_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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  1. बेहतरीन खुसबूदार बासमती चावल होता है यहां गेहूँ के उत्पादन से देश का अन्न भंडार भरते है यहां के मेहनती किसान।

    हल

 

०००    ०००   बासमती चावल    ०००    ०००

बासमती चावल का उत्पादन गंगा यमुना के इस मैदानी इलाको में होता है। गंगा  यमुना के इस मैदानी क्षेत्र में बेहतरीन किस्म का बासमती चावल पैदा होता है, इसके स्वाद और सुगंध का जलवा समूची दुनिया में फैला हुआ है।

दुनिया में धान की खेती सबसे पहले भारत में ही प्रारंभ हुई थी।

धान भारत की धार्मिक सांस्कृतिक फसल मानी जाती है। हमारे देश की सनातन संस्कृति और धर्म में धान और चावल का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। कोई भी संस्कार और पूजा इनके बिना अधूरी है।

हमारे देश का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां चावल चाव से न खाया जाता हो।

अधिक समय नहीं बीता है, जब हमारे देश भारत में धान की लगभग 30,00 किसमें होती थी। दुनिया भर में जहां कहीं धान उगाया जाता है  वहां धान की किस्में भारत से ही फैली है।

इस क्षेत्र की विशिष्ट एवं अनुकूल जलवायु बासमती चावल के उत्पादन के लिए श्रेष्ठ है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यह क्षेत्र अपने आप में एक विशेष धरातलीय बनावट रखता है ।

बासमती कहलाने वाले चावल में कई गुण और विशेषताए होती है। इस इलाके में उत्पादित होने वाले बासमती चावल में भरपूर सुगंध पाई जाती है। चावल का दाना लंबा और पतला होता है, लंबाई लगभग 7 एमएम होती है। बासमती चावल पकाने पर केवल लंबाई में ही बढ़ता है पकाने में चौड़ाई में किसी तरह का फैलाव नहीं होता। बासमती चावल पकाने के बाद ठंडे होने पर भी नर्म बने रहते हैं और चावल के दाने आपस में चिपकती भी नहीं है, चावल के दाने खिले खिले रहते हैं।

बासमती चावल के इन उत्कृष्ट गुणों को प्रभावित करने में जमीन में पाए जाने वाले विशेष तत्व और तापमान का बहुत महत्व होता है जो सब इस इलाके में पाए जाते हैं।

उत्तराखंड में देहरादून का बासमती चावल बहुत पहले से ही देश विदेश में प्रसिद्ध है।

बासमती चावल के विदेशों में विदेशों में निर्यात से भारत सरकार को अरबों खरबों रुपए की आय प्राप्त होती है।

बासमती चावल को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में एक नई पहचान मिली है। लंबे दाने और सुगंध वाले बासमती चावल को अब जी आई टैग मिल गया है।

भारत के 77 जिले जहां पर परंपरागत रूप से बासमती चावल की खेती की जाती है। यह जिले हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश उत्तराखंड दिल्ली पंजाब और जम्मू कश्मीर के हैं। पाकिस्तान के पंजाब में बासमती चावल की खेती करने वाले इलाके को इसमें शामिल किया गया है।

जीआई टैग मिलने से अब समूची दुनिया में भारतीय बासमती चावल निर्विवाद रूप से अकेला होगा। इससे गंगा यमुना के मैदानी इलाकों में होने वाले बासमती चावल की खुशबू पूरी दुनिया में फैलेगी । क्योंकि बासमती चावल के अंतरराष्ट्रीय बाजार पर 85 फ़ीसदी भारत का ही कब्जा है और इसमें से सबसे अधिक बासमती चावल का विदेशों को निर्यात इसी इलाके में उत्पादित होने वाले बासमती चावल का होता है।

अब कोई अन्य देश अपने चावल को बासमती चावल कह क नहीं बेच सकेगा।

भारतीय बासमती चावल की सर्वाधिक मांग मध्य पूर्व के देशों के साथ अमेरिका व अन्य देशों में है।

इस इलाके के हरियाणा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से लाखो टन ब्राउन राइस का निर्यात भी यूरोप के देशों व अन्य देशों को किया जाता है।

इस इलाके में बासमती चावल का सबसे अधिक उत्पादन हरियाणा में यमुना नदी के पश्चिमी और के मैदानी भागों में किया जाता है। यहां के करनाल कुरुक्षेत्र यमुनानगर अंबाला पानीपत सोनीपत के इलाकों में बासमती धान की खेती बहुत बड़े स्तर पर की जाती है। ध्यान से चावल निकालने के बड़े-बड़े कारखाने हैं।

तरावड़ी कैथल करनाल कुरुक्षेत्र यमुनानगर पानीपत आदि में बड़ी बड़ी धान की मंडियां है।
हरियाणा की तरावड़ी मंडी इस समय बासमती धान की देश की सबसे बड़ी मंडी के रूप में जानी जाती है।

