__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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दूधेश्वर नाथ मंदिर – गाजियाबाद

गाजियाबाद महानगर में स्थित दूधेश्वर नाथ महादेव मंदिर एक बड़ा ही अद्भुत और चमत्कारिक मंदिर है। यहां से कई प्रकार के दैविय चमत्कार, किंवदंतियां और किस्से- कहानियां जुड़े हुए हैं। जो यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को सुनने को मिलते हैं।

पुराणों में हरनंदी नदी (हिंडन नदी) के निकट हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग का वर्णन है। यहीं पर ब्रह्मा जी की हरनंदी नदी (हिंडन नदी) बहती है। प्राचीन ग्रंथों मे हिंड़न नदी को ब्रह्मा जी की पुत्री हरनंदी बताया गया है। जिनके दर्शन,स्नान-पूजन करने से अनेक जन्मों के पाप-ताप भस्मीभूत हो जाते हैं। हरनंदी नदी का नाम ही बाद में हिंडन नदी हो गया।

मान्यता यह भी है कि इसी हिंडन नदी से कुछ ही दूरी पर स्थित दूधेश्वरनाथ मठ, कैलाश धाम और काशी के बाद तीसरा ऐसा एकमात्र स्थान है जो महाप्रलय में भी समाप्त नहीं होता।

दूधेश्वर नाथ महादेव की स्थापना रामायण काल से भी पहले की गई थी, धार्मिक विश्वास के अनुसार ऐसी लोक मान्यता है। विश्वास किया जाता है कि पुलस्त्य ऋषि के पुत्र विश्वेश्रवा भगवान शंकर के उपासक थे और उन्होंने इस स्थान पर कठोर तप किया था। विश्वेश्रवा ने ही दूधेश्वर महादेव की स्थापना की थी। लंकाधिपति रावण इन्हीं विश्वेश्रवा का पुत्र था। ऋषि विश्वेश्रवा और लंकाधिपति रावण दोनों पिता-पुत्र ने इस स्थान पर पूजा- अर्चना की थी।

ऋषि विश्वेश्रवा निकटवर्ती स्थान बिसरख में ही रहते थे। उन्हीं के नाम पर इसका नाम था, अपभ्रंश होते हुए अब उस स्थान को बिसरख के नाम से जाना जाता है। यहीं पास में ही बिसरख नाम का गांव बसा हुआ है।

कालांतर में यह मंदिर भूमि के अंदर लुप्त हो गया था। यह प्राचीन मंदिर मिट्टी के ऊंचे-ऊंचे टीलों के नीचे दबा हुआ था।

दूधेश्वर महादेव के प्राकट्य का श्रेय बाबा गरीब गिरी का है। लगभग 5-6 शताब्दी पूर्व चरवाहे इन टीलों पर पास के ही कैला गांव की गायों को चराने के लिए लाते थे। ऐसी मान्यता है की टीले के ऊपर पहुंचने पर गायों के थनों से स्वत: ही दूध गिरने लगता था। यह दृश्य देखकर चरवाहे अचंभित रह गए। चरवाहों के द्वारा ग्रामीणों को इस घटना के बताने के बाद उस टीले की खुदाई की गई तो नीचे दिव्य शिवलिंग के दर्शन हुए। गायों के दूध से अभिषिक्त होने से शिवलिंग को दुग्धेश्वर या दूधेश्वर महादेव कहा जाने लगा। हरनंदी नदी के निकट स्थित हिरण्यगर्भ शिवलिंग ही दूधेश्वरनाथ मंदिर में जमीन के साढ़े तीन फीट नीचे स्थापित स्वयंभू दिव्य शिवलिंग है।

इस स्थान पर और अधिक खुदाई की गई तो यहां पर एक दिव्य कुआं निकला इस कुएं के अंदर ही अंदर एक सुरंग थी जिसके अंदर जाने का रास्ता भी था।

इस कुएं को एक अत्यंत दिव्य कुआं माना जाता है। इस कुएं के बारे में ही किवदंती है कि इसका जल खारा है परंतु कभी-कभी स्वयं ही इसका जल कच्चे दूध की लस्सी के समान श्वेत हो जाता है। जिससे इस कुएं का खारा जल भी मीठा लगने लगता है।

दूधेश्वर नाथ महादेव मंदिर के मुख्य द्वार की विशेषता है कि लगभग आठ ऊंचा दरवाजा एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया है और दरवाजे के मध्य में विराजमान गणेश जी को भी इसी पत्थर में तराश कर बनाया गया है।

मुगल काल में छत्रपति शिवाजी जी महाराज अपने लाव लश्कर सहित दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर पधारे थे। शिवाजी जी महाराज ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। इस अप्रतिम मराठा शासक द्वारा जमीन खुदवा कर गहराई में निर्मित कराया विशाल हवन कुंड यहां आज भी विद्यमान है।

दूधेश्वर महादेव की महिमा से प्रभावित होकर छत्रपति शिवाजी जी महाराज ने महाराष्ट्र के एक गांव नाम भी दूधेश्वर रखा था जो आज भी मौजूद है।

इस स्थान एवं मठ के प्राकट्य होने के बाद श्री बेनी गिरी जी इस मठ के प्रथम महंत बने थे। यहां पर त्रिकालदर्शी सिद्धसंत बाबा श्री इलायची गिरी जी महाराज, पूज्य बाबा श्री गरीब गिरी जी महाराज, सिद्धसंत श्री बसंत गिरी जी महाराज, सिद्धसंत बाबा श्री निहाल गिरी जी महाराज आदि एक से एक सिद्ध संत हुए हैं।

वर्तमान दूधेश्वर नाथ मंदिर कितना प्राचीन और ऐतिहासिक है यह इसी बात से जाना जा सकता है कि पिछले लगभग ५५० वर्षों से भी अधिक कि ज्ञात श्रीमहंत परंपरा है और इसको मंदिर की दीवारों पर अंकित किया गया है। संवत १५११ से २०४३ तक १५ महंत रहे हैं। इन सभी की समाधियां मंदिर प्रांगण में विद्यमान हैं। इन सिद्ध संतों में से कुछ ने तो यहां जीवित समाधि ली थी। इन समाधियों के दर्शन-पूजन से बड़ा लाभ होता है।

दूधेश्वर नाथ महादेव शिवलिंग के अभिषेक के साथ-साथ श्रद्धालु भक्त इन समाधियों पर भी दूध-जल चढ़ाते हैं। इन सिद्ध संतों की समाधियों में सिद्धसंत गरीब गिरी जी की समाधि का पूजन करने से पशुओं के रोग मुक्त हो जाने, सिद्धसंत पलटू गिरी की समाधि की पूजा करने से धन-संपत्ति का लाभ होने और सिद्धसंत बुध गिरी जी की समाधि के पूजन से वचन-सिद्धि हो जाने की किंवदंतियां जुड़ी हैं।

भगवान दूधेश्वर नाथ महादेव के प्राकट्य के समय से ही यहां मंदिर में जागृत धूना है, जिसकी विभूति से अनेक कष्ट दूर होते हैं ऐसी श्रद्धालुओं की मान्यता है।

संवत 1454 में प्राकट्य होने के बाद इस मठ के प्रथम महंत श्री बेनी गिरी जी महाराज बने थे।

हर रोज दूधेश्वर नाथ महादेव मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए श्रद्धालु भक्तों की भीड़ रहती है। हर सोमवार को भी पूरे दिन यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लेकिन महाशिवरात्रि के अवसर पर तो कई लाख श्रद्धालु भक्त दूधेश्वर नाथ महादेव मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए आते हैं। इन श्रद्धालु भक्तों में लाखों कांवड़िए होते हैं जो गंगोत्री-गोमुख एवं हरिद्वार से अपनी कांवड़ में पवित्र गंगाजल भरकर पैदल यात्रा करके यहां तक आते हैं और दूधेश्वर नाथ महादेव का जलाभिषेक कर धन्य होते हैं।

समय-समय पर इस सिद्धपीठ स्थान पर बड़े-बड़े उच्च कोटि के संत महात्मा पधारते रहते हैं। पूरी के पूर्व शंकराचार्य एवं वैदिक गणित के उद्भट विद्वान स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ, ज्योतिषपीठ के पूर्व शंकराचार्य कृष्णबोधाश्रम जी महाराज और धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज इस मंदिर में दर्शन करके इसकी महिमा का गुणगान कर चुके हैं।

चारों पीठों के शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, सिद्धसंत, योगी- तपस्वी, समाजसेवी, राजनेता, पत्रकार आदि भगवान दूधेश्वर नाथ महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करते रहे हैं।

शंकराचार्यों में स्वामी जयेंद्र सरस्वती जी, स्वामी स्वरूपानंद जी, स्वामी माधवाश्रम जी, स्वामी निश्चलानंद जी समय-समय पर यहां आकर बाबा श्री दूधेश्वर नाथ महादेव की स्तुति कर चुके हैं।


श्रीदूधेश्वरनाथ महादेव मठ मंदिर की गद्दी का मुख्य आकर्षण यहां की गुरु परंपरा का साक्षी सिद्ध धूना है। यह धूना गुरु स्थान का अत्यंत पवित्र सिद्ध एवं मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। यहीं जूना अखाड़े की गुरु परंपरा के आदि गुरु भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा स्थापित है।

दूधेश्वरनाथ महादेव मठ मंदिर परिसर में स्थापित ठाकुरद्वारा प्राचीन दिव्य प्रतिमाओं से आलोकित है।
मंदिर के ठाकुरद्वारा परिसर के विशाल हॉल में भगवान श्री राधाकृष्ण, श्री सीता राम लक्ष्मण, हनुमान जी, मां दुर्गा भवानी, भगवान सत्यनारायण, मां गायत्री, मां काली, श्री शिव पार्वती, मां सरस्वती, माता संतोषी, मां बगलामुखी, मां अन्नपूर्णा, श्री लक्ष्मी गणेश जी, आदि शंकराचार्य, श्रीमहंत गौरी गिरी जी महाराज की भव्य प्रतिमाएं विराजमान हैं।


मंदिर परिसर में ही प्राचीन चमत्कारी कुआं भी है, जिसका जल समय समय पर अपना स्वाद बदलता है

श्री दूधेश्वर महादेव मंदिर परिसर में कई सुंदर झांकियों जैसे भव्य गंगा-अवतरण की झांकी, माता दुर्गा की विशाल प्रतिमा आदि दर्शनीय और आकर्षण का केंद्र हैं।

मंदिर परिसर में ही पीपल व विशाल वटवृक्ष के निकट स्थित नवग्रह मंदिर है यहां श्री गणपति महाराज नवग्रहों के साथ विराजमान हैं।इस धर्म स्थान की लोकप्रियता को और भी अधिक बढ़ाता है।

भगवान दूधेश्वरनाथ महादेव का प्रत्येक सोमवार के दिन श्रद्धालु भक्तों के द्वारा भव्य श्रृंगार किया जाता है और श्रंगार की विशेषता यह होती है कि हर सोमवार को भगवान का श्रंगार अलग तरह का होता है जिसमें फूलों के साथ-साथ फल-मेवाओं और विभिन्न पकवानों तथा अन्य सामग्री से नया श्रंगार किया जाता है।

श्रद्धालुओं की मान्यता है की लगातार चालीस दिन तक विधि-विधान से भगवान दूधेश्वरनाथ महादेव का अभिषेक करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

दूधेश्वर नाथ महादेव मठ मंदिर अपनी ऐतिहासिकता के साथ साथ सामाजिक गतिविधियों एवं सेवा प्रकल्पों के लिए भी जाना जाता है।

यहां हर वर्ष अखिल भारतीय ज्योतिष एवं आयुर्वेद सम्मेलन संत सनातन कुंभ का आयोजन तथा अन्य धार्मिक,सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियां होती रहती हैं।

मठ के द्वारा यहां गौशाला, प्रातः काल योग की कक्षाएं, औषधालय एवं स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक पाठशाला आदि का संचालन किया जाता है।

मंदिर परिसर में स्थित गौशाला में कैला गांव की उन लंबो नस्ल की गायों को ही रखा गया था, जिस नस्ल की गायें अपने दूध से टीले के अंदर स्थित शिवलिंग का अभिषेक करती थी। उन लंबो नस्ल की गायों का गोवंश आज भी मंदिर की गौशाला में है सैकड़ों वर्षों से मंदिर के पुजारी इन्हीं गायों के दूध से भगवान दूधेश्वर महादेव का दुग्धाभिषेक करते आ रहे हैं और अभी भी इसी तरह से दुग्धाभिषेक होता है। मंदिर परिसर में इस गौशाला की स्थापना संवत १५११ से १५६८ के बीच महंत बेनी गिरी महाराज के समय में की गई थी।

होली के अवसर पर दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर से भगवान शिव की पंखा यात्रा निकाली जाती है जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

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