महाराजा भागीरथ के दिव्य रथ के पीछे -पीछे चलती पावन गंगा यही पहाड़ो से विशाल मैदान में उतरी थी

इस धरा को प्रकृति का अनुपम वरदान मिला है।

गंगा का नाम सुनते ही इस देश के जनमानस में अमृत के सोते फूटने लगते हैं। गंगा ने इस देश को पहचान भी दी हैं, गरिमा भी दी हैं। यह हमारे धर्म का सर्वस्व हैं। अर्थिक  समृद्धि और काव्य- सौन्दर्य का भी स्रोत है गंगा।

अपौरुषेय वेदो से गंगा का बखान प्रारंभ होता है –

इमं मे गंगे यमुने सरस्वती सुतुडि स्तोम्म्ं- – – –

पुराणों और इतिहास में गंगा की बड़ी  भारी महिमा बताई गई  हैं। हमारी संस्कृति में गंगा की अमित  महिमा हैं।

गोमुख से चलकर गंगा हिमालय पर्वत की गहरी घाटियों के बीच से अनेक दुर्गम मार्गो को पार करती हुई हरिद्वार आती है। यहां जिस मार्ग से होकर गंगा बहती है वह अत्यंत सुरम्य भी है। हिमालय पर्वत में अनेकानेक दुर्लभ औषधियां, वनस्पतियां और जड़ी बूटियां जड़ रूप में विद्यमान है, इनके संपर्क में आने से गंगा का जल भी औषधीय गुणों से भरपूर हो जाता है।

गंगा इसी क्षेत्र में हिमालय से निकल कर ऋषिकेश में हिमालय के चरणों का स्पर्श करती हुई हरिद्वार में जहां से वह विशाल समतल मैदान में प्रवेश करती है

इसी घरा  पर आगे-आगे महाराज  भगीरथ  दिव्य रथ   पर  शंख   बजाते   हुए  चल रहे थे ,  पीछे – पीछे  प्रवाहित  होती दुई  गंगा  शिव  की जटाओं  जेसे पर्वतों  से यहीं समतत  मैदान  में उतरी  थी।

गंगा  से ही यह क्षेत्र संसार की  सबसे  उपजाऊ भूमि बना।

गंगा हजारों वर्षों से इस भूमि को ऐशवर्य  एवं   स्मृद्धि प्रदान  करने में  अहम  भूमिका   अदा कर रही है।

गंगा जी में  एक   अद्भुत  आध्यात्मिक   आकर्षण है,

उसके  प्रभाव में व्यक्ति खिंचा चला आता है।

गंगा जी की कीर्ति को हमारे पूर्वजों ने सहस्रों वर्षों से जीवित रखा।

भारतीय संस्कृति में गंगा की क्या महिमा है यह हमारे धर्मशास्त्र बताते हैं कि स्वर्ग लोक में देव गण भी यह गीत गाते हैं –

गायन्ति देवाः किल गीतकानि
धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

कि वे व्यक्ति धन्य हैं, जो भारत भूमि में जन्म लेते हैं, और यह भारत भूमि की विशेषता है, जिस जिस पर पतित पावनी मां गंगा का सानिध्य सबको सुलभता से प्राप्त होता है।
गंगा हिमालय पर्वत में दुर्गम व गहरी घाटियों में बहती है। हिमालय में गंगा जी का सानिध्य सहजता से प्राप्त नहीं होता है। सर्वप्रथम हरिद्वार में गंगा जी का सानिध्य सब को सहजता से सुलभ होता है।
गंगा का सानिध्य कितना चमत्कारी है यह महाभारत ग्रंथ में बताया गया है –

पुनाति कीर्तिता पांप दृष्टा भद्रं प्रयच्छति ।

अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम् ॥

– गंगा अपना नाम उच्चारण करने वाले के पापों का नाश करती है, दर्शन करने वालों का कल्याण करती है तथा स्नान पान करने वालों की सात पीढ़ियों तक को पवित्र करती है।

गंगा भारतीय संस्कृति की प्रतीक है।
महाभारत ग्रंथ में गंगा की विशेष रूप से प्रशंसा की गई है। महाभारत के २६ वें अध्याय में बताया गया है कि वे देश, वे जनपद, वे आश्रम, वे पर्वत वास्तव में धन्य है, जो गंगा के तटवर्ती है।
गंगाजल की प्रशंसा में तो महाभारत में यहां तक कह दिया गया है कि गंगाजल के सेवन से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
महाभारत ग्रंथ के इस संपूर्ण अध्याय में गंगा जी का बड़ा ही सुंदर और भव्य वर्णन हुआ है।