हरियाणा की इन मंडियों से निर्यातक लाखों टन बासमती चावल विदेशों को निर्यात करते हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गंगा यमुना के बीच के इस इलाके में व गंगा पार के जनपद बिजनौर आदि में गन्ना नकदी फसल के रूप में बड़े पैमाने पर बोया जाता है। यह पूरा इलाका गन्ना बेल्ट के रूप में प्रसिद्ध है। फिर भी इस पूरे क्षेत्र में बासमती चावल भी बहुत बड़े पैमाने पर बोया जाता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस इलाके का सहारनपुर क्षेत्र बासमती उत्पादक जिलों में प्रमुख है। इसके अलावा बागपत शामली मुजफ्फरनगर बिजनौर मेरठ, उत्तराखंड के हरिद्वार व देहरादून के क्षेत्रों में बढ़िया किस्म के बासमती चावल का उत्पादन किया जाता है।

इस इलाके में जहां कहीं भी बासमती धान बोई जाती है वह सब सिंचित इलाका है। लेकिन समय पर मानसून आने और अच्छी वर्षा होने से खरीफ फसलों के समय में बासमती धान की खेती को बढ़ावा मिलता है किसान की खेती पर लागत कम आती है। आमतौर पर किसान बुवाई के लिए खेत तैयार करने के लिए सिंचाई का सहारा लेते हैं। समय पर मानसून आने पर किसानों का पंपिंग सेट से सिंचाई करने की लागत का भार नहीं सहना पड़ता है।
मानसून की पहली बारिश शुरू होते ही किसानों के चेहरे खिल जाते हैं उनके चेहरे पर रोनक आ जाती है।
बारिश के पानी से खेत लबालब भर जाते हैं और किसान
धान की रोपाई शुरू कर देते हैं। इस समय इस क्षेत्र में यात्रा करते समय रिमझिम बारिश में खेतों में किसान और मजदूरों को धान की रोपाई करते हुए देखने का आनंद लिया जा सकता है।

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०० सरसों ००

मौसम के अंगड़ाई लेते ही धरती सरसों के पीले फूलों का साज श्रृंगार कर अपने मित्र ऋतुराज बसंत को आमंत्रण दे रही होती है।

गंगा यमुना की इस भूमि में सरसों की फसल भी काफी मात्रा में बोई जाती है।
सरसों के पीले फूल अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। यहां के बहुत से स्थानों पर दूर तक सरसों के खेत होते हैं। प्रकृति की चित्रकारी भी कितनी सुंदर है। दूर तक फैले सरसों के खेत पीले फूलों की चादर ओढ़ लेते हैं। ऐसा लगता है मानो धरती की ओढ़ी हुई हरी चादर पर किसी ने पीले फूलों को टांक दिया है।
फरवरी का महीना शुरू होते ही वातावरण हल्का गर्म होने लगता है। वसंत ऋतु का आगमन हो रहा होता है। खेतों में फुलती सरसों पर पीले फूल आ जाते हैं। पीले पीले फूलों से सरसों के खेत महक रहे होते हैं। सरसों के फूलों की भीनी भीनी सुगंध वातावरण को और भी मोहक बना देती है।
इस समय सरसों के पीले फूलों से लदे खेतों के समीप से गुजर रहा कोई भी व्यक्ति इन्हें निहारे बिना नहीं रह सकता।

इस समय कुछ पल इन सरसों के पीले फूलों से लकदक खेतों के बीच गुजारे। मन में उल्लास और उमंग की तरंगे उठने लगेगी। ऋतुराज बसंत का अनुभव कर मन पुलकित हो उठेगा।
गंगा यमुना के इस मैदानी भूभाग में यात्रा करते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में फरवरी महीने के वसंती मौसम में न जाने कितनी जगह आपको सरसों के पीले फूलों से लकदक खेतों को देखने का निहारने का अवसर मिलेगा। कुछ पल रुक कर इन वासंती दृश्यों का आनंद उठाएं।

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……… गेहूं ……..

यह गंगा यमुना का इलाका है।
गेहूं इस इलाके की प्रमुख फ़सल है। बहुत बड़ी मात्रा में यहां के किसान गेहूं की खेती करते हैं।

हरियाणा प्रांत में इस क्षेत्र के यमुना पार के इलाकों करनाल पानीपत सोनीपत यमुनानगर कुरुक्षेत्र आदि जनपदों के मेहनती किसान बड़ी मात्रा में गेहूं की खेती करते हैं और देश के अन्न भंडार को खाद्यान्न से भर देते हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गंगा यमुना के दोआब को शुगर बेल्ट के रूप में जाना जाता है। इस इलाके की मुख्य फसल गन्ना है। लेकिन फिर भी इस इलाके के मेहनती किसान गन्ने के सीजन में भी अपने गन्ने के खेतों से गन्ने को काटकर शुगर मिल में गन्ना डाल देते हैं या फिर गुड बनाने वाले कोहलू पर गन्ना बेचकर अपने गन्ने के खेतों को खाली करके रबी की फसल में गेहूं की बुवाई कर लेते हैं। इस इलाके में गन्ने के बाद गेहूं दूसरी प्रमुख फसल है। क्षेत्र में गन्ने के खेतों से लगे हुए गेहूं के खेत भी यहां पर बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं।
गन्ने की फसल से किसानों को गेहूं के साथ साथ उनके दुधारू पशुओं के चारे के लिए भूसा भी मिल जाता है। भूसा दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक चारे के रूप में काम में लिया जाता है।
गंगा यमुना के इस मैदान के इलाके में जनवरी माह के बाद जब तेज सर्दी का जोर कम हो जाता है। रात को कोहरा
पडना भी समाप्त हो जाता है। गेहूं की फसल को संजीवनी देने वाली हल्की-फुल्की बारिश हो जाती है।
इसके बाद आता है बसंत का मौसम इस समय गेहूं के
लहलहाते हरे भरे खेतों में गेहूं के पौधों में बालियां निकल जाती हैं। इस समय बालियों से लदे दूर तक लहलहाते गेहूं के हरे भरे खेतों को इस क्षेत्र में यात्रा करते हुए देखने का आनंद ही कुछ और होता है।

