाथा को लोकगीतों में गाकर रात्रि जागरण भी किया जाता है।

गोगाजी एवं गुरु गोरखनाथ जी से जुड़े सभी धार्मिक कार्य एवं रात्रि जागरण जोगी जाति से जुड़े लोग ही संपन्न कराते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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