गंगा जी ने तीन स्थानों को विशेष प्रसिद्ध किया है।

जहां गंगा जी हिमालय से निकल कर आगे बढ़ती हैं वह स्थान हरिद्वार कनखल -मायापुरी

जहां गंगा और यमुना व अदृश्य सरस्वती का त्रिवेणी संगम होता है वह स्थान तीर्थराज प्रयाग
जहां गंगा सागर से मिलती है वह स्थान गंगासागर
( इनतीन प्रमुख गंगा के तटवर्ती स्थानों में से एक स्थान हरिद्वार कनखल इसी गंगा यमुना के दोआब की भूमि पर हैं)

हरिद्वार – गंगाद्वार भारतवर्ष का वह समतल भाग है जहां से गंगा मैदानी भाग में अपने व्यापक प्रभाव के साथ आगे बढ़कर अनेकों स्थानों को तीर्थ बनाती हुई गंगासागर के लिए प्रस्थान करती है।

गंगा का बाह्य रूप तो विशाल, विलक्षण और दर्शनीय है ही, उसी तरह गंगा के तटों की महिमा का वर्णन भी वेदों में
किया गया है।

गंगा जी का हरिद्वार में समतल मैदान में प्रवेश करने के बाद आगे सागर तक की यात्रा का मार्ग कुछ भी दुर्गम नहीं है। यहां से आगे गंगा का अधिकांश प्रवाह का मार्ग मैदान में ही है। गंगा की घाटी आज भी भारत का उद्यान मानी जाती है। गंगा जी के पूरे प्रवाह मार्ग में हमारे देश भारतवर्ष के मुख्य स्थान और हजारों तीर्थ इसके तटों पर हैं।

गंगा यमुना के इस मैदानी भाग में भी ऋषिकेश हरिद्वार से लेकर अनूप शहर तक प्रवाहमान गंगा जी के तटों पर कई पौराणिक महत्व के तीर्थ स्थान है।

गंगा जी के तट पर इस क्षेत्र में सबसे पहले पौराणिक महत्व का तीर्थ ऋषिकेश है। ऋषिकेश के महत्व का वर्णन पुराणों में है। ऋषिकेश प्राचीन ऋषि मुनियों की तपोभूमि है। ऋषिकेश अपने प्राकृतिक सौंदर्य, गंगा के मनोहारी तटों, पौराणिक महत्व के स्थानों तथा मंदिरों, साधु संतों के भव्य आश्रम, योग और आयुर्वेद के लिए देश विदेश में प्रसिद्ध है।

हर दिन यहां पर देश विदेश से हजारों श्रद्धालु तीर्थयात्री, गंगा व प्राकृतिक सौंदर्य को निहारने, भारतीय संस्कृति साधु-संतों, योग आदि को जानने समझने के लिए जिज्ञासु -भारतीय संस्कृति से प्रेम करने वाले पर्यटक हजारों की संख्या में आते हैं।

यहां के बहुत से स्थानों में से कुछ प्रमुख स्थान लक्ष्मण झूला, मुनि की रेती, स्वर्गाश्रम, भरत मंदिर, आदि, ऋषिकेश से मुनिकीरेती तक गंगा का पश्चिमी तट का रमणीक मार्ग ऐसे स्थान है जहां यहां आने वाला हर तीर्थयात्री व पर्यटक जाना चाहेगा।

ऋषिकेश से गंगा जी अपने मार्ग पर आगे बढ़ती हैं। यहां से गंगा जी अब आगे दोनों ओर पहाड़ों के बीच की सकरी जगह के स्थान पर कुछ चौड़े स्थान से होकर बहती है।

गंगा यंहा हाथी, बाघ व तरह-तरह के वन्य प्राणियों तथा वनस्पतियों के लिए जाना जाने वाले राजाजी राष्ट्रीय वन्य जीव अभयारण्य के बीच से होकर हरिद्वार पहुंचती है। एक बड़े भू-भाग पर स्थित इस नेशनल पार्क में प्रकृति प्रेमी वन्य जीवन को निहारने का आनंद ले सकते है।

गंगा जी के ऋषिकेश से हरिद्वार तक आने के रास्ते में एक पौराणिक स्थान नारायण चट्टी है। यहां श्री सतनारायण जी का मंदिर है।