मार्च महीने के खत्म होते होते गर्मी बढ़ने लगती है। अप्रैल महीने के शुरू होते ही भीषण गर्मी और तेज पछुआ हवाओं से गेहूं की अगेती फसल पकने लगती है। वहीं गेहूं की पछेती फसल भी सुनहरी होने लगती है।

इस इलाके में गेहूं की की कटाई, जिसे यहां की स्थानीय भाषा में लाही का कटना भी कहते हैं। अप्रैल महीने के शुरुआत में ही शुरू हो जाती है। गांव देहात में बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष खेतों में पक कर तैयार खड़ी गेहूं की फसल की कटाई के कार्य में लग जाते हैं। मजदूरी पर काम करने वाले और गरीब तबके के लोग पूरे वर्ष का अनाज गेहूं कटाई के माध्यम से इन दिनों जुटा लेते हैं। जिसे देखते हुए शहरी क्षेत्र के मजदूर भी गांव का रुख कर लेते हैं।
कुछ दशकों पहले जब इतने संसाधन नहीं होते थे उस समय शहरी क्षेत्र में गेहूं कटाई के मौसम में सन्नाटा सा पसर जाता था, क्योंकि किसान और मजदूर गेहूं की फसल काटने के
लिए दिन रात खेतों में ही लगे रहते थे। शहरों में उस समय ग्रामीण क्षेत्र से बहुत कम लोग आते थे।
खेतों में गेहूं की फसल की कटाई के साथ ही अनाज और भूसा निकालने वाली थ्रेसिग मशीन पर भी काम जोर शोर से शुरू हो जाता है। इन दिनों गंगा यमुना के मैदानी इलाकों में हर और खेतों में गेहूं की कटाई करते हुए किसान और मजदूर दिखाई देंगे और साथ ही थ्रेसिंग मशीन पर गेहूं की फसल को गहाते समय दूर तक उड़ती भूसे की धूल को देखा जा सकता है। इस समय ग्रामीण इलाकों में चारों ओर गेहूं के भूसे की धूल की गंध को महसूस किया जा सकता है।
हर किसान की यह कोशिश होती है की वह जल्दी से जल्दी अपनी कई महीनों की मेहनत और गेहूं की फसल को तैयार करने में खर्च की गई लागत से प्राप्त हुई गेहूं की फसल उसके घर में पहुंच जाए।
इस समय तेज हवाएं चलती है उससे जगह जगह अग्नि कांड हो जाते हैं और इन दिनों मौसम भी खराब हो जाता है। आंधी तूफान भी जाते हैं कई कई दिन तक वर्षा भी हो
जाती है इससे तैयार गेहूं की फसल भीग कर खराब हो जाती है। इसलिए इतने गेहूं की तैयार फसल किसान के घर में ठीक-ठाक चली ना जाए उसे चिंता बनी रहती है।
इस समय के ग्रामीण माहौल और खेतों में जोर शोर से होते हुए इस काम को देखने का आनंद यहां आकर ही लिया जा सकता है। मेहनत से तैयार किए गए देश के अन्न भंडार को कैसे खेत खलिहानों से घर में लाया जाता है, इसे गांव देहात और खेत खलिहानों में जाकर ही देखा जा सकता है।

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०० ०० आलू ०० ००

गंगा यमुना की इस धरती पर यहां के किसान आलू की खेती परंपरागत रूप से करते चले आ रहे हैं।
क्षेत्र में मेरठ मुजफ्फरनगर शामली बागपत गाजियाबाद हापुड़ आदि इलाकों में आलू की खेती परंपरागत रूप से बड़ी मात्रा में की जाती है। यहां पर भी हापुड़ और मेरठ इलाके में आलू की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। आलू के भंडारण के लिए क्षेत्र में बड़ी संख्या में बड़े-बड़े कोल्ड स्टोर है।
इस इलाके के यह जनपद आलू उत्पादन के अग्रणी जनपद है।
आलू हम सभी की प्रमुख खाद्य वस्तु है। पूरे वर्ष तक आलू हमारी दैनिक आवश्यकता की वस्तु में शामिल है।
आलू एक ऐसी वस्तु है जिसे अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। पूरे वर्ष रोजाना इसकी आवश्यकता पड़ती है इसलिए इसका कोल्ड स्टोरों में भंडारण करना पड़ता है। लाखो टन आलू इन क्षेत्रों के कोल्ड स्टोरों में भंडारित करके रखा जाता है।
आलू की पैदावार अगर किसी साल ज्यादा हो या आलू की पैदावार किसी साल कम हो दोनों ही परिस्थितियों में आलू के मूल्य
प्रभावित होते हैं। आलू की पैदावार घटने या बढ़ने दोनों तरह से किसान प्रभावित होता है।
आलू की खेती पर लागत भी अधिक आती है।
बे समय की वर्षा भी आलू की फसल को खराब कर देती है। सर्दियों के मौसम में पढ़ने वाला पाला भी आलू की फसल को खराब कर देता है।
कभी कभी लगातार कई साल आलू के भाव कम रहते हैं इससे किसानों को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसे समय जिन किसानों के खेतों में आलू की अच्छी पैदावार हुई हो उन किसानों को सबसे अधिक हानी उठानी पड़ती है। ऐसी परिस्थिति में मंडी में आलू के दाम इतने कम होते हैं कि उन्हें खेत से मंडी तक पहुंचाने का खर्चा भी उसके मूल्य से अधिक होता है। ऐसे में किसान अपनी फसल को सड़क किनारे खुले में ही फेंक देता है। ऐसा इस इलाके में बहुत बार देखने को मिलता है।

