बिजनौर जनपद में धामपुर एक छोटा कस्बा है। लेकिन यह सुंदर शहर दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। धामपुर नगर को अपनी प्रसिद्धि पर इतराने के अनेक कारण है। जिनसे यह नगर देश-दुनिया में इतना मशहूर है।

धामपुर उत्तराखंड से भी जुड़ा हुआ है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी। इसके उत्तरी क्षितिज से गढ़वाल की पर्वतमाला की पहाड़ियां इस नगर से ऐसे लगती हैं कि जैसे अभी आगे हाथ बढ़ा कर छू लो। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के समतल मैदान के गन्ने के खेत और यहां के गन्ने के खेत एक साथ झूमते – लहराते से दिखाई देते हैं।

धामपुर के इतिहास की बात की जाए तो कत्यूरी राजाओं ने जब उत्तराखंड की पहाड़ियों से आगे अपने राज्य का विस्तार किया तो उन्हीं में से एक राजा धामवीर जिन्हें धामाशाह के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने इस स्थान में विशेष रुचि ली और उन्हीं के नाम पर धामपुर नगर विकसित हुआ।

धामपुर वैसे तो एक छोटा नगर है लेकिन यहां  सुंदर इमारतें, बाग, पार्क और चारों ओर प्रेरक महापुरुषों की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। यह नगर रेलवे लाइन के इधर- उधर दोनों और बसा हुआ है। इसलिए ट्रेन मैं बैठा हुआ यात्री भी इन पर दृष्टि डाल देख सकता है।

 

पापन पंथ को प्रतिष्ठित करने वाले बाबा पापन दास धामपुर नगरी में रहे। उनकी समाधि भी धामपुर नगर में है। परमहंस बाबा पापन दास के नाम से धामपुर भारत ही नहीं भारत के बाहर भी जाना जाता है पापन पंथी बाबा पापन दास की समाधि पर शीश नवाने धामपुर आते हैं। उस समय के नवाब नजीबुद्दौला द्वारा समर्पित उपवन में बाबा पापन दास की समाधि बनी हुई है।यहां प्रतिवर्ष पापन स्मृति भंडारा होता है और मेला लगता है।

 

धामपुर एक बहुत छोटा शहर होते हुए भी साहित्यिक रूप से बहुत समृद्ध है। यहां के कवियों और गीतकारों ने देश के बड़े-बड़े मंचों के माध्यम से धामपुर की सरस साहित्यिकता का परिचय दिया है। धामपुर में कई सांस्कृतिक संस्थाएं हैं ।और बहुत से नाटक क्लब । धामपुर की सांस्कृतिक गतिविधियों में सभी लोग धर्म और जाति के भेद भाव से ऊपर उठकर सहर्ष भाग लेते हैं।

धामपुर की होली का उत्सव भी बहुत प्रसिद्ध है। बरसाना और वाराणसी की तरह धामपुर की होली भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।

धामपुर के कारीगरों( हलवाई) की ख्याति विदेशों तक में है। यहां के कारीगर कई अप्रवासी भारतीयों की शादी में अमेरिका, कनाडा, दुबई आदि देशों में जाकर भारतीय व्यंजनों की तारीफों के पुल बंधवा चुके हैं।

देश में धामपुर के कारीगरों का डंका बजता है। अनेकों प्रतिष्ठित शादी- विवाह समारोह में यहां के कारीगर हलवाइयों को बुलवाया जाता है।

धामपुर की दाल कचरी के स्वाद का अपना ही रुतबा है। इस नगर से शुरू हुआ दाल कचरी के जायके का सफर ऐसा प्रसिद्ध हुआ कि देश ही नहीं विदेशों में भी इसकी धूम मच गई। धामपुर के गली, नुक्कड़ ,चौराहे पर सजने वाले दाल कचरी के ठेेेेलों पर जुटने वाली इस स्वाद के प्रशंसकों की भीड़ इस नगर की फिजा में अलग ही रस घोलती है।

 

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स्योहारा

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दुर्लभ पेड़ पौधों की बगिया  –  वसंत वाटिका

 

धामपुर से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित स्योहारा में कुंवर राधव प्रताप सिंह की वसंत वाटिका में दुर्लभ फलों और वनस्पतियों के चकित कर देने वाले पेड़ पौधे हैं।

इस वाटिका में सफेद जामुन ,काले अमरूद, सफेद सेव, लाल सेव जैसे दुर्लभ पेड़ है।

कुंवर राणा प्रताप सिंह के दादा जी को पेड़- पौधों से बहुत लगाव था उन्हीं से इनके पिता कुंवर राधो प्रताप सिंह को प्रेरणा मिली । उनको दुर्लभ पेड़- पौधों के साथ लगाव होना इनको भी अच्छा लगता था। अब कहीं कोई दुर्लभ पौधा दिख जाए तो उसे यहां लगाने की कोशिश की जाती है। हालांकि बहुत से पेड़ पौधों के लिए यहां का वातावरण और मौसम अनुकूल नहीं होता इसलिए इन पेड़ पौधों की और बराबर ध्यान रखना पड़ता है।

अक्टूबर और नवंबर के महीने में यहां का नजारा मन को मोह लेने वाला होता है। उस समय इस बसंत वाटिका में तरह-तरह के फूल खिलते हैं।

वसंत वाटिका में चंदन, रुद्राक्ष, छोटी लोंग, पिस्ता, बादाम, और लोकाट आदि के दुर्लभ पेड़ भी हैं। बताते हैं कि पिस्ता, लोकाट, बादाम आदि के पौधों को यहां कश्मीर से लाकर लगाया गया था। तो काले अमरूद का पौधा कोलकाता से आया था। ऐसे ही सफेद जामुन और लोंग के पौधों को आंध्र प्रदेश से मंगा कर लगाया गया था।

आम लोगों को वसंत वाटिका देखने की मनाही नहीं है लेकिन बाहर से बहुत कम लोग ही आकर इसे देख पाते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

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