गंगा यमुना की यह भूमि पौराणिक व लुप्त सरस्वती नदी की भी भूमि है।

वेदो पुराणों ने जिसकी महिमा गाई वह नदीतमा सरस्वती नदी यहां बहती थी।

गंगा और यमुना यह दोनों पवित्र नदियां आज भी साक्षात इस भूमि सीच रही है। लेकिन महाभारत काल में इस भूमि को गंगा और यमुना के साथ साथ पवित्र सरस्वती नदी भी सिंचती थी।

वैदिक काल की सर्वश्रेष्ठ नदी सरस्वती नदी थी। ऋग्वेद में सरस्वती नदी को नदीतमा कहा गया है, यानी सर्वश्रेष्ठ नदी। वेदों की ऋचाओं में सरस्वती नदी का सबसे अधिक गुणगान किया गया है। ऋग्वेद के ७५ मंत्रों में सरस्वती नदी का उल्लेख आया है। इसके विपुल जल प्रवाह को आधार बनाकर ऋग्वेद में ऋषियों ने सरस्वती नदी की वंदना की है। इसके तटों पर बैठकर ही ऋषियों ने सबसे पहले वेदों की ऋचाओं का गान किया। इसी के तट पर वेद रचे गए और दूसरे ग्रंथों का सृजन हुआ।

सरस्वती नदी के तट पर वेदों के इतने महत्वपूर्ण मंत्रों की रचना की गई, विशेष तौर पर ऋषि वशिष्ठ, मैत्रावरूण आदि ऋषियों ने वेदों के इतने उच्च कोटि के सूक्त लिखें कि सरस्वती को विद्या का केंद्र ही नहीं सरस्वती को विद्या की देवी ही मान लिया गया।

ऋग्वेद नदी स्तुति स्त्रोत में पूर्व दिशा में यमुना नदी और पश्चिम में सतलुज नदी के बीच से सरस्वती नदी को प्रवाहित होना बताया है।

वेदों में नदियों का वर्णन करते हुए बताया गया है कि गंगा के पश्चिम में यमुना बहती है और यमुना के पश्चिम में सरस्वती नदी बहती है।

इसी सरस्वती नदी के किनारे पौराणिक काल में दो महायुद्ध लड़े गए थे। एक तो कौरवों और पांडव के बीच लड़ा गया महाभारत का भीषण युद्ध। हमारे देश और संस्कृति की इस अभूतपूर्व घटना को महर्षि वेदव्यास ने महाभारत जैसी महापुराण लिखकर अमर कर दिया।
इसी सरस्वती नदी के तत्वों के पास इस महाभारत युद्ध से भी पहले (भगवान श्री राम के कुछ पीढ़ियों के बाद के समय) एक और महायुद्ध लड़ा गया था। इस महायुद्ध को दाशराज युद्ध के नाम से जाना जाता है, जो उस समय के दस राजाओं के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध को दुष्यंत के पुत्र भारत के वंशधर में राजा सुदास ने जीता था। राजा सुदास के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं।

सरस्वती नदी के तटों पर आर्य सभ्यता का विकास हुआ।

विद्वानों के अनुसार वेदों में अद्भुत और विशाल सरस्वती नदी की जलधारा के लिए कहा जाता है कि यह हिमालय मैं अपने उद्गम से लेकर समुद्र की ओर बहती थी और एक मां की भांति मार्ग में पड़ने वाले भू भाग को अपने जल से सिंचित व धन्य धन्य से परिपूर्ण करती थी।
ऋग्वेद में भारत की प्रमुख नदियों के विषय में बताते हुए
क्रमशः गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों का उल्लेख किया गया है।
ऋग्वेद में सरस्वती नदी को इसकी क्षमता विशालता और गुणवत्ता में सर्वश्रेष्ठ नदी बताया गया है। इसीलिए सरस्वती नदी को अन्य नदियों की मां का स्थान दिया गया है।
सरस्वती नदी जो कभी नदीतमा थी शिवालिक पर्वत श्रंखला से निकल कर पश्चिम भारत को नहलाती सिंचती हुई यह नदी अरब सागर में जाकर मिलती थी।

सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। जहां नदियां होती है वहीं सभ्यता पनपती है। नदी के पास ही खेती होगी, गांव और नगर बसेंगे इतिहास का सर्जन होगा तीर्थ भावना पैदा होगी और उसके किनारे बसने वालों के रोम रोम में वह नदी बस जाएगी। और जब वह नदी सरस्वती जैसी नदीतमा जैसी नदी हो तो इन बातों का प्रभाव और भी अधिक होगा।
पवित्र सरस्वती नदी से ही कुरुक्षेत्र इतना बड़ा तीर्थ भारतीय धर्म संस्कृति के जनमानस में माना गया, सरस्वती नदी से ही यानी आज का पेहोवा में पितरों का श्राद्ध करना वैसा ही महत्वपूर्ण माना जाता है जैसा कि गंगा के किनारे हरिद्वार में पितरों का श्राद्ध तर्पण करना।

पुराणो और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार यह विशालतम नदी महाभारत काल में अज्ञात कारणों से लुप्त हो गई।
विद्वानों के अनुसार धरती की उथल-पुथल के कारण सरस्वती नदी की जल धाराएं दूसरी ओर मुड़ गई और इसलिए यह नदी सूख गई।
महाभारतकाल के समय आदिबद्री से लेकर खंभात की खाड़ी तक बहने वाली और फिर लुप्त हो गई

विशाल सरस्वती नदी के किनारे ऐसे लगभग २६०० स्थान पुरातत्व शास्त्रीओं ने खोज निकाले हैं, जिनमें से १५०० से अधिक ऐसे स्थान है जहां हड़प्पा काल में मानव का निवास था। इनमें राजस्थान का कालीबंगा प्रसिद्ध पुरातत्व स्थल है। ऐसे ही पुरातत्व स्थलों से प्राप्त प्रमाणों से यह पता चलता है कि वह सभ्यता कितनी उन्नत थी। इतिहासकारों के सामने यह भी जिज्ञासा है कि इस सरस्वती नदी के किनारे ही इतिहास की लंबी श्रंखला क्यों है

कुछ दशक पहले तक सरस्वती नदी को काल्पनिक बताया जाता था लेकिन अब कोई संशय नहीं है कि भारतीय संस्कृति के मन में बसी पावन सरस्वती नदी अपनी विशाल जल राशि के साथ यहां बहती थी।
वैज्ञानिक सर्वेक्षणों से पता चला कि आज के समय लुप्त सरस्वती नदी उस समय हर की दून से शुरू होकर कच्छ की रण तक जाती थी और फिर समुद्र से जा मिलती थी।
सेटेलाइट के माध्यम से लिए गए चित्रों से सरस्वती के मार्ग ढूंढने में लगे वैज्ञानिकों को सेटेलाइट के माध्यम से मिले चित्रों से देश के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में भूगर्भीय एक विशाल जलाशय के प्रमाण मिले। जिसे सरस्वती नदी का ही हिस्सा माना जा रहा है। यह भी अनुमान हे की हजारों साल पहले इस क्षेत्र में वह नहीं सरस्वती नदी की जलधारा कुछ स्थानों पर तो 8 किलोमीटर तक चली थी, जो बाद में सूख गई। हमारी सनातन संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में सरस्वती नदी के मार्ग का जो वर्णन किया गया है, वह भी यही क्षेत्र है। प्रमाण तो यह भी मिले हैं कि इसका जल आज भी इस क्षेत्र की सतह के नीचे बह रहा है।

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