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क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की सब्जियों का उत्पादन भी बहुत बड़ी मात्रा में किया जाता है। यहां की स्थानीय मंडियों में तो बिकती ही है। देश की राजधानी दिल्ली की आजादपुर सब्जी मंडी में भी भेजी जाती है।

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० ० गोभी ० ०

सर्दी के मौसम में तो गोभी हर जगह पैदा होती है, लेकिन मानसून में बरसात के दिनों में अगेती प्रजाति की गोभी कहीं-कहीं ही पैदा होती है। पहले उत्तराखंड के हल्द्वानी में अगेती प्रजाति की फूलगोभी पैदा होती थी।
लेकिन अब मुजफ्फरनगर के चरथावल इलाके में भी अगेती प्रजाति की फूल गोभी की खेती की जाती है। चरथावल क्षेत्र में पैदा होने वाली गोभी अगस्त के महीने में ही आने लगती है।
चरथावल में पैदा होने वाली गोभी खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होती है। इसलिए चरथावल की गोभी की बहुत मांग होती है।

चरथावल क्षेत्र में अब गोभी की खेती कई हजार बीघे भूमि पर की जा रही है। यहां गोभी के इतने अधिक उत्पादन का मुख्य कारण यह है कि यहां के खेत ऊंचाई पर है। बरसात के दिनों में लगातार कई दिन तक वर्षा होने पर या भारी वर्षा होने पर बरसात का पानी खेतों में नहीं भरता है। अगेती फूलगोभी की बढ़ती मांग के कारण यहां के किसानों ने गोभी की खेती का रकबा बढ़ा दिया है।
दीपावली तक गोभी की फसल के अच्छे दाम मिल जाते हैं। अधिक मांग के चलते फूलगोभी का बड़ी मात्रा में पैदावार करने वाले किसान अपने वाहनों से दूर की मंडियों में यहां की उत्पादित फूल गोभी को ले जाकर बेचते हैं।
दिल्ली व गाजियाबाद की मंडियों से पैकिंग हो कर यहां की फूलगोभी देश के दक्षिणी राज्यों में भी भेजी जाती है।
यहां के प्रगतिशील किसान कृषि मंडी व जनपद में निर्यात पार्क की मांग भी करने लगे हैं।
अगेती गोभी ने यहां के किसानों की काया पलट दी है।
सभी समुदाय के किसानों का फूल गोभी की खेती की ओर रुझान बढ़ रहा है। सभी समुदायों के किसान अगेती फूल गोभी की खेती करते हैं।
चरथावल कस्बे से भारी मात्रा में फूलगोभी की आपूर्ति विभिन्न मंडियों में की जाती है।

फूलगोभी की खेती चरथावल के अलावा इस क्षेत्र में और जगह भी की जाती है।
शामली का जलालाबाद कस्बे के आस-पास के गांव में गन्ने की फसल के साथ साथ फूलगोभी व पत्ता गोभी की भी खेती की जाती है। इन सब्जियों को यहां से शामली मुजफ्फरनगर पानीपत दिल्ली पठानकोट गोरखपुर तक की मंडियों में भेजा जाता है
बागपत जिले के चांदीनगर क्षेत्र में भी गोभी की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

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००० ० लहसुन ० प्याज ० ०००

गंगा जमुना की भूमि में शामली जनपद का जलालाबाद लहसुन की खेती में पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध है।
जलालाबाद के आस-पास के गांव नागल उमरपुर अंबेहटा याकूबपुर हसनपुर लुहारी आदि गांवों में लाखों कुंतल लहसुन का उत्पादन होता है।
लहसुन का उपयोग आयुर्वेदिक दवाई बनाने में भी होता है। आयुर्वेदिक और यूनानी दवाई बनाने में लहसुन का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। लहसुन का प्रयोग अचार मुरब्बा बनाने में भी होता है। यहां से अचार मुरब्बा बनाने वाली फैक्ट्रियों को भी लहसुन की आपूर्ति की जाती है।
यहां से लहसुन देश के दूर तक के इलाकों में जैसे उड़ीसा राजस्थान पश्चिम बंगाल गुजरात महाराष्ट्र असम आंध्र प्रदेश जम्मू कश्मीर व दिल्ली की मंडियों तक किया जाता है।
यहां पैदा होने वाले लहसुन की देश की मंडियों में खासी मांग रहती है। यहां के लहसुन का विदेशों में भी निर्यात किया जाता है।
लहसुन की खेती तैयार होने के बाद जैसे-जैसे लहसुन सूखता है किसानों के चेहरे लहसुन के भाव अच्छे होने पर चमकने लगते हैं। तो कभी कभी मौसम की मार से फसल अच्छी न होने या लहसुन के भाव कम होने से किसान निराश भी हो जाते हैं।

