_________बाद_________________________________________जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के लगभग १०० कि.मी. के दायरे के निकट गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र में स्थित एक और महत्वपूर्ण पौराणिक स्थल के बारे में – – – _____________________________________________ऋषिकेश से बद्रीनाथ की ओर ७० कि.मी. जाने पर गढ़वाल के श्रीनगर से पहले एक पौराणिक तीर्थस्थल तथा खूबसूरत पर्यटनस्थल है – देवप्रयाग।

देवप्रयाग पांच प्रयागों में से एक है। यहां पर संगम का बहुत ही सुंदर एवं लुभावना दृश्य है। दूर-दूर तक दो देव सरिताओं अलकनंदा एवं भागीरथी का जल अलग से दिखाई देता है। कुछ सीढ़ियां उतरने के बाद एक चबूतरे पर पहुंचकर वह लुभावना और पावन दृश्य नजर आता है जहां एक दिशा से शांतभाव से बहकर आती अलकापुरी ग्लेशियर से निकली अलकनंदा , दूसरी ओर से गोमुख ग्लेशियर से उद्दाम वेग से आती भागीरथी की लहरों में गलबहियां डाल गंगा का रूप ले सामने की ओर जाती दिखाई देती है। यहां गढ़वाल में इन दोनों नदियों को ‘ सास-बहू ‘ के नाम से पुकारा जाता है।

संगम स्थल से कुछ दूरी तक तो दोनों धाराएं अपना अस्तित्व अलग-अलग बनाएं रखती दृष्टिगोचर होती हैं लेकिन आगे आपस में गुंथ एक होकर बलखाती हुई आगे की ओर बढ़ जाती है। यहां पर ही ये दोनों दिव्य देवसरिताएं अपना अस्तित्व समाप्त कर गंगा नाम से पुकारी जाती हैं।

भारत के उत्तराखंड राज्य में टिहरी गढ़वाल जनपद का खूबसूरत कस्बा देवप्रयाग सनातन हिंदू धर्म का एक पवित्र स्थान है। प्रयागराज के त्रिवेणी संगम के बाद देवप्रयाग के इसी संगम का स्थान आता है। यहां दो धाराएं एक हो गंगा बन जाती है। पवित्रता की दृष्टि से देवप्रयाग के इस संगम स्थल का सर्वोच्च स्थान है, जिसका वर्णन स्कंद पुराण के केदार खंड अध्याय में मिलता है।

श्रद्धालुओं का मानना है कि अपने नाम के अनुसार देवप्रयाग में देवी देवताओं का वास है। राजा भगीरथ ने गंगा को जब पृथ्वी पर उतरने के लिए मनाया था तब स्वर्ग से करोड़ों देवी- देवता गंगा के साथ ही देवप्रयाग में उतरे थे। पुराणों के अनुसार इस संगम पर प्रातः काल 33 करोड़ देवी देवता स्नान करते हैं।

पौराणिक कथाओं में हिमालय के संपूर्ण पर्वतीय क्षेत्र को भगवान शंकर की जटा माना जाता है। राजा भागीरथ की तपस्या के बाद इस पृथ्वी पर गंगा का अवतरण भगवान शंकर की जटाओं से हुआ था। भगवान शंकर ने अपनी जटाओं से गंगा की मुख्यधारा को प्रवाहित किया था, गंगा की मुख्यधारा के साथ-साथ अन्य कई छोटी- बड़ी अनेक धाराएं भी प्रवाहित हुई। सभी जल धाराओं को यहां गंगा व प्रमुख देवी-देवताओं के नाम से जाना जाता है। ये सभी छोटी-बड़ी जलधाराएं हिमालय पर्वत की पहाड़ियों में बहती हुई अपने साथ विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों का रस व तरह-तरह के खाद्य रसायनों को प्रवाहित करके लाती हैं। यही कारण है कि गंगा नदी के जल को वर्षों तक किसी बर्तन में रखो तब भी वह दूषित नहीं होता।