इसके बाद गंगा जी भारतीय सनातन संस्कृति के प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हरिद्वार पहुंचती हैं। हरिद्वार भारत की प्राचीन व पौराणिक सप्त पुरियों में से है। गंगा जी यहां पर्वतों के बीच से निकल कर आगे विशाल समतल मैदान में प्रवेश करती है। गंगा जी की विचित्र शोभा देखने का सौभाग्य सबसे पहले हरिद्वार में ही प्राप्त होता है।

हरिद्वार सनातन हिंदू धर्म के सबसे बड़े तीर्थों में से एक सबसे बड़ा तीर्थ है। हिंदू धर्म में हरिद्वार का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। पुराणों में इसकी महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। हरिद्वार में स्नान करने का बड़ा माहात्म्य है। हर की पैड़ी पर स्थित ब्रह्म कुंड में बस एक बार ही सही स्नान करने की हिंदू धर्म को मानने वाले हर श्रद्धालु की जीवन पर्यंत चाह बनी रहती है।

हरिद्वार में पौराणिक महत्व के अनेकों स्थान है, जिनके दर्शन करने का भी बड़ा पुण्य है।

हरिद्वार में श्राद्ध और तर्पण करने का भी पुराणों में बहुत महत्व बताया गया है। देश विदेश से श्रद्धालु अपने पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण करने के लिए यहां गंगा तट पर आते हैं।

हरिद्वार की हर की पैड़ी को भारतवर्ष के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है।

हरिद्वार में बिल्व पर्वत की चोटी पर प्रसिद्व मनसा देवी का मंदिर है। यहां तक जाने के लिए रोप वे की व्यवस्था है। जिसमें बैठकर जाने पर हरिद्वार का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
हरिद्वार में दूसरी ओर गंगा की नील धारा को पार करके नील पर्वत की चोटी पर चंडी देवी का प्रसिद्ध मंदिर है।
यंहां भी रोप वे से जाने की सुविधा है।

माया देवी का मंदिर, नारायणी शिला, गौरी शंकर मंदिर, नील महादेव मंदिर, बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर, भैरव देव मंदिर आदि और भी बहुत से पौराणिक महत्व के स्थान हरिद्वार में व इसके आसपास स्थित है।

हरिद्वार धार्मिक पूजा-पाठ की सामग्री,मूर्तियों,कंबल – ऊनी वस्त्रों आदि सामानों के बाजार के लिए भी प्रसिद्ध है।

हरिद्वार से ही इस क्षेत्र को धन्य धान्य से परिपूर्ण करने वाली गंग नहर शुरू होती है।

हरिद्वार से कुछ ही दूरी पर गंगा के दाहिने किनारे पर बसा हुआ पौराणिक तीर्थ कनखल है। कनखल एक अति प्राचीन स्थान है। इसी स्थान पर सनत्कुमार ने तप किया था। इसी स्थान पर दक्ष प्रजापति ने अपने दामाद भगवान शंकर को अपमानित करने के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन क्या था, जिसमें अपने पति भगवान शंकर को अपमानित होते हुए देख कर सती ने अपने शरीर को भस्म कर दिया था।
कनखल में दक्षेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है।

बड़ी संख्या में यहां सन्यासियों और वैरागीयों के मठ और अखाड़े हैं। यहां प्राचीन बड़े-बड़े भवन हैं लेकिन खाली और उजाड़ पड़े हैं। हिंदी से कुछ भवनों पर बहुत सुंदर चित्रकारी की गई है जो दर्शनीय है। लंटौर वाली रानी की छतरी और घाट दर्शनीय है।

कनखल से आगे गंगा किनारे प्रसिद्ध गुरुकुल विश्वविद्यालय है

इससे आगे गंगा के बाएं तट पर चांदपुर स्थान है। यहां से आगे गंगा के पास नागल नामक स्थान है। यहां पर गंगा तट तक बड़े बड़े ऊंचे रेत के टीले बनते चले गए हैं। इनके अंदर गुफाएं हैं। नागल की खोहें देखने योग्य है। यहां से आगे चलकर गंगा प्राचीन मंडावर नगर के पास पहुंचती है। या देवी का मंदिर है। नवरात्र के समय या मेले लगते हैं।

