सहारनपुर जनपद की नकुड तहसील का गंगोह कस्बा जनपद मुख्यालय से 42 किलोमीटर दूर स्थित है।
गंगोह कस्बा धार्मिक एवं राजनीतिक सरगर्मियों का प्रमुख केंद्र है।

किंवदंतियों के अनुसार गंगोह को राजा गंग के द्वारा बसाया गया था।

राजा गंग द्वारा बसाई नगरी जिससे इसका नामकरण गंगोह हुआ।

गंगोह सूफ़ी और संतों की जमीन है। यह नगरी हजरत कुतबे आलम व बाबा हरिदास की कर्म स्थली है। दोनों में मित्रों की तरह संबंधों का इतिहास गवाह है। दोनों ने हमेशा प्रेम व भाईचारे का संदेश दिया था। उन्हीं परंपराओं को आज भी यहां के निवासी पूरी तरह निभाते हैं।

हजरत कुतुबे आलम लगभग 500 वर्ष पूर्व गंगोह में आए थे। उनका जन्म बाराबंकी में गांव रठौली में हुआ था। 33 साल तक यहां रहने के बाद रूहानी एतबार के हुकुम से शाहबाद मारकंडा कुरुक्षेत्र में 38 वर्ष तक रहने के बाद वे फिर जीवन पर्यंत गंगोह में रहे। बताया जाता है कि गंगोह कस्बे के पश्चिमी भाग में जो कि अब मोहल्ला सराय कहलाता है। इस स्थान पर संत बाबा हरिदास कुटिया बनाकर रहा करते थे। जब हजरत कुतबे आलम गंगोह आए तो उनके रहने का प्रबंध बाबा हरिदास जी ने ही किया था। आज भी इस स्थान को कुटी के नाम से पुकारा जाता है। बाबा हरिदास की गद्दी आज भी मौजूद है। आज भी अनेक हिंदू- मुस्लिम उनकी समाधि पर पूजा- अर्चना एवं इबादत करते हैं। गंगोह नगर के पूर्व में जहां बाबा हरिदास कुछ दिन रुके थे। बाबा हरिदास का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर पर प्रतिवर्ष मेला लगता है। जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आकर बाबा जी को पूजते हैं।

हजरत कुतबे आलम की दरगाह पर यूं तो पूरे साल ही अकीदतमंद आते रहते हैं परंतु उर्स के मौके पर बहुत बड़ी संख्या में जायरीन यहां आते हैं। उस समय पूरे गंगोह में सिर ही सिर नजर आते हैं।

यहां सूफी संतों के इतने तब्बकुरात संग्रहित हैं जो अन्य कहीं उपलब्ध नहीं है और वर्तमान समय में वह सब बहुमूल्य हैं।

उस समय के बादशाह इब्राहिम लोदी, बाबर व हुमायूं भी हजरत कुतबे आलम के मुरीद थे और यहां मुकद्दस मुकाम पर हाजिरी भरने आया करते थे। हजरत कुतबे आलम की मजार बादशाह हुमायूं ने ही तामीर कराई थी।

हजरत कुतबे आलम के उर्स पर यहां की अन्य दरगाह पर भी रोशनी की जाती है। दरगाह में संग्रहीत तब्बकुरात की जानकारी यहां आए जायरीनों को दी जाती है।

बाबा हरिदास का मेला –

चौदहवीं शताब्दी के विख्यात संत बाबा हरिदास का मेला प्रतिवर्ष चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को परंपरागत रूप से प्रातः . धर्म ध्वजा की स्थापना के साथ शुरू होता है।
श्री अस्थल मंदिर से ढोल धमाकों के साथ धर्म ध्वजा गंगोह नगर के प्रमुख मार्गो से घंटे घड़नावल और शंख ध्वनि से वातावरण को गुंजायमान करती हुई बाबा हरिदास मंदिर पहुंचती है। जहां मंदिर पर धर्म ध्वजा की स्थापना की जाती है। इस दिन सुबह सवेरे से ही बाबा के दर्शनों के लिए श्रद्धालु मंदिर के बहार लंबी लाइनों में खड़े हो जाते हैं। हजारों श्रद्धालु यहां माथा टेककर मनोकामनाएं मांगते हैं। जिन श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं बाबा ने पूरी कर दी वे श्रद्धालु यहां चादर चढ़ाते हैं। दर्शन के साथ ही श्रद्धालु बाबा की चरण राज को माथे पर धारण करते हैं। उनकी पादुकाओं को जलाभिषेक कराया जाता हैं। मंदिर के बराबर में ही स्थित बाबा के धूने पर भी श्रद्धालु माथा टेकते हैं। मान्यता है कि यहां बाबा के चरणों में बैठकर सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना शीघ्र ही पूरी होती है।
बाबा के समाधि स्थल मोहनपुरा गांव में भी जाकर श्रद्धालु माथा टेकते हैं।

कंकराली सरोवर –

महाभारत काल से जुड़े गंगोह के पवित्र कंकराली सरोवर का आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व है।

बाईपास की ओर जाने वाले सरोवर के छोर पर मंदिरों की एक बड़ी श्रंखला है। इन मंदिरों में मां शाकुंभरी, शंकर महादेव, भैरव, हनुमान और अन्य कई देवी देवताओं के मंदिर शामिल हैं। सरोवर के एक और हरिदास रोड तथा दूसरी तरफ गंगोह कस्बे की मुख्य सड़क है। सरोवर के पिछले छोर पर कंकराली मंदिरों की बडी़ श्रंखला है। इन मंदिरों में भगवान राधा कृष्ण का सिद्ध मंदिर, शंकर महादेव का मंदिर, शाकुंभरी देवी का मंदिर व अन्य कई देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित है। इन कंकराली मंदिरों की श्रंखला के कारण ही इस सरोवर को कंकराली सरोवर कहा जाता है।

स्थानीय लोग इस सरोवर का आध्यात्मिक महत्व बताते हुए कहते हैं कि महाभारत के बाद जब पांचो पांडव हिमालय की ओर जा रहे थे तो उन्होंने कंकराली सरोवर में स्नान क्या था और सरोवर के निकट ही रात्रि में विश्राम भी किया था।

कंकराली सरोवर का संबंध बंदा वीर बैरागी से भी जोड़ा जाता है। किवदंती है कि बैरागी ने इस सरोवर पर तीन दिन प्रवास किया था और शिव चौक पर पीपल के पेड़ के नीचे धूनी रमाई थी।

धार्मिक आस्था से जुड़े कंकराली सरोवर के बारे में बताया जाता है कि लगभग दो शताब्दी पूर्व कंकराली मंदिर परिसर व इस सरोवर का निर्माण पंडित रिखी राम लाहौर वालों ने कराया था। परिसर में राधा कृष्ण, हनुमान, शंकर, दुर्गा आदि के मंदिर आज भी विद्यमान हैं। दूसरी तरफ रामबाग परिसर में भी इसी तरह मंदिरों की विशाल श्रंखला के साथ अनेक समाधियां स्थापित हैं।
कंकराली सरोवर आज उपेक्षा के कारण जीर्ण शीर्ण है। सरोवर के पश्चिमी व पूर्वी छोर पर सीढ़ियां बनी हुई थी। जहां पर बैठकर वहां का विहंगम दृश्य देखा जाता था एवं यहां पूजा पाठ करने के समय मानसिक शांति मिलती थी। यह क्षेत्र हिंदू धर्मावलंबियों के प्रमुख केंद्रों के रूप में जाना जाता था।
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गंगोह की प्राचीन कलाकृतियां एवं स्मारक नष्ट होने के कगार पर –

सरकारी एवं पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के कारण गंगोह की प्राचीन एंव ऐतिहासिक भित्ति चित्र कलाकृतियां एवं स्मारक नष्ट होते जा रहे हैं।

गंगोह के संस्थापक महाराजा गंग के महल का मुख्य द्वार कहा जाने वाला विशाल दरवाजा भी अब नष्ट होने के कगार पर है।
गंगोह नगर कभी पुरानी हवेलियों की बस्ती हुआ करता था लेकिन समय एवं आवश्यकता ने पुरानी हवेलियों को अपने में समेट लिया है। फिर भी कुछ हवेलियां कई मोहल्लों में आज भी मौजूद हैं।गंगोह नगर के मोहल्ला इशारा कानूनगोयालन, छत्ता, ककराली सरोवर के मंदिरों की श्रंखला के अनेक मंदिरों, धर्मशाला व हवेलियों पर पुरानी भित्ति चित्र कलाकृतियां अपने समय की गवाही देती है। लेकिन उचित रखरखाव के अभाव के कारण यह सब भित्ति चित्र नष्ट होते चले गए। हालांकि अभी भी कुछ पुरानी हवेलियों पर इनके कुछ अवशेष देखे जा सकते हैं।

महाराजा गंग की नगरी का अपना ऐतिहासिक महत्व रहा है। बताया जाता है कि राजा गंग का महल एक काफी बड़े दायरे में फैला हुआ था। इस महल के कुछ अवशेषों को छोड़कर बाकी सब कुछ आज की गंगोह नगरी के नीचे दफन हो गया है। बताया जाता है कि कुछ दशक पहले जल निगम द्वारा पाइप डालने के लिए खुदाई की जा रही थी। उस समय सराफा बाजार इलाके से खुदाई में प्राचीन मूर्तियां निकली थी जिन्हें जानकारों ने हजारों वर्ष पुराना बताया था। हालांकि इन खंडित प्राचीन मूर्तियों को बाद में गंगा में विसर्जन कर दिया गया था। बाद में शासन द्वारा इस और कोई ध्यान नहीं दिया गया
गंगोह में महलतला के पास आज भी एक विशालकाय दरवाजा मौजूद है। जिसे राजा गंग के महल का मुख्य दरवाजा बताया जाता है। लेकिन इसके आसपास नए निर्माण करा कर इसकी प्राचीनता को ढकने का प्रयास किया गया है।

गंगोह नगर का ऐतिहासिक सिद्ध पीठ बाबा भोलूनाथ का समाधि स्थल व शिव मंदिर ।

गंगोह में आश्विन शुक्ल चतुर्दशी को सिद्ध पीठ शाकुंभरी देवी का चार दिवसीय मेला।

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