______________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र में
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यहां राष्ट्रीय जलजीव डॉल्फिन भी गंगा में अठखेलिया करती है

गांगेय डॉल्फिन हमारे देश की राष्ट्रीय जल जीव है

केंद्र सरकार ने 5 अक्टूबर सन 2009 को गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की बैठक में गंगा की डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलचर जीव घोषित किया था।

दुनिया की इस सबसे अजूबी जीव डॉल्फिन की कलाबाजिया सबको आकर्षित करती हैं।

इस क्षेत्र में डॉल्फिन के संरक्षण के लिए गंगा नदी में रामसर साइट क्षेत्र को सरकार ने डॉल्फिन संरक्षण का केंद्र घोषित कर रखा है।
गंगा की गोद में सबसे अधिक संख्या में डॉल्फिन को अठखेलियां करते हुए देखा जा सकता है।

इसक्षेत्र में गंगा के स्वच्छ जल में डॉल्फिन अठखेलियां करती है। यहां मुजफ्फरनगर बिजनौर जनपद के बीच से बहने वाली गंगा नदी पर बने बैराज से नरोरा बैराज तक गंगा नदी में डॉल्फिन पाई जाती है।

बिजनौर मुजफ्फरनगर मेरठ अमरोहा हापुड़ बुलंदशहर में बह रही गंगा नदी में यह डॉल्फिने है।

गांगेय डॉल्फिन इन दोनों बैराजों के 165 किलोमीटर तक के जल क्षेत्र की स्ट्रेच में ही विचरण करती है । यह अकेला ऐसा सबसे बड़ा क्षेत्र है, जहां डॉल्फिन की विश्व भर की एक सबसे बड़ी संख्या आबाद है।
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इसके अतिरिक्त गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन प्रयागराज से शुरू होकर पटना तक की गंगा में ही पाई जाती है।
जलीय जीवो के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है दोनों बैराजों तक के गंगा क्षेत्र को।
सरकार ने भी इन दोनों बैराजों के बीच बहने वाली गंगा नदी के इस इलाके को रामसर संरक्षक साइट घोषित करते हुए डॉल्फिन सहित अन्य जीव जंतुओं के लिए संरक्षित किया हुआ है।

इस क्षेत्र में रामसर जलीय जीव संरक्षण साइट होना गर्व की बात है। रामसर साइट एक इंटरनेशनल कन्वेंशन है।

इस क्षेत्र में भी सर्वाधिक डॉल्फिन गढ़मुक्तेश्वर से नरोरा अपस्ट्रीम के बीच के 86 किलोमीटर क्षेत्र में पाई जाती हैं, जिसमें यह प्रजनन भी करती है। डॉल्फिन के लिए यह इलाका बेहद अनुकूल है। डॉल्फिन के संरक्षण के लिए सबसे अधिक प्रयास भी इसी क्षेत्र में किए जा रहे हैं।

दुर्लभ जलीय जीव डॉल्फिन की प्रसिद्धि का आलम यह है कि विदेश से भी इनका हाल लेने के लिए विदेशी टीम यहां गंगा किनारे आती हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले पर्यावरण सहयोगी संगठन भी डॉल्फिनो के संरक्षण के प्रति चिंतित हैं।

गंगा में यूं तो न जाने कितने ही जलीय जीव मौजूद है, लेकिन इनमें डॉल्फिन एक ऐसा जलीय जीव है जिसे बचाने के लिए सबसे अधिक कोशिश की जा रही है।

डॉल्फिन एक बड़ी ही बुद्धिमान प्राणी होती है।
गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन देखने में असमर्थ होती है। ध्वनि तरंगों से यह देखने का काम लेती है।
गंगा की डॉल्फिन एक जुझारू जलीय जीव होती है। प्रतिकूल माहौल में भी यह अपने को ढाल कर जीने का माद्दा रखती है। तापमान में होने वाले बड़े उतार-चढ़ाव के साथ यह आसानी से सामान्य से भी बैठा लेती है।

स्थानीय लोग गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन को सूंस के
नाम से जानते हैं। सूंस यानी सूंघ कर(ध्वनि तरंगों से) अपनी दिशा और भोजन का पता लगा लेने वाली।

गंगा नदी में प्रदूषण बढ़ने से मछलियों की संख्या कम हो रही है। डॉल्फिन का भोजन मछलियां ही है। प्रदूषण की मार से बेहाल मछलियों को खाने का असर डॉल्फिन पर भी पड़ता है।

जिस तरह किसी वन के अच्छे जीवन के लिए वहां पर बाघ का होना महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार से राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन की उपस्थिति उस नदी के स्वच्छ होने और उस नदी में जलीय जीवों की उपस्थिति का संकेत माना जाता है।

गंगा के जलस्तर में कमी होने के कारण शिकारियों के द्वारा मछलियों का शिकार किया जाता है इससे उनके जाल में डॉल्फिन भी फंस जाती है। जिससे डॉल्फिन के जीवन को खतरा पैदा हो रहा है।
गंगा के किनारे रहने वाले मछुआरे और अन्य लोग औषधि और तेल के लिए भी डॉल्फिन का शिकार करते हैं।

विलुप्तप्राय गंगा की डॉल्फिन के संरक्षण के लिए सरकार के साथ-साथ डब्ल्यूडब्ल्यूएफ व कई गैर सरकारी संगठन भी कार्य कर रहे हैं।
इस क्षेत्र गंगा में सरकार डॉल्फिनों की संख्या का पता लगाने के लिए विस्तृत रूप से उनकी गिनती भी करवाती है।

इन सब के प्रयास से इस क्षेत्र में डॉल्फिनों की संख्या बढ़ रही है। यह एक अच्छा संकेत है। डॉल्फिन साफ पानी में रहने वाला जलीय जीव है। इससे यह संकेत भी मिलते हैं
कि गंगा का पानी भी इस स्थान पर इतना प्रदूषित नहीं है।
जब तक गंगा में डॉल्फिन की संख्या नहीं बढ़ेगी तब तक गंगा को प्रदूषण मुक्त भी नहीं माना जाएगा।

जलीय जीव जल को प्रदूषित नहीं करते, बल्कि डॉल्फिन जैसे राष्ट्रीय जीव वहीं रहते हैं, जहां शुद्ध जल होता है।

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