किसी समय यही जलालाबाद प्याज उत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध था।

क्षेत्र के बागपत जनपद के खेकड़ा इलाके में मवीकलां गांव व उसके आसपास हजारों बीघा भूमि पर प्याज की खेती की जाती है। इस गांव में पूरे जनपद में सबसे ज्यादा प्याज उगाई जाती है।

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० तीखी लाल मिर्च ०

इसी क्षेत्र के शामली जनपद में स्थित कैराना कस्बा अपनी
चरचरी मिर्ची के लिए प्रसिद्ध था। इतनी तीखी कि आंख और नाक से पानी निकालने वाली कैरानवी हरी मिर्च दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
कैराना के आसपास के क्षेत्रों में हजारों एकड़ में बोई जाने वाली हरी पीली मिर्च किसी समय पूरे भारत में अपनी
चरचराहट के लिए प्रसिद्ध थी। यहां पैदा होने वाली हरी पीली मिर्च को बाहर की मंडियों के व्यापारी हाथों हाथ मुंह मांगी कीमत पर खरीद लेते थे। यहां दिल्ली कोलकाता उड़ीसा बंगाल व देश के अन्य भागों की मंडियों के व्यापारी मिर्च खरीदने यहां आते थे।
कैराना में पहले पीली मिर्च का उत्पादन होता था। बाद में यहां लाल रंग की मिर्च का उत्पादन किया जाने लगा।
कुछ दशक पूर्व तक कैराना से हजारों टन मिर्च देश की अन्य मंडियों के व्यापारी यहां से खरीद कर ले जाते थे।
मिर्च की खेती करने वाले किसानों के यहां हजारों मजदूर व महिलाएं काम पाते थे। मिर्च की बुवाई जुताई गुडाई तथा
मिर्चियों के डंठल तोड़ने के लिए हजारों महिलाएं काम पाती थी। सैकड़ों बीघा खाली जगहों पर मिर्चों को सुखाया जाता था इस काम में भी बहुत से मजदूरों को रोजगार मिलता था।

लेकिन अब विभिन्न कारणों से यहां मिर्च की खेती कम होती गई और यहां के व्यापारी आठतियों ने भी मिर्च के कारोबार से नाता तोड़ लिया है। अब तो यहां पर बहुत कम मात्रा में मिर्च का उत्पादन होता है।

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गंगा यमुना के क्षेत्र में और भी बहुत सी सब्जियों का उत्पादन बड़ी मात्रा में। क्षेत्र में गंगा यमुना सहित कई नदियां हैं। शिवालिक की पहाड़ियों से भी बहुत सी बरसाती नदियां बहती है। बरसाती दिनों मैं जब यह नदिया पूरे वेग से बहती है उस समय को छोड़कर इन सब नदियों के किनारे सब्जियों का उत्पादन किया जाता है। इन नदियों के किनारे बेल वाली सब्जियां अधिक बोई जाती है जैसे खीरा तोरी लौकी कद्दू करेला ककड़ी आदि। यहां से इन सब्जियों को स्थानीय मंडियों के अलावा दिल्ली विदेश की अन्य मंडियों में भी बिक्री के लिए भेजा जाता है।

इस क्षेत्र में उत्पादित की जाने वाली कई सब्जियां तो दूर-दूर की मंडियों में प्रसिद्ध है।
मुजफ्फरनगर में खतौली क्षेत्र में फराश बीन को भी बड़ी मात्रा में बोया जाता है। यह सब्जी स्थानीय स्तर पर तो कम दिखती है लेकिन इसकी बिक्री पंजाब हिमाचल प्रदेश जम्मू कश्मीर आदि क्षेत्रों की मंडियों में की जाती है जाएं बहुत पसंद की जाती है।

सहारनपुर के मियानगी गांव के बैंगन बहुत प्रसिद्ध है। यहां हजारों बीघा जमीन पर बैंगन की खेती होती है। दिल्ली से लेकर पंजाब तक यहां के इस सर्खा बैंगन की बहुत मांग है, दिल्ली की आजादपुर मंडी मैं तो यहां का सुर्खा बैंगन इस मंडी में पहुंचते ही बिकना शुरू हो जाता है। मियानगी गांव के किसान बिना बीज वाली किस्म का बैंगन बोते हैं।
आजादपुर मंडी के आढ़ती बताते हैं कि बैंगन से ही इस छोटे से गांव मांगी की मियानगी की पहचान है।

मुजफ्फरनगर क्षेत्र में जानसठ व मोरना ब्लॉक में बड़ी संख्या में किसान गाजर की खेती करते हैं।
शामली जनपद के थाना भवन व कैराना क्षेत्र में भी गाजर की खेती की जाती है।
इसके अलावा यहां भिंडी मटर शिमला मिर्च चुकंदर आदि सब्जियों का उत्पादन भी किसान करते हैं।

