गढ़मुक्तेश्वर पौराणिक महत्व का तीर्थ स्थान है। महाभारत काल में यह स्थान खांडव वन कहलाता था। यहां पौराणिक एवं धार्मिक महत्व के कई मंदिर और जगहें हैं।

गढ़मुक्तेश्वर के गलियों और मोहल्लों में बने प्राचीन मंदिरों की श्रंखला

* गंगा मंदिर  –

यह मंदिर गढ़मुक्तेश्वर में महत्वपूर्ण आस्था का केंद्र है। एक ऊंचे टीले पर इस प्राचीन मंदिर का निर्माण हजारों वर्ष पूर्व  गंगा के किनारे कराया गया था। इस प्राचीन मंदिर को कब और किसने बनवाया इस संबंध में कोई प्रमाणित दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं है।

गंगा मंदिर में ब्रह्मा जी की विशाल प्रतिमा है, जो पुष्कर के बाद केवल यही है।

बताया जाता है कि मनोकामना पूर्ण होने पर झज्जर के नवाब हसन उल्ला खां ने मंदिर की चार दिवारी बनवाई तथा मंदिर में शिवालय को स्थापित कराया।

मंदिर तक पहुंचने के लिए बनी १०१ सीढ़ियों में से अब केवल ८६ सीढ़ियां ही दिखाई देती हैं, शेष भूमिगत हो गई I पुत्र प्राप्ति के बाद अंग्रेज कलेक्टर एफ. एन. राइट ने सन 1885 में  इन 101  सीढ़ियों को बनवाया था। इन सीढ़ियों की विशेषता यह भी है कि सबसे नीचे की सीढ़ी पर दोनों हाथों से ताली बजाने पर उसकी आवाज सबसे ऊपर की सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति को इस रूप में सुनाई देता है जैसे कि पानी के गिरने की आवाज हो और यदि सबसे ऊपर की सीढ़ी से नीचे की किसी सीढ़ी पर पत्थर फेंकते हैं तो आज भी ऐसा लगता है कि मानों पत्थर गंगाजल में जाकर गिरा है। ऊपर की सीढ़ी से पत्थर जितनी अधिक दूरी की सीढ़ी पर गिरेगा, पानी ने उसके गिरने की आवाज अधिक तेज सुनाई देगी।

कहा जाता है कि गंगा की धारा कभी यहां से होकर ही गुजरती थी। श्रद्धालु यह मानते हैं कि जब जब धरती पर पाप बढ़ता है गंगा मैया जगह छोड़कर उत्तर की ओर बहने लगती हैं इसलिए तमाम प्रयासों के बावजूद गंगा मैया लगातार हटती जा रही हैं।

इस प्राचीन मंदिर में एक श्वेत चमत्कारी पत्थर भी है I जिस पर हर साल अदरक की तरह गांठें फूटती रहती हैं जिस पर खुद-ब-खुद देवताओं की मूर्तियां बनती रहती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि हर वर्ष किसी न किसी रूप में भगवान विष्णु यहां जरूर आते हैं l मूर्ति चोर तस्करों के डर से पुरोहित ने इस चमत्कारी पत्थर को अपने घर पर रखा हुआ है।

* मुक्तेश्वर महादेव मंदिर  –

महाभारत काल में यहां खांडव वन था रघुवंश के राजा शिवि ने इसी मन में अपना चतुर्थ काल बिताया था। उन्होंने भगवान परशुराम से यहां प्रार्थना कर भगवान शंकर की स्थापना कराई थी। भगवान परशुराम ने यहां पांच स्थानों पर शिवलिंग स्थापित किए । भगवान परशुराम ने जिन पांच स्थानों पर भगवान शंकर की स्थापना की थी उनमें से नक्की कुआं भी एक है। यही शिवलिंग मुक्तेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है।

पौराणिक कथा है। कहते हैं एक बार भगवान शंकर के गणों ने मंदराचल पर्वत की कंदराओं में तपस्या कर रहे महर्षि दुर्वासा का उपहास कर दिया था। जिस कारण उन्होंने क्रुद्ध होकर  गणों को पिशाच योनि में भटकते रहने का शाप दिया। गणों द्वारा महर्षि दुर्वासा से क्षमा याचना  पर शाप. से मुक्ति का उपाय बताए जाने पर  पिशाच योनि में भटकते भटकते गणों के पांव जब शिवबल्लभ की भूमि पर पड़े तो उनके शाप का अंत हो गया।

किवदंती है कि भगवान विष्णु के गण जय और विजय ने इसी स्थान पर मुक्तेश्वर महादेव की अर्चना कर अपने को शाप मुक्त किया था। जय और विजय गणों की मुक्ति के कारण यह स्थान गणमुक्तेश्वर कहलाया, उसी का अपभ्रंश रूप गढ़मुक्तेश्वर है l

* नहुष कूप।   –

मुक्तेश्वर महादेव मंदिर के परिसर में ही एक बहुत बड़ा पाताल तोड़ तालाब सा बना है इसे ही नक्का कुआं कहते हैं

ऐसी मान्यता है और लोगों का विश्वास है कि नहुष कूप (नक्का कुआं ) का संबंध गंगा की पवित्र धारा से बना रहता है। नहुष खूब के बारे में कहा जाता है कि यह पाताल तोड़ है जोकि राजा नहुष के शाप वश गिरगिट बन कर स्वर्ग से यहां गिर जाने की वजह से बन गया था। शिव की कृपा से महाराजा नहुष को गिरगिट की योनि से मुक्ति मिली थी I उन्होंने यहां एक भव्य यज्ञ कराया।

*  झारखंड महादेव   –

भगवान परशुराम जी द्वारा स्थापित यह शिवलिंग निकट के जंगल में आज भी दर्शनीय हैं।

* बद्रीनाथ मंदिर  –

प्रथा है कि बद्रीनाथ मंदिर को केवल  आरती के समय ही खोला जाता है।

इस मंदिर को साल में केवल एक बार परशुराम जयंती अक्षय तृतीया को  दिन भर  दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है।

इनके अतिरिक्त श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, श्री कृष्ण का पंचायती मंदिर, श्री राम मंदिर, दाऊजी का मंदिर चंद्रमा के क्षय रोग के निवारण का स्थान दुर्गा जी का मंदिर, नृसिंह मंदिर और गौरी शंकर मंदिर बाजार में है। हस्तिनापुर की ओर कल्याणेश्वर महादेव का मंदिर है, जहां परशुराम जी द्वारा स्थापित मूर्ति है। इनके अतिरिक्त गंगेश्वर, भूतेश्वर एवं आशुतोष की प्राचीन मूर्तियां हैं लगभग ८० सती स्तंभ यहां हैं जो अब भग्नावशेषरूप में हैं। गंगा जी का मंदिर सबसे प्राचीन है। गंगा जी के तीन और मंदिर यहां हैं।

गढ़मुक्तेश्वर में कुछ दशकों पहले केंद्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा पूरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम के अंतर्गत कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार गढ़मुक्तेश्वर के सैंकड़ों प्राचीन मंदिरों में से शेष बचे 50 मंदिरों में देवी देवताओं की 220 प्रतिमाएं हैं जिनमें से अधिकांश प्रतिमाएं भगवान शिव की हैं।

यह मंदिर भी सरकार व श्रद्धालुओं की उपेक्षा के कारण पुराना वैभव व स्वरूप खोते जा रहे हैं। कुछ प्रमुख  मंदिरों को  छोड़ दे तो अब इन मंदिरों में न तो वेद मंत्रों के स्वर सुनाई देते हैं और न ही घंटे, घड़ियाल व शंखों की ध्वनि गूंजती है। मंदिरों में होने वाली परंपरागत आरतियों के स्वर भी दब गए हैं। कुछ मंदिरों के तो कपाट तक नहीं खुलते और न ही पूजा-अर्चना होती है। कई प्राचीन मंदिरों के अस्तित्व मिटाकर आधुनिक भवन बना दिए गए हैं। अनेक प्राचीन मंदिरों से दरवाजों, चौखटों तथा अन्य बहुमूल्य सज्जा सामग्री गायब है।

कुछ मंदिरों में दुर्लभ प्रतिमाएं स्थापित हैं। मुख्य बाजार के नृसिंह भगवान मंदिर में स्थापित नृसिंह भगवान की भव्य प्रतिमा, दंडी स्वामी के मंदिर में भगवान शंकर की प्रतिमा जिसकी दाई जांग पर माता पार्वती विराजमान है, प्राचीन गंगा मंदिर में मौजूद एक पत्थर में प्रतिवर्ष अंकुरित होने वाली मानव आकृति के शिवलिंग को मंदिर के पुरोहित तस्करों के डर से अपने यहां संभाल कर रखे हुए हैं।

कई प्राचीन मंदिरों से अनेक बहुमूल्य प्रतिमाएं तस्करों ने गायब कर दी है। छोटा बाजार में स्थित गंगेश्वर मंदिर में स्थापित सूर्य की गति रंग बदलने वाले बहुमूल्य पत्थर से निर्मित शिवलिंग को तस्करों के द्वारा गायब कर दिया गया है।

 

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