______________मुजफ्फरनगर जनपद के १००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र_________________________

पौराणिक गढ़मुक्तेश्वर

गढ़मुक्तेश्वर अत्यंत प्राचीन पौराणिक तीर्थ माना जाता है। शिव पुराण, विष्णु पुराण आदि ग्रंथों में इस तीर्थ को शिव वल्लभ नाम से संबोधित किया गया है।
भगवान विष्णु के गण जय और विजय को नारद जी के दिए श्राप के कारण मृत्यु लोक में आना पड़ा। उन्होंने अपनी मुक्ति के लिए अनेक तीर्थ स्थलों की यात्रा की, लेकिन कहीं भी उन्हें मुक्ति नहीं मिली। अंत में जय और विजय इस तीर्थ स्थल पर आए और यहां भगवान शंकर की उपासना की, भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर जय विजय को दर्शन दिए। यहां पर जय और विजय का उद्धार हुआ। भगवान विष्णु के गण जय विजय के उद्धार होने के कारण इस स्थान को गढ़मुक्तेश्वर के नाम से जाना जाने लगा।
भगवान परशुराम ने यहां शिव मंदिर की स्थापना की थी।

गढ़मुक्तेश्वर हिंदुओं का अति प्राचीनतम एवं प्रमुख इमतीर्थ स्थल है।
भगवान श्री राम के पूर्वज महाराजा शिवि ने अपना चतुर्थ आश्रम गढ़मुक्तेश्वर में ही व्यतीत किया था।
महाभारत काल में यह हस्तिनापुर राज्य की राजधानी का एक हिस्सा रहा है।
हस्तिनापुर से उत्तर दिशा की ओर पुष्पावती नाम का एक मनमोहक उद्यान था। द्रौपदी अपने मन महिलाओं के लिए यहां फूलों की घाटी में प्राय घूमने आया करती थी।
हस्तिनापुर से पुष्पावती के बीच का यह 35 किलोमीटर तक खांडवी वन क्षेत्र फैला हुआ था।
महाभारत काल की पुष्पावती आज पुठ के नाम से जाना जाता है। उस समय हस्तिनापुर से पुष्पावती तक जाने के लिए एक गुप्त मार्ग था, जिसके चिन्ह आज से कुछ वर्ष पहले तक मौजूद थे, लेकिन अब वे लुप्त हो चुके हैं।
महाभारत के विनाशकारी युद्ध के बाद धर्मराज युधिष्ठिर,
अर्जुन, भगवान कृष्ण के साथ यहां आए थे। महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने कुटुम्बियों, भाई बंधुओं एवं निर्दोष लोगों की आत्मा शांति के लिए खांडवी वन क्षेत्र में इस स्थान पर आए थे।
गनों की मुक्ति की कथा स्कंद पुराण में भी आती है।
महर्षि दुर्वासा मंदराचल पर्वत पर एक गुफा में तपस्या कर रहे थे। भगवान शंकर के गणों ने उनका उपहास किया। ऋषि दुर्वासा ने गणों को पिशाच योनि का श्राप दिया। शिव गण पिशाच योनि प्राप्त कर कराह उठे। वे भागे भागे महर्षि दुर्वासा की शरण में पहुंचे। शिव गनों की प्रार्थना पर महर्षि दुर्वासा ने उन्हें बताया कि वे हस्तिनापुर के निकट शिव बल्लभपुर क्षेत्र में पहुंचकर तपस्या करने से ही इस योनि से मुक्त हो सकते हैं। गणों ने यहां तपस्या की और शिव मुक्तेश्वर महादेव की विधिवत पूजा की। इससे उन्हें शराब से मुक्ति मिली।

महर्षि च्यवन ने भी इस पावन क्षेत्र में तपस्या की थी।
उनकी तपस्थली का नाम ही भृगु कूप है, जिसे आज नक्की कुआं कहा जाने लगा है।
राजा नहुष को गिरगिट योनि से मुक्ति भी इसी स्थान पर मिली थी।

इस स्थान पर इन सब को मुक्ति मिलने के कारण इस स्थान को गढ़मुक्तेश्वर कहा जाने लगा।

इस स्थान पर ही उदयपुर की कुलवधू मीराबाई कार्तिक स्नान को आई थी। उन्होंने यहां मुक्तेश्वर मंदिर के निकट विशाल

गढ़मुक्तेश्वर में कई प्राचीन मंदिर है।

मुक्तेश्वर महादेव मंदिर, प्राचीन गंगा मंदिर, झारखंडेश्वर महादेव मंदिर, कल्यानेश्वर महादेव मंदिर आदि

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