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पॉपुलर और यूकेलिप्टस

गंगा यमुना के मैदानी भागों के यात्रा करने पर खेतों के किनारे मेंड पर लगे पॉपुलर के पेड़ दिखाई देते हैं। खेतों के चारों ओर तथा खाली पड़ी जमीन पर पॉपुलर के पेड़ इस इलाके में बड़ी संख्या में लगे हुए हैं। दूर तक चारों ओर ऊंचे पॉपुलर के पेड़ दिखाई देते हैं। इस क्षेत्र में यात्रा करते समय ऐसा आभास होता है कि जैसे किसी घने जंगल के बीच से गुजर रहे हैं। सितंबर महीने के बाद जब इस क्षेत्र में गन्ने की फसल भी बढकर ऊंची ऊंची हो जाती है तब यह आभास और भी अधिक हो जाता है।

कहीं-कहीं किसी किसान ने तो अपने बड़े-बड़े खेतों में केवल पॉपुलर के पेड़ ही उगा रखे हैं, इन खेतों में पंक्तियों मे लगे पॉपुलर के पेड़ों के बीच से टहलते हुए ऐसा लगता है कि जैसे किसी हिल स्टेशन की पहाड़ियों पर लगे पेड़ों के बीच में घूम रहे हो।

कुछ दशक पहले इस क्षेत्र में पॉपुलर की पौध लगाने का चलन शुरू हुआ। गन्ने के झमेले से परेशान किसानों ने अपने खेतों के चारों ओर पॉपुलर लगाना शुरू किया था। उस समय पॉपुलर की लकड़ी के भाव भी बहुत अधिक थे। कुछ वर्षों बाद जब पॉपुलर के पेड़ बड़े हुए तब किसानों ने अपने खेतों के किनारे लगाए हुए पेड़ों को कटवा कर बेचा उस समय उन किसानों को पॉपुलर की लकड़ी बेचने पर अच्छे दाम मिले। पापुलर से पैसा आने लगा तो बहुत से किसानों ने अपने पूरे खेतों में ही पॉपुलर को लगाना शुरू कर दिया। कुछ किसानों ने तो गन्ने की खेती बंद करके पापुलर की खेती ही शुरू कर दी।
पॉपुलर का पेड़ 6 या 7 वर्ष में बेचने लायक हो जाता है। पॉपुलर का पेड़ का वजन जितना बढ़ता है किसान का फायदा भी उतना ही होता है। पापुलर के एक पेड़ से जड़ ओवर अंडर बत्ती और सेंटी सहित पांच अलग रूपों में बिकने पर किसान को अच्छे पैसे मिल जाते थे।

साथ ही किसान पापुलर के पेड़ों के बीच गेहूं, पशु चारा व अन्य अधिक ऊंची नहीं बढ़ने वाली फसल उगा कर दोहरा लाभ प्राप्त कर लेता था।
पापुलर की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही थी। किसान एक बीघा जमीन में फसल उगाने पर जितनी आमदनी प्राप्त करता था उससे कई गुना उसे पॉपुलर के द्वारा मिल रहा था। किसानों ने गन्ने के बाद पॉपुलर की फसल को अपनी दूसरी पसंद बना लिया था। गन्ने की खेती से जहां महीनों महीनों बाद गन्ने को बेचने के बाद उसके दाम मिलते थे लेकिन पॉपुलर के पेड़ बेचने पर किसान को नगद पैसा मिल जाता था। पापुलर में मजदूरों की भी कम आवश्यकता पड़ती है। पापुलर की फसल के साथ किसान अन्य फसलों जिन्हें छाया की ज्यादा आवश्यकता होती है ऐसी फसल को भी उगा सकता है। पापुलर की खेती ने इस क्षेत्र में न जाने कितने किसानों की किस्मत बदल दी।

पॉपुलर की लकड़ी से इस क्षेत्र में प्लाईवुड बनाया जाता है जिसके यहां बड़ी संख्या में फैक्ट्रियां हैं।
इसके अलावा पॉपुलर की लकड़ी कागज उद्योग में लुगदी बनाने के काम आती है जिस से फिर कागज बनाया जाता है। पॉपुलर की लकड़ी से आइसक्रीम के चम्मच दियासलाई की तीलियां खेलों का सामान दांतो की स्टिक आदि अन्य चीजें भी बनाई जाती हैं।
पापुलर की लकड़ी से फलों की पेटियां भी बनाई जाती है। क्षेत्र में आम भी बहुत होता है जो यहां से इन पेटियो मे पैकिंग करके बाहर भेजा जाता है।
पतझड़ के मौसम में पॉपुलर की सारी पत्तियां झड़ जाती हैं यह पत्तियां खाद बनाने के काम आती हैं।

पॉपुलर की पौध 3 से 4 महीने बाद ही बड़ी हो जाती है तब इसे जंगली जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचा सकते हैं।
इस चित्र में पॉपुलर की लकड़ी बेचने की कई मंडिया भी अस्तित्व में आ गई जहां पर आसपास के स्थानों से पॉपुलर की लकड़ी बिकती है।

