गंगोह क्षेत्र में अनेकों प्राचीन शिव मंदिर हैं जिनकी अपनी अलग अलग मान्यताएं हैं।
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गुलछप्पर का शिव मंदिर-

गंगोह नगर के पूर्व में तीन किलोमीटर दूर गांव गुलछप्पर का शिव मंदिर अपनी विविधता के लिए श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। घने जंगलों के बीच बने इस शिव मंदिर के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। हर वर्ष महाशिवरात्रि पर मंदिर प्रांगण में मेले का आयोजन होता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां शिवलिंग पर जलाभिषेक के लिए आते हैं।

मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी विशिष्ट बनावट के लिए क्षेत्र भर में श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। शिवलिंग ऊपर से देखने पर तिरछा कटा दिखाई देता है तथा इस शिवलिंग पर तीन निशान अंकित हैं। शिवलिंग के बारे में किवदंती है कि शिवलिंग जिस स्थान पर स्थापित है पूर्व समय में यहां घना जंगल और झाड़ व बेरी के पेड़ थे। एक दिन एक लकड़हारा यहां लकड़ी काटने के लिए आया। कुल्हाड़ी की धार तेज करने के लिए उसने जमीन में धंसे एक पत्थर को उखाड़ने का प्रयास किया। वह ज्यों-ज्यों पत्थर को निकालने के लिए आसपास की मिट्टी को हटाता वैसे- वैसे वह पत्थर और अंदर धंसता चला जाता। पत्थर बाहर नहीं निकलने पर लकड़हारे ने खीज कर पत्थर पर वार किया। जिससे पत्थर तो नहीं टूटा अपितु यह माना जाता है कि पत्थर से खून की धार निकलने लगी। बताया जाता है कि जब थका हारा लकड़हारा अपने घर पहुंचा तो अपने परिवार के सदस्यों की हालत देख कर वह हक्का-बक्का रह गया। उसके परिवार के सदस्य बीमार पड़े हुए थे। लकड़हारे ने जब जंगल की घटना के बारे में ग्रामीणों को बताया। ग्रामीणों व लकड़हारे ने तब भगवान शिव की आराधना की उसके बाद लकड़हारे के परिवार के सदस्य स्वस्थ हुए। बताया जाता है कि ग्रामीणों ने वर्ष 1960 में जंगल की सफाई कर वहां पूजा स्थल का निर्माण किया।
शिव मंदिर के निर्माण का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। प्रत्येक सोमवार को अपार श्रद्धालु इस शिवलिंग पर जलाभिषेक के लिए आते हैं और आत्मिक शांति का अनुभव करते हैं।
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सज्जन वाला शिव मंदिर-

गंगोह बाईपास पर स्थित सैकड़ों वर्ष प्राचीन इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग बड़ा विचित्र है। इस प्राचीन शिव मंदिर के पास ही जीर्ण – शीर्ण स्थिति में एक सुरंग के भी अवशेष हैं। बताते हैं कि यह सुरंग कभी यहां से कंकराली सरोवर तक जाती थी तथा इसके अंदर एक महात्मा निवास करते थे।

एक खेत में बना लगभग साढे चार सौ वर्ष प्राचीन सज्जन वाला शिव मंदिर आज भी पुरानी कलाकृतियों का भंडार है। मंदिर के अंदर गुंबद पर विभिन्न देवी-देवताओं के भित्ति चित्र आज भी सजीव बने हुए हैं। मंदिर के अंदर नीचे की ओर बनी हुई भित्ति चित्र कलाकृतियां संरक्षण के अभाव में समाप्त हो गई हैं।
यहां स्थित मंदिर में शिवलिंग की आकृति बड़ी विचित्र है। शिवलिंग पर ही नाग की आकृति बनी हुई है। यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि कोशिशों के बाद भी यह आकृति शिवलिंग से अलग नहीं हो सकी है।
लोगों का कहना है कि इस मंदिर का उचित रूप में यदि रखरखाव किया जाए तो यह एक सुरम्य स्थान बन सकता है।

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लखनौती  गांव

लखनौती गांव एक ऐतिहासिक स्थान है। मुगल काल में लखनौती एक रियासत हुआ करती थी। लखनौती गांव में आज भी कई प्राचीन इमारतें मौजूद है जो उस दौर की याद दिलाती है। यहां की पुरानी इमारतों में मुगल काल का किला, भूल भुलैया आदि इमारतें आज भी मशहूर है।

लखनौती की इन इमारतों में से एक भूल भुलैया( मकबरा) काफी प्रसिद्ध है। इसी इमारत के जैसे दो और मकबरे लखनौती से गांव शकरपुर जाने वाले रास्ते पर स्थित है। इन सब को देख कर लगता है कि यह मकबरे अपने समय में बहुत खूबसूरत रहे होंगे।

भूल भुलैया कहे जाने वाले मकबरे के नीचे जो कब्र  है वह उस दौर के किसी मशहूर और बड़े आदमी की बताई जाती है। इस मकबरे में ऊपर नीचे की ओर दर्जनभर के करीब दरवाजे बने हैं और उनके ऊपर गुंबद बना हुआ है। जिस समय यह इमारतें बनाई गई वह मुगल बादशाह हुमायूं का दौर था। अलग अलग अंदाज में बनाई गई तीनों इमारतें जिन्हें हजीरा भी बोला जाता है। तीनों इमारतों के गुंबदऔर दरवाजों को बहुत सुन्दरअंदाज में बनाया गया है। इन इमारतों का सौंदर्य बढ़ाने के लिए उस दौर में प्रचलित छोटी-छोटी ईटों का इस्तेमाल किया गया है।

यह इमारतें लखनौती की पहचान है। लेकिन आज इन इमारतों को देखने वाला कोई नहीं है। पुरातत्व विभाग और ग्रामीणों की उदासीनता के कारण ऐतिहासिक इमारतें बहुत ही जर्जर हालत में है। इन इमारतों में जगह-जगह झाड़ – खंखाड़ उग आए हैं। अगर इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो इतिहास की यह निशानी जल्दी ही विलुप्त हो जाएंगी।

दक्षिण दिशा में हजारों वर्ष पुराना काली कसौटी पत्थर से बना भगवान श्री कृष्ण का मंदिर है। जिसमें सैकड़ों वर्ष पहले सिद्ध बाबा धनदास ने अपनी समाधि ले ली थी। बताया जाता है कि गंगोह स्थित मामू मौला बख्श व लखनौती के बाबा धनदास आपस में गहरे मित्र थे और दोनों बड़े सिद्ध पुरुष थे। यह जो भी अपनी वाणी से कहते थे वह पूरा हो जाता था।
बाबा धनदास के नाम के बगैर लखनौती वासी अपना कोई भी कार्य नहीं करते। आज भी प्रत्येक रविवार को बड़ी दूर दूर से आए उन के श्रद्धालु भक्तों की यहां भीड़ लग जाती है। लोगों का विश्वास है कि बाबा धनदास जी के दरबार में जिसने जो मांगा वही पाया है। आज तक उनके दर से कोई खाली नहीं गया। इस बात के प्रमाण उनके भक्त सुनाते हैं

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गांव फतेहपुर ढोला में स्थित देवी मंदिर पर आश्विन शुक्ल चतुर्दशी पर तीन दिवसीय मेला एवं दंगल का आयोजन किया जाता है।

बिलासपुर स्थित सैकड़ों वर्ष प्राचीन माता फुलमदे मंदिर ।

गांव रंधेडी में बाबा घुमरा देव की स्मृति में अश्विन माह में मेला। श्रद्धालु बाबा घुमरा देव की समाधि पर माथा टेक कर आशीर्वाद लेते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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