__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के१०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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गंगा नदी यहां उत्तराखंड की सीमा से आगे मैदानी इलाके में मुजफ्फरनगर और बिजनौर जनपद की सीमा बनाती हुई ज्यादा क्षेत्र में बहाव बनाती हुई बहती है।

यहीं मुजफ्फरनगर और बिजनौर जनपद की सीमा पर गंगा नदी पर बैराज और पुल बना हुआ है। यह कोई छोटा मोटा नहीं काफी लंबा पुल और बैराज है। यह बहुत ही सुंदर जगह है। गंगा का पानी यहां दूर-दूर तक नजर आता है।

घूमने और पिकनिक के लिए बहुत अच्छी जगह है। पर्व एवं त्योहारों जैसे कार्तिक गंगा स्नान, एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा एवं अन्य त्योहारों के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां स्नान करने के लिए आते हैं। श्रद्धालु यहां स्नान के साथ-साथ धार्मिक संस्कार मुंडन, कथा- पूजन,दान, तर्पण इत्यादि भी करते हैं। उस समय इस स्थान पर मेले जैसा वातावरण बन जाता है।

गंगा नदी पर बना यह पुल अंतरराज्यीय महत्व का है। एक बहुत बड़े भूभाग के निवासी इस पुल के द्वारा लाभान्वित होते हैं। इस पुल से पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र का संबंध (किरतपुर व बिजनौर होकर) मेरठ व दिल्ली तथा मुजफ्फरनगर होकर हरियाणा से है।

समस्त रूहेलखंड व कुमायूं क्षेत्र का भी हरियाणा से इस पुल के द्वारा सीधा संबंध है। इस पुल से होकर कोटद्वार, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, नैनीताल आदि से मेरठ, दिल्ली तथा मुजफ्फरनगर होकर हरियाणा तक का सीधा संपर्क है।

गंगा यहां मैदानी इलाके में ज्यादा बड़े आकार के क्षेत्र में होकर बहती है। उस समय इस इलाके में गंगा नदी पर कोई पुल बना हुआ नहीं था। जिस कारण बिजनौर-कुमायूं क्षेत्र का मेरठ मुजफ्फरनगर आदि पश्चिमी क्षेत्र से सीधा संपर्क नहीं था। गंगा नदी को पार करके पश्चिमी इलाके में आने के लिए सड़क पुल दक्षिण में 90 कि.मी. दूर गढ़ के पास बृजघाट तथा उत्तर में भी 80 कि.मी.दूर हरिद्वार के पास था अतःएव बहुत समय से गंगा के दोनों तटों को जोड़ने वाले पुल की आवश्यकता महसूस की जाती थी एवं इस क्षेत्र की जनता की भी एक बहुत बड़ी मांग इसके लिए थी।

580 मीटर लंबे इस पुल के बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। सन 1974 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस बैराज पुल के बनाने की योजना की आधारशिला तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने एक समारोह में वर्तमान बैराज एवं पुल से 15 कि.मी. पूर्व में पौराणिक स्थान ‘विदुरकुटी’ के निकट रखी थी।

‘विदुर कुटी’ महाभारतकालीन वह स्थान है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने हस्तिनापुर में दुर्योधन के राजसी व्यंजनों को त्यागकर विदुर जी के घर साग खाया था। इस पौराणिक स्थल को रमणीक बनाने व मेरठ, मुजफ्फरनगर, दिल्ली, हरियाणा को इस क्षेत्र से सीधे जोड़ने के लिए इस स्थान को उपयुक्त पाया गया था।

श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस स्थान पर पुल बनाने के लिए शिलान्यास तो कर दिया लेकिन शिलान्यास होने के तीन साल बाद तक भी पुल के निर्माण में एक भी ईंट नहीं लगी। पुल के निर्माण के स्थान को लेकर खींचतान चलती रही। यह स्थान निजी स्वार्थों के षडयंत्र का शिकार हो गया।

कुछ लोग इसके निर्माण स्थल को बिजनौर के और पास लाने की कोशिश कर रहे थे जबकि कुछ अन्य लोग इसे विदुर कुटी के पास ही बनवाना चाहते थे। राज्य सरकार में क्षेत्र के दो मंत्रियों कैबिनेट व राज्य मंत्री में इस परियोजना को लेकर शक्ति परीक्षण चला और आखिर में जीत राज्यमंत्री की हुई। राज्य मंत्री ने इस पुल को शिलान्यास वाले स्थान से हटवा कर बिजनौर के पास ही वर्तमान स्थान पर बनवाने में सफलता पाई। इस स्थान पर पुल बनने से उनका फार्म हाउस गंगा की बाढ़ से सुरक्षित हो गया और उनका पैतृक गांव भी इस स्थान के पास से गुजरने वाले राजमार्ग के निकट आ गया।

आखिरकार बिजनौर के पास ही पुल बनना तय हुआ और इसके साथ बैराज व दो नहरों का बनना भी जोड़ दिया गया। रावली के निकट पुल का निर्माण शुरू किया गया। सेतु निगम को इस बैराज युक्त पुल को बनाने का काम दिया गया था लेकिन सेतु निगम को बैराज युक्त पुल बनाने का अनुभव नहीं था। सेतु निगम के द्वारा बनाया जाने वाला यह पहला बैराज वाला पुल था। इस पर काम भी तेजी से किया गया। लेकिन बाद में सेतु निगम को यह घाटे वाला सौदा लगने लगा था। आखिरकार 30 जून 1983 को पुल बनकर तैयार हो गया।


पुल बनकर तैयार हो जाने के बाद भी सिंचाई विभाग सेतु निगम से इसका चार्ज लेने में आनाकानी करता रहा और पुल पर रेलिंग बनाने के लिए सेतु निगम पर दबाव डालता रहा। लेकिन सेतु निगम सिंचाई विभाग की धौंस- पट्टी में नहीं आया और ठेके के अनुसार पुल व बैराज को सिंचाई विभाग को सौंप कर अलग हो गया।

इस पुल का इस क्षेत्र में कितना महत्व है यह इस बात से जाना जा सकता है कि इस बैराजपुल के बनने से पहले बिजनौर से (गजरौला) होकर मेरठ की दूरी 155कि.मी. थी जबकि बैराज बनने के बाद यह रास्ता केवल 75 कि.मी. ही रह गया। बिजनौर से मुजफ्फरनगर इस पुल से होकर केवल 48 कि.मी. दूर है जबकि इस बैराज के बनने से पहले बिजनौर से मुजफ्फरनगर पहुंचने के लिए लगभग 205 कि.मी. का रास्ता तय करना पड़ता था। इस तरह से दिल्ली, मेरठ, करनाल, पानीपत, मुजफ्फरनगर आदि का सीधा संबंध बिजनौर होकर किरतपुर, नजीबाबाद होकर पौड़ी गढ़वाल के प्रवेश द्वार कोटद्वार से तथा रुहेलखंड के सारे बड़े नगरों व कुमायूं क्षेत्र के सभी स्थानों से हो गया।

यह बैराजपुल 30 जून 1983 को तैयार हो जाने के लगभग ढाई साल बाद तक भी एक अदद उद्घाटनकर्ता लिए तरसता रहा।

जहां जनता में झूठी वाहवाही लूटने के लिए मात्र शिलान्यास कर देना तथा आधी अधूरी योजनाओं/भवनों का उद्घाटन कर देना तो आज के युग में एक आम घटना है लेकिन गंगा नदी पर बना विशाल बैराज पुल उद्घाटन के लिए एक लंबे समय तक तरसता रहा था।

इस अवधि में पता नहीं कितने मंत्री इस क्षेत्र में आए थे लेकिन किसी का भी ध्यान इसकी तरफ नहीं गया। उस समय समाचार पत्रों में भी इस बारे में विस्तार से लिखा गया था। सांसद पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपने चर्चित कॉलम में इसके बारे में दमदार ढंग से लिखा। सांसद बालकवि बैरागी ने इस पर कविता लिखी। संसद व विधानमंडल में भी इस बात को उठाया गया लेकिन उस समय किसी ने भी इसकी ओर ध्यान नहीं दिया था।

आखिर बिजनौर लोकसभा के उपचुनाव के कारण इस बैराज पुल को बिना रस्मो रिवाज के 1 दिसंबर 1985 को आम जनता के लिए खोल दिया गया।

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