______________________________________________________ जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १००कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र की एक प्राचीन पारंपरिक धरोहर के बारे में – – –

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देहरादून जनपद व आसपास के पहाड़ी ग्रामीण इलाकों में घूमते हुए अभी भी किन्हीं स्थानों पर छप-छप और टक-टक की आवाज सुनाई दे रही है तो समझ जाएं, निश्चित ही आसपास कोई ‘घराट’ बना हुआ है। ‘घराट’ पहाड़ी इलाकों में परंपरागत रूप से प्रयुक्त एक प्रकार का पानी की धारा से चलने वाली पनचक्की है। जो गेहूं आदि अनाज पीसने के काम आता है।

शताब्दियों से पहाड़ी गांवों में परंपरागत रूप से आटा पीसने का काम ‘घराट'(पनचक्की) पर होता आ रहा है। पहाड़ों के सुदूर गांवों में वैकल्पिक उर्जा से चलने वाली ये पनचक्कियां पुराने जमाने से आटा पीसने का काम कर रही हैं। उस समय किसी ने वैकल्पिक ऊर्जा को एक अभियान के रूप में लेने की कल्पना भी न की होगी। सुदूर पहाड़ों के गांवों में जहां सड़क और बिजली आदि जैसी सुविधाएं कभी पहुंची भी नहीं थी, वैसे समय में भी यहां के गांवों में पहाड़ी जल धाराओं के सहारे आटा, दाल आदि अनाज पीसने का काम ‘घराट’ के द्वारा किया जाता था और आज के समय में भी किया जा रहा है।

आजकल तो ये ‘घराट’ (पनचक्की) केवल आटा, दाल,मसाले और मोटे अनाज आदि ही नहीं पीस रहे बल्कि अब खुद की बिजली भी पैदा कर रहे हैं और आसपास के घर-मकानों को भी रोशन कर रहे हैं। भारत सरकार के वैकल्पिक ऊर्जा विभाग ने इन्हें आर्थिक अनुदान देकर बिजली उत्पादन करने के लिए प्रेरित किया है।

यहां के पहाड़ी क्षेत्र के बहुत से गांवों में अभी भी ‘घराट’लगे हुए हैं। पर इनमें से कम ही चालू हैं। लेकिन बहुत से ‘घराट’ इस लायक हैं कि उन से बिजली पैदा करके कई गांवों को बिजली दी जा सकती है। कहा जाता है कि यदि इन घराटों को उन्नत बना दिया जाए तो बहुत से गांवों की ऊर्जा की जरूरतें बहुत हद तक पूरी की जा सकती हैं।

घराट पहाड़ी क्षेत्रों में आटा पीसने की एक पनचक्की है। इसका उपयोग यहां के लोग प्राचीन काल से करते आ रहे हैं। पानी से चलने के कारण इसे ‘घट’ या ‘ घराट ‘कहते हैं।

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