यही गंगा के उत्तरी तट की ओर प्रसिद्ध पौराणिक तीर्थ स्थान शुक तीर्थ है। यह वही स्थान है जहां राजा परीक्षित को शाप के बाद श्री शुकदेव जी महाराज ने गंगा तट पर एक वटवृक्ष के नीचे बैठकर सात दिनों तक श्रीमद् भागवत की कथा सुनाई थी। उस समय इस भागवत कथा को सुनने ८८ हजार ऋषि मुनि भी आए थे। भागवत की कथा सुनकर राजा परीक्षित को मोक्ष प्राप्त हुआ।
माना जाता है वहीं वटवृक्ष आज भी यहां मौजूद है।
पूरे वर्ष शुक तीर्थ में भागवत कथाएं और धार्मिक आयोजन होते रहते हैं।

शुक तीर्थ से कुछ ही आगे गंगा में सोनाली नदी का संगम होता है।

इससे आगे गंगा के दाएं तट की ओर मतावली घाट और दूसरी ओर रावली घाट है। रावली घाट के पास मालिनी नदी का गंगा में संगम होता है। पौराणिक काल में मालिनी नदी के तट पर महर्षि कण्व का आश्रम था। यही महाराजा दुष्यंत और शकुंतला का गांधर्व विवाह हुआ था। इनके पुत्र भरत यही
आश्रम में बाल्यकाल में हिंसक जीवों सिंह आदि के साथ खेला करते थे।

कुछ और आगे चलकर गंगा बिजनौर के पास पहुंचती है। यहां गंगा पर बैराज बनाया गया है।

बैराज से गंगा दारानगर -विदुर कुटी पहुंचती है। महाभारत के समय पांडवों की स्त्रियां यही स्थित पड़ाव में रही थी।
इसी स्थान पर उस समय महात्मा विदुर रहते थे भगवान श्री कृष्ण ने इसी स्थान पर दुर्योधन के राजसी भोजन को त्याग कर इसी स्थान पर विदुर के घर साग का भोजन किया था।
विदुर कुटी से आगे सीताबनी स्थान है। मान्यता है कि वनवास काल में सीता जी यंहा रही थीं।

इस क्षेत्र में ही गंगा के दोनो तटों की ओर हस्तिनापुर वन्य जीव अभयारण्य स्थित है। इस अभयारण्य में दुर्लभ बारहसिंघा हिरण का निवास स्थल है। गंगा के दाएं तरफ बहुत बड़े हिस्से में गंगा की दलदली खादर की भूमि है। इस दलदली भूमि में सघन ऊँची – ऊंची कई प्रकार की जंगली वनस्पतियां होती है। यहां कई तरह के वन्यजीव रहते हैं।

इसी क्षेत्र में से होकर बह रही गंगा में राष्ट्रीय जल जीव डॉल्फिन का निवास स्थान है।

यही गंगा के उत्तरी तरफ पौराणिक नगरी हस्तिनापुर है।
हस्तिनापुर जैन धर्म का भी बहुत बड़ा तीर्थ है।
यहां से कुछ आगे गंगा में बूढ़ी गंगा नदी का मिलन होता है
हस्तिनापुर से आगे गंगा पहुंचती है पौराणिक तीर्थ गढ़मुक्तेश्वर।
यहां कई प्राचीन मंदिर है।
गढ़मुक्तेश्वर से गंगा के दूसरी ओर तिगरी गांव है।
गढ़मुक्तेश्वर से आगे गंगा पर ब्रजघाट है। यहां से राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरता है। यह भारत का महत्वपूर्ण व अति व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग है। इसलिए रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक बृजघाट आते हैं।
बृज घाट के पास ही प्राचीन नगरी पूठ स्थित है। कहा जाता है कि महाभारत काल के समय हस्तिनापुर के राजाओं का उद्यान यही था और इसका नाम भी उस समय पुष्पवती था।

यहां से आगे गंगा अहार पहुंचती है। यहां कई प्राचीन मंदिर है। पर्व तिथियों पर गंगा स्नान के लिए यहां बहुत श्रद्धालु आते हैं।
पुराणों में वर्णन है,असुरो के उत्पात से जब पृथ्वी पर
हाहाकार मच गया, तो भगवान विष्णु ने वाराह का रूप यही धारण कर उनका दमन किया था।
इसी स्थान पर जनमेजय ने नाग यज्ञ किया था।
अहार में ही अवंतिका देवी का प्रसिद्ध मंदिर है।
इससे आगे गंगा के दाएं तट पर अनूपशहर धार्मिक स्थान है। अनूपशहर से आगे गंगा कर्णवास क्षेत्र से होकर बहती है।

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