_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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इस क्षेत्र में उत्तराखंड की शिवालिक की पहाड़ियों से होकर आने वाली गंगा यमुना आदि अनेक नदियां अपने साथ अपार प्राकृतिक खनिज संपदा लेकर आती हैं।

ऊपर उत्तराखंड की शिवालिक की पहाड़ियों से होकर नीचे सहारनपुर, हरिद्वार, बिजनौर आदि जनपदों के इलाकों से मैदान में प्रवेश करने वाली गंगा-यमुना, बूढ़ी गंगा, सोनाली नदी, मालन नदी, कोटावाली नदी, रामगंगा नदी, धारा नदी, रतनाल नदी आदि नदियों में यह प्राकृतिक खनिज संपदा रेत, बजरी, मोरंग, पत्थर आदि के रूप में होती है।

इन नदियों में रेत बजरी और पत्थर आदि के रूप में ओनआने वाली यह उच्च कोटि की प्राकृतिक संपदा भवन निर्माण में इस्तेमाल होती है।

कुछ दशकों पहले तक इस क्षेत्र की नदियों से भवन निर्माण के लिए इस प्राकृतिक संपदा का दोहन कम मात्रा में किया जाता था। नदियों के इलाकों में तब वहां न खेती होती थी और न लोगों के पास आमदनी का कोई जरिया था। रेत खनन ही वहां के स्थानीय लोगों की रोजी रोटी का जरिया था। धीरे धीरे समृद्धि आई और उसके पीछे पीछे आया ‘माइनिंग माफिया’। इस माइनिंग माफिया की मनमर्जी के नतीजे के रूप में आज इस क्षेत्र में पर्यावरण को जबरदस्त खतरा पैदा हो गया है। यहां की यमुना की धारा तक बदल चुकी है।

इस क्षेत्र में खनन जोन बनने के बाद शुरुआती दौर में कुछ छोटे-छोटे ठेकेदारों ने नदियों के तटों पर स्थित छोटे-छोटे घाटों से काम शुरू किया। धीरे-धीरे इस काम में करोड़ों रुपए के वारे-न्यारे होने लगे और यह सबसे ‘हॉट सेलिंग’ कारोबार के रूप में उभरा। यह कारोबार धीरे धीरे पहाड़ों के सीने से लेकर नदियों की गहराई तक फैल गया।

वेस्ट यूपी में खनन का कारोबार सहारनपुर से लेकर शामली, बागपत तक जारी है। कई दशकों से राज्य में सरकार चाहे किसी की भी आई हो वेस्ट यूपी में खनन के खिलाड़ियों का डंका बजता रहा है। खनन का यह विशाल साम्राज्य,जिसके आकर्षण पास में बंधने से सियासी हस्तियां तक खुद को रोक नहीं सकी।

बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा यमुना का सीना चीर कर बालू रेत को निकाला जाता है। बड़ी मात्रा में रेत का दोहन करने के लिए यमुना नदी की धारा को भी परिवर्तित कर दिया जाता है। मशीनों से बालू (रेत) निकालने के से बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते हैं। भविष्य में उक्त गड्ढे लोगों के लिए मौत का महाकुंड बन जाते हैं। समय-समय पर बहुत से लोग व पशु इन गड्ढों में समाते रहे हैं। प्रतिदिन यमुना से हजारों टन बालू रेत जेसीबी व पौकलेन मशीनों द्वारा निकाला जाता है। इन मशीनों से रेत निकालने के कारण यमुना नदी में गहरे-गहरे गड्ढे बन जाते हैं। इतना ही नहीं यमुना नदी की धार को भी मोड़ दिया जाता है। यमुना नदी में बने गहरे गहरे गड्ढे लोगों की मौत का कारण बनते रहे हैं, न जाने कितनी बार यमुना नदी में बने यमराजी कुंड में फंसकर लोग मौत की नींद सो चुके हैं।

यमुना नदी में गांव की तरफ बने गहरे गहरे गड्ढों से बरसात के दिनों में यमुना नदी के पानी का कटाव गांवों की ओर हो जाता है। जिससे तटवर्ती गांवों में बाढ़ की आशंका प्रबल हो जाती है। बाढ़ में किसानों की सैकड़ों बीघा फसलें भी बर्बाद हो जाती हैं।

उच्च न्यायालय तथा एनजीटी के नियमानुसार देश की राजधानी दिल्ली के निकट एनसीआर संबंधित क्षेत्रों में प्रकृति के दोहन अर्थात रेत खनन पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध है।

सहारनपुर शामली और बागपत जनपदों में अनेकों स्थानों पर यमुना नदी का सीना चीरने के लिए दर्जनों पोकलेन जेसीबी मशीनों को उतार दिया जाता है और रोजाना सैकड़ों हजारों बोगियों, ट्रैक्टर ट्रॉलियों व ट्रकों में रेत का दोहन किया जाता है।

जेसीबी व पोकलेन मशीनें यमुना नदी में एक बार में 10 से 15 सीट नीचे तक धंस जाती हैं तथा वहां से एक बार में ही कई कुंतल रेत को निकालकर ले आती हैं। ये जेसीबी व पोकलेन दानव रूपी मशीनें पवित्र यमुना नदी को खोखला करती जाती हैं।

सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि यमुना नदी में फावड़े से ही खनन किया जाए। जहां फावड़े से खनन करने के आदेश हैं, मां यमुना नदी के सीने पर जेसीबी व पोकलेन मशीन खड़ी करके खनन कराया जाता है।

यमुना नदी में रेत बालू का खनन करने वालों को यह आभास हो जाता है कि अबकी बार वर्षा अधिक होगी या कम। इसी के चलते वह कई माह पहले यमुना नदी के खादर में जमीन लेकर उस पर इस तरह के रेत बालू के ढेर लगा दिए जाते हैं कि जैसे पहाड़ हों। बरसात के मौसम में जब यमुना नदी में रेत बालू का खनन बंद हो जाता है, तब उस जमा किए गए रेत को धीरे-धीरे आसपास के जनपदों में ऊंचे दामों पर बेचा जाता है।

बरसात के मौसम से पहले बागपत, बड़ौत नगरों के इलाके में यमुना नदी के तट पर ऊंचे-ऊंचे पहाड़ दिखाई देते हैं। यदि इनको गौर से देखें तो यह पहाड़ नहीं, ये रेत खनन करने वाले लोगों द्वारा जीवनदायिनी यमुना नदी का सीना चीर कर मशीनों द्वारा निकाली गई रेत बालू के टीले होते हैं।

प्रशासन के द्वारा सतत विकास के लिए पर्यावरण के हितको दृष्टिगत रखते हुए रेत खनन की अनुमति दी जाती है। प्रशासन रेता और बजरी जैसे खनिजों का खनन बिल्कुल पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के दिशा निर्देशों के अनुसार ही होने की अनुमति देता है।

खनन माफिया के गठजोड़ से सहारनपुर जनपद अवैध खनन की राजधानी कहा जाने लगा।

शिवालिक पहाड़ियों से इसकी तलहटी में स्थित घाड़ इलाके में अनेकों बरसाती नदियां निकलती हैं। इन सब बरसाती नदियों में खनन पर प्रतिबंध है। वाइल्डलाइफ बोर्ड के द्वारा भी घाड़ के बरसाती नदियों के इलाके में खनन पर प्रतिबंध है।

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