___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.भारत)के १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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फुलत गांव – महात्मा गांधी भी आए थे इस गांव में।

मुजफ्फरनगर जनपद में खतौली कस्बे से केवल पांच कि.मी. की दूरी पर बसा हुआ है ऐतिहासिक गांव फुलत। इस गांव को वलियों की बस्ती कहा जाता है।

मुस्लिम शिक्षा और स्वतंत्रता की लड़ाई में फुलत गांव के योगदान की बहुत चर्चा होती है।

बताया जाता है कि सिकंदर लोदी के उस्ताद शेख युसूफ नासिरी ने सन 1382 में इस गांव में एक मदरसे की स्थापना की थी। इस मदरसे की स्थापना के समय से ही विश्व विख्यात उलेमा यहां महजबी तालीम देने के कार्य में सहभागी बने।

सिकंदर लोदी के उस्ताद शेख मोहम्मद युसूफ ने लाल मस्जिद के समीप एक पेड़ के नीचे सिकंदर लोदी की पुत्री और सैनिकों को शिक्षा दी थी।

दुनिया के प्रमुख इस्लामिक विद्वान हजरत शाह वलीउल्लाह का जन्म इसी गांव में हुआ था। यहां के लोग बताते हैं कि दो साल में जन्मे थे हजरत वलीउल्लाह।शाहवलीउल्लाह की मां फारुखी निशा दिल्ली में रहती थी। शाहवालीउल्लाह तब उनके पेट में ही थे। दो साल तक उनका जन्म नहीं हुआ। एक दिन सपने में उनकी मां को वलीउल्लाह का जन्म फुलत गांव में होना दिखाई दिया। उस सपने को देखने के बाद उनकी मां फुलत गांव आई। उसके बाद ही उनका जन्म यहां फुलत गांव में हुआ था।

हजरत वलीउल्लाह ने ही हिंदुस्तान में इलमे हदीस को प्रतिस्थापित किया था। कहते हैं कि इसके बाद ही आज तक जितने भी एशियाई मदरसे हैं उन सबका सिलसिला इसी मदरसे यानी इलमे हदीस से शुरू होता है।

शाह वालीउल्लाह जिस कमरे में पैदा हुए थे वह कमरा आज भी फुलत गांव में मौजूद है। उस कमरे में लोग नमाज पढ़ते हैं। इस कमरे में एक नल लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस नल का पानी पीने से बहुत से रोग दूर हो जाते हैं। विदेशों से भी बहुत से लोग इस नल का पानी लेने के लिए यहां आते हैं। लोगों का विश्वास है कि इस कमरे में नमाज पढ़ने से उनके मन की मुराद पूरी हो जाती है।

कहते हैं कि हजरत शाह वलीउल्लाह ने हजरत शाह के अबुर्रहीम को नवी के सपने में अपनी दाढ़ी के दो बाल दिए थे, सुबह जब उनकी आंख खुली तो तकिए के नीचे उन्हें दाढ़ी के दोनों बाल रखे मिले थे। उसमें से एक बाल हजरत शाह वालीउल्लाह को मिला जिसे वह दिल्ली ले गए। बाल आज भी फुलत में आफताबग अली पुत्र लियाकत के यहां मौजूद है। एक नवी दाढ़ी का बाल शाह अबुर्रहीम के बेटे शाह शहतुल्ला के हिस्से में आया था। वह बाल आज भी फुलत के एक मकान में मौजूद है। फुलत गांव में ही 4 सेंटीमीटर की एक चौड़ी पट्टी पर लिखा हुआ सुसज्जित कुर‌आन पाक और नवी के कदम शरीफ शरीफ के पत्थर पर पैरों के निशान मौजूद हैं। ‌

फुलत गांव में शाह अबुर्रहीम की मजार पर लोग फातिहा पढ़ने के लिए आते हैं। इस मजार पर लोगों के आने का तांता लगा रहता है। विदेशों से भी इस मजार को देखने के लिए लोग आते हैं।

सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इस गांव के उलेमा, पुरुष और महिलाओं ने भी कुर्बानी दी थी। फुलत गांव के उलेमाओं ने पहली जंगे आजादी के समय अंग्रेजो के खिलाफ फतवा जारी किया था। आजादी की लड़ाई के दौरान इस गांव के पुरुषों ने ही नहीं महिलाओं ने भी बढ़- चढ़कर भाग लिया था और कुर्बानियां दी थी।
शाह वालीउल्लाह के पुत्र शाह अब्दुल अजीज ने अंग्रेजो के खिलाफ फतवा जारी किया था। जिस पर अंग्रेजों ने उलेमाओं के खिलाफ कार्यवाही की थी।

फुलत गांव के मदरसे की प्रसिद्धि को देखते हुए और यहां की सरजमी को नमन करने के लिए आजादी के मतवालों की सरजमी गांधी जी को यहां खींच लाई थी। आजादी के बाद महात्मा गांधी सन 1948 में यहां आकर नतमस्तक हुए थे और यहां के मौलाना एवं छात्रों के बीच कुछ समय गुजारा था। फैजुल इस्लाम हाई स्कूल में गांव के लिए एक प्रशंसा पत्र देकर गए थे। प्रबंध समिति के पास उनका यह अनमोल पत्र आज भी सुरक्षित है। इस पत्र को देखने के लिए दूर-दूर से लोग फुलत गांव आते हैं।

फुलत गांव के निवासियों का कहना है कि फुलत गांव इतिहास की धरोहर है और देश विदेश के लोग भी इस गांव के इतिहास पर शोध के लिए यहां आते हैं। प्रशासन को भी इस गांव की धरोहर की ओर ध्यान देना चाहिए।

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