०० यमुना ००

प्रेम रस से सराबोर यमुना भी सबसे पहले यही पर्वतो से उतर कर मैदान में बहती है।

यमुना आनंद और रस का प्रवाह है।

यमुना की कितनी ही कहानियां है

यमुना के पिता सूर्य है और माता संध्या है। यमुना के भाई यमराज हैं।

नारद -पंच रात्र में कथा आती है की सूर्य नारायण ने अपनी बेटी यमुना से कहा कि -ज्ञान की प्राप्ति के लिए तपस्या करो। यमुना ने अपने पिता सूर्य के कहने पर कालिंदी पर्वत पर श्री कृष्ण का ध्यान करते हुए तपस्या की, यमुना की तपस्या से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने वेणु का वादन किया। श्री कृष्ण के उस वेणु वादन से यमुना द्रवी भूत हो गई। यमुना जिस कालिंदी पर्वत पर तपस्या कर रही थी वहां आनंद का स्रोत बह निकला।

भारत की सबसे पवित्र और प्राचीन नदियों में यमुना का स्मरण गंगा के साथ ही किया जाता है।

श्री कृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर उनके अवतारी चरित्र तक कितने ही आख्यान इसी यमुना से जुड़े हुए हैं।

द्वारका वास को यदि छोड़ दें, तो भगवान श्री कृष्ण के जीवन के साथ अधिक से अधिक सहयोग किसी यमुना ने ही किया है। भगवान श्री कृष्ण जहां कहीं भी जाते हैं यमुना उनके साथ साथ ही रहती है। यमुना की एक एक लहर के पास श्री कृष्ण लीला की कितनी कितनी ही छवियां हैं जिनकी याद यमुना को देख कर हो आती है।

यमुना के किनारे न जाने कितने ही ऋषियों ने तपस्या की आत्म चिंतन किया था। इसी यमुना के किनारे राज ऋषि भरत और मांधाता ने यज्ञ किए थे। यमुना के किनारे ही अंगिरा, ध्रुव, दुर्वासा, अगस्त, अंबरीश आदि महापुरुषों ने तपस्या की थी।

यमुना के किनारे ही भगवान वेद व्यास का जन्म हुआ था।

प्रेम और वात्सल्य रस के जो स्रोत यमुना के तट पर प्रवाहित हुए हैं वैसे स्रोत संसार की और किस नदी के तट पर प्रभावित हुए हैं क्या कोई बता सकता है।

श्री कृष्ण भी श्याम वर्ण के थे और यमुना का वर्ण भी श्याम वर्ण का है। यमुना के तट के खग, मृग, वन, वृक्ष -लता, सब कुछ घनीभूत श्यामल वन में ही रंगे हुए आपको दिखाई देंगे।

यमुना हमारे देश की एक अत्यंत पवित्र नदी है।

यमुना नदी का उद्गम उत्तराखंड के चार धामों में से एक यमुनोत्री से है। हिमालय में जिस स्थान पर यमुना जी का उद्गम होता है उसके पास बंदर पूंछ नाम की चोटी है। 6500 मीटर ऊंची यह चोटी गढ़वाल क्षेत्र की सबसे बड़ी चोटी है। इसे सुमेरू भी कहते हैं। इसी चोटी के एक भाग का नाम कलिंद है। यहीं से यमुना जी निकलती हैं। इसीलिए यमुना जी का एक नाम कालिंदी भी है।

अपने उद्गम से आगे कई किलोमीटर तक विशाल हिमखंडो और हिना मंडित कंदराओं में अप्रकट रूप से बहती हुई पहाड़ी ढलानों पर से अत्यंत तीव्र वेग की धारा के रूप में ऊंची पहाड़ी से दूर तक दौड़ती बहती हुई नीचे चली आती है। यमुना को हर समय यह जल्दी रहती है कि वह जल्दी से जल्दी अपनी बहन गंगा के साथ मिल जाए। इसी से वह हिमालय में बड़ी तेजी से बहती हुई नीचे उतरती है। हिमालय की पहाड़ियों में यमुना के साथ कई नदियां संगम बनाती हैं। गढ़वाल के पहाड़ों में यमुना के साथ उमा नदी, ऋषि गंगा और हनुमान गंगा का संगम होता है।

यमुनोत्री से चलकर यमुना की धारा ऐसे ही कई नदियों
को अपने साथ मिलाकर
कालसी पहुंचती है। कालसी के पास यमुना और टोंस नदी का संगम है। इससे आगे पांवटा साहिब स्थान है। यह स्थान गुरु गोविंद सिंह जी की कर्म भूमि है। यहां ही गुरु साहब के 52 कवि रहते थे। इस स्थान के पास से यमुना जी का पवित्र जल बड़ी खामोशी के साथ गुजरता है।

शिवालिक की पहाड़ियों की तलहटी में विचरती यमुना हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमा बनाती हुई बहकर दिल्ली पहुंचती है।

भारत की पवित्र और प्राचीनतम नदियों में यमुना की गणना गंगा के साथ की जाती है।

यमुना ने अपनी बहन गंगा के साथ मिलकर एक ऐसे मैदान का निर्माण किया है जो संसार में अपनी मिसाल रखता है। अपनी भरपूर उर्वरा शक्ति के लिए यह गंगा यमुना का दोआबा सारे संसार में जाना जाता है। यमुना यहां गंगा के समानांतर बहती है।

भारत में विदेशी आक्रमणकारियों लुटेरों से लगभग जितने भी युद्ध हुए हैं उनमें से लगभग 80 प्रतिशत यही के मैदानों में हुए हैं। अनगिनत बलिदानों से प्लावित यह धरती भारत के लिए सदैव से प्रेरणा स्रोत रही है।

न जाने कितने खूंखार बर्बर आक्रमणकारी नादिर शाह, चंगेज खान, तैमूर लंग जैसों को यमुना ने देखा है। जिन्होंने यही इसी भूमि पर भीषण कत्लेआम करवाया था। लाखों स्त्री पुरुषों को बर्बरता पूर्वक तलवार के घाट उतार दिया गया था।

ताजे वाला के पास यमुना मैदान में आती है।

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