इस क्षेत्र में हरियाणा का यमुनानगर पॉपुलर से प्लाईवुड तथा प्लाईवुड का कच्चा माल (विनियर) बनाने का सबसे बड़ा केंद्र है। यमुनानगर में कई सौ फैक्ट्रियां लगी हुई है। उत्तराखंड के हरिद्वार में भी इस तरह की बहुत सी फैक्ट्रियां हैं।
लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर सहारनपुर मुजफ्फरनगर शामली बागपत मेरठ गाजियाबाद आदि क्षेत्रों में जहां पापुलर को बहुत बड़ी मात्रा में उगाया जाता है । इस तरह की फैक्ट्रियां नाममात्र को है। इस क्षेत्र मे होने वाली पॉपुलर की लकड़ी हरियाणा के यमुनानगर में ही भेजी जाती है।

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गंगा यमुना का यह इलाका दूध के उत्पादन में भी अपना विशिष्ट स्थान रखता है

मावा मंडी

इस क्षेत्र में मुजफ्फरनगर जनपद उत्तर भारत की सबसे बड़ी मावा मंडी के रूप में पहचान रखता है।
मुजफ्फरनगर की मावा मंडी में कई दर्जन दुकानों पर मावे की
आढ़त का कारोबार होता है। मुजफ्फरनगर जनपद में उत्पादित मावे की आपूर्ति पंजाब हिमाचल प्रदेश जम्मू कश्मीर और दिल्ली तक की जाती है। यह राज्य यहां उत्पादित होने वाले मावे के बाजार बन गए। सहारनपुर होकर पंजाब की ओर जाने वाली प्रत्येक ट्रेन में मुजफ्फरनगर स्टेशन पर रुकने वाली हर सवारी गाड़ी जो पंजाब की ओर जाती है ट्रेन के रुकते ही पहले से तैयार आदमी मावे से भरे हुए टोकरे इन ट्रेनों में लादने मैं जुट जाते हैं।

यहां उत्पादित मावे की स्थानीय तौर पर भी बड़ी मात्रा में खपत है। यहां के हलवाईयों के द्वारा भी मावे की बड़ी मात्रा में यहां उत्पादित मावे की खपत की जाती है।

यहां की मावा मंडी में आने वाला समस्त उत्पाद यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में तैयार किया जाता है। गांवों में भट्टीओं पर मावे को तैयार किया जाता है। तैयार मावे को मुजफ्फरनगर की मंडी और आसपास के शहरों कस्बा और अन्य पड़ोस के राज्यों में भेजा जाता है। भट्टीओं पर मावा तैयार करने के काम में हजारों लोगों को काम मिलता है।
किसी समय मुजफ्फरनगर का मावा गुणवत्ता की दृष्टि से सबसे अच्छा माना जाता था।
लेकिन अब मोटे लालच में सिंथेटिक मावा तैयार करके बेचा जाने लगा है। इससे यहां पर उत्पादित होने वाले मावे की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है।

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दूध उत्पादन के लिए भी गंगा यमुना का यह इलाका प्रसिद्ध है। यहां के ग्रामीण इलाकों में किसान खेती के साथ साथ पशुपालन भी करते हैं।
दूध की बड़ी मात्रा में उपलब्ध होने से क्षेत्र में अनेकों दूध प्रोसेसिंग के बड़े-बड़े प्लांट लगे हुए हैं। इन प्लांटों में रोजाना करोड़ों लीटर दूध की सप्लाई होती है। जिनमें दूध प्रोसेसिंग कर देसी घी मिल्क पाउडर व दूध से कई उत्पाद तैयार करके उपलब्ध कराए जाते हैं।

इस क्षेत्र में दूध उत्पादन के लिए भैंसों को पालने का अधिक चलन है। किसी समय यहां की मुर्रा नस्ल की भैंस अपनी दूध देने की क्षमता के लिए पूरे देश में विख्यात थी।

इस क्षेत्र में गंगातीरी नस्ल की गाय पाई जाती है। देसी नस्ल की यह गाय दोआबा क्षेत्र के गंगा नदी के किनारे के क्षेत्रों में पाई जाती है।
क्षेत्र के हरियाणा व हरियाणा से लगते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके में हरियाणा नस्ल की गाय पाई जाती है।
भारतीय देसी गायों में अधिक तापमान सहने की अद्भुत क्षमता होती है। देसी नस्ल की इन गायों को पौष्टिक तत्वों की भी कम आवश्यकता होती है। कीट एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता भी इनमें अधिक होती है। इनके रखरखाव में भी आसानी है।

किसी समय इस क्षेत्र में यह पशुधन बड़ी मात्रा में हुआ करता था। लेकिन पिछले कुछ दशकों से इस क्षेत्र में मांस विदेशों में निर्यात के लिए पशुओं का कटान बड़ी मात्रा में हो रहा है। इस क्षेत्र में जितने भी बूचड़खाने हैं उनमें उनमें
क्षमता से कहीं अधिक पशुओं का कटान रोजाना होता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी गाय और भैंसों का बड़ी मात्रा में अवैध रूप से कटान करके उनका मांस चोरी-छिपे मांस प्रोसेसिंग इकाइयों को भेजा जाता है।

इससे इस क्षेत्र में दुधारू पशुओं की बहुत कमी होती जा रही है। इससे यहां दूध के उत्पादन पर भी प्रभाव पड़ रहा है।
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० ० शहद ० ०

शहद औषधीय गुणों से भरपूर होता है। शहद को जिस आयुर्वेदिक औषधि ने मिलाया जाए वह उसके गुण और प्रभाव को बढ़ाता है। शहद का सेवन करने पर शरीर को गर्मी प्रदान करता है। शरीर का कोई हिस्सा जल जाए वहां पर शहद लगाने पर फफोले नहीं पड़ते। शहद घाव व नासूर को साफ करता है। शहद का सेवन गुर्दे गले उदर आंख नाक त्वचा व
पाचन रोगों में लाभकारी होता है। शहद के सेवन से शरीर को एनर्जी मिलती है।

गंगा यमुना के इस क्षेत्र में शहद का उत्पादन भी बहुत बड़े पैमाने पर होता है। यहां के किसान खेती के साथ साथ अब बड़ी संख्या में मौन पालन में भी रुचि ले रहे हैं।

क्षेत्र का सहारनपुर जनपद शहद उत्पादन में पूरे देश में प्रथम स्थान पर है।
सहारनपुर जनपद के रसीले शहद ने अमेरिका और यूरोप को अपना मुरीद बना लिया है। सहारनपुर के शहद की विदेशों में भारी मांग है। यहां के शहद की विदेशों में धूम मची है।
देश विदेश में यहां के शहद की भारी मांग से यहां पर मौन पालन कर शहद उत्पादन करने का काम बढ़ता ही जा रहा है।
हजारों लोग मौन पालन करके शहद का उत्पादन करने में लगे हैं। शहद उत्पादन के उद्योग को अपनाकर अपना जीवन स्तर भी सुधार रहे हैं।

इस क्षेत्र में गन्ना की फसल अधिक होने व फूल वाली फसलों की अपार पैदावार के कारण यहां इस क्षेत्र में शहद उत्पादन को और भी अधिक बढ़ाया जा सकता है।

सर्दी और वसंत ऋतु में शहद का उत्पादन कई गुना बढ़ जाता है। गर्मी में शहद उत्पादन कम हो जाता है।
गर्मी के मौसम में मधुमक्खियों के बक्सों को धूप से बचा कर छाया में रखना पड़ता है। गर्मी में फूलों की कमी हो जाती है इस कारण मधुमक्खियों को चीनी का हलका शरबत दिया जाता है।
बरसात का मौसम मधुमक्खियों के लिए सबसे मुश्किल भरा होता है। इस समय पराग और मकरंद की कमी हो जाती है मधुमक्खियों की देखभाल भी अधिक करनी पड़ती है।

कहीं लाख मधुमक्खियों के डिब्बों में कई करोड़ मधुमक्खियां पल रही है।
कई हजार लोगों को मधुमक्खी पालन से रोजगार मिल रहा है।
इस समय इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष कई लाख कुंतल शहद का उत्पादन होता है।
शहद को प्रोसेसिंग करने की यूनिट भी इस क्षेत्र में इस क्षेत्र में लगी हुई है। जिससे शहद उत्पादकों को कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता है।

शहद को उपभोक्ताओं की पसंद व मांग के अनुसार तरह-तरह की किस्म में जैसे लीची जामुन सरसों नीम यूकेलिप्टस आदि के अनुसार तैयार किया जा रहा है।

अमेरिका सहित कई यूरोपीय देशों को यहां से शहद निर्यात किया जाता है।

अपने देश में भी यहां के शहद की बहुत मांग है।

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० ० मुजफ्फरनगरी भेड़ ० ०

बहुत कम लोग जानते हैं किस क्षेत्र में उम्दा नस्ल की भेड़
की मुजफ्फरनगरी भेड पाई जाती है।यह भेड दूसरी अन्य किस्म की भेडो से अलग होती है। इसकी कई विशेषताए है।

इस नस्ल की भेड़ से अच्छे कालीन बनाने ऊन मिलती है। इस नस्ल की भेड़ बहुत जल्द वातावरण के अनुसार स्वयं को ढाल लेती है। मादा भेड़ रोजाना औषधीय गुण वाला दूध देती है। इस भेड़ का दूध स्वादहीन तो होता है लेकिन इसके दूध में पाचकता होती है।
मुजफ्फरनगरी भेड़ वैसे तो मुजफ्फरनगर जनपद में ही अधिक पाई जाती है लेकिन इसकी विशेषताओं के कारण यह भेड़ इस क्षेत्र के मेरठ बिजनौर गाजियाबाद हापुड़ बागपत सहारनपुर व इनसे लगते हरियाणा के इलाके पानीपत करनाल अंबाला सोनीपत के अलावा दिल्ली के कई गांवों में भी भेड़ पालक इन भेडों को शौक से पालते हैं।
एक और रोचक बात इन भेड़ों के बारे में यह है कि भेड़ों को पालने वाले गडरिये अपनी बेटियों की शादी में इन भेड़ों को दहेज में भी देते हैं। कहीं-कहीं तो लड़के वाले विशेष तौर पर दहेज में इन भेड़ों की मांग दहेज के रूप में करते हैं।
लेकिन अब इस नस्ल की भेडें धीरे धीरे समाप्त होती जा रही हैं। इसकी कई कारण है। कम उम्र में ही इस नस्ल की
भेडों का वजन बढ़ जाता है। इस कारण कम उम्र में ही मांस के लिए इन्हें मार दिया जाता है। चारागहों की कमी के कारण भेड़ पालने वालों के लिए इन्हें पालना मुश्किल हो रहा है।
धीरे धीरे इस नस्ल की भेड़ समाप्त होती जा रही है।

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