पुराणों के अनुसार देव भूमि देवप्रयाग की स्थापना देव शर्मा नामक एक मुनि ने की थी। देव शर्मा ने इस स्थान पर घोर तप किया। प्रभु श्रीराम ने उन्हें साक्षात दर्शन देकर कहा – हे ऋषिवर ! आपको क्या चाहिए, मुनि ने कहा हे महाभागे! मुझे आपके दर्शन हुए वही काफी हैं। मुनि के अनुरोध पर भगवान ने कहा कि यह स्थान तुम्हारे नाम से प्रसिद्ध होगा। देव ऋषि के द्वारा यहां भगवान श्री राम की मूर्ति स्थापना के बाद यह स्थान देवभूमि देवप्रयाग के नाम से विख्यात हुआ।

देवप्रयाग में संगम स्थल पर कठोर चट्टानें हैं। श्रद्धालुओं का ऐसा विश्वास है कि प्राचीन काल में इन चट्टानों के बीच में कई गुफाएं थी और इन गुफाओं में वास करके अनेक ऋषि-मुनियों और देवी-देवताओं ने तपस्या की। उन गुफाओं में से कुछ गुफाएं अभी भी विद्यमान हैं।

भगवान श्रीराम ने भी यहां आ कर तपस्या की थी। एक मान्यता के अनुसार रावण वध से श्रीराम को ब्रह्म हत्या लगी थी। भगवान श्रीराम ने प्रायश्चित और आत्मशुद्धि के लिए देवप्रयाग में आकर तपस्या की थी।

देवप्रयाग में स्थित भगवान श्री रघुनाथ का प्राचीन भव्य मंदिर धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से भी दर्शनीय है। भगवान शिव के मंदिर की भी यहां बहुत मान्यता है।

देवप्रयाग में मंदिरों की एक लंबी श्रंखला है। इस नगर के प्राचीन मंदिर रहस्य से भरे हुए हैं। यहां की प्राचीनता में ही रहस्य छुपा हुआ है। पुराणों में तीर्थ नगरी देवप्रयाग की सुदर्शन क्षेत्र के रूप में मान्यता है। कहा जाता है कि जल प्रलय की स्थिति में मनु सुदर्शन चक्र पर अप्रभावित रहे। ऊपर आकाश से देखने पर देवप्रयाग सुदर्शन चक्र सा दिखाई देता है। एक आश्चर्यजनक बात यह है कि देवप्रयाग में एक भी कौवा दिखाई नहीं देता।

इस नगर का महत्व अति प्राचीन भगवान श्री राम के मंदिर से बहुत अधिक है। संगम से सीढ़ियां चढ़ते हुए रघुनाथ जी का सुप्रसिद्ध मंदिर आता है।क‌ई मान्यताओं से जुड़े रघुनाथ जी के सुप्रसिद्ध मंदिर की प्रतिष्ठापना जगतगुरू आदि शंकराचार्य ने की थी। द्रविड़ शैली में बने मंदिर में भगवान श्री राम की विशाल प्रतिमा विराजमान है। भगवान श्री रघुनाथ जी की मूर्ति मध्य में उठी हुई वेदिका पर बिना किसी सहारे टिकी हुई है।

इस मंदिर के आसपास और भी कई छोटे बड़े मंदिर हैं जिनमें से नरसिंह जी, विश्वेश्वर महादेव, बावनबलि, क्षेत्रपाल, गरुड़जी, अन्नपूर्णा, भुवनेश्वरी, रामचंद्र जी की गद्दी आदि हैं। मंदिर के पीछे शीला पर लिखे प्राचीन हस्तलेख आज भी दिखाई देते हैं। ये लेख साफ पढ़े जा सकते हैं।

लगभग ७०-७५ फुट ऊंचे विशाल कटवा पत्थरों से बना हुआ रघुनाथ मंदिर का निर्माण कब हुआ यह कहना तो बहुत कठिन है लेकिन इतिहासकार और वास्तुविद इसे दो हजार वर्ष पुराना मानते हैं।

मंदिरों के अलावा यहां पर बारहशिला, पंचशिला, बेतालशिला, धनेश्वर, टोडेश्वर, जोगेश्वर, बागेश्वर व माता मंदिर तथा भरत जी है। यहां रामकुंड के निकट भगवान श्रीराम की खड़ाऊं के निशान आज की मौजूद हैं।

प्रसिद्ध घुमक्कड़ साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन भी सन १९४७ में यहां आए थे। उन्होंने रघुनाथ मंदिर की शिलाओं पर लिखे लेखों को पढ़ने के बाद इसे चार हजार वर्ष पुराना माना था।

देवप्रयाग में संगम पर स्नान का विशेष फल बताया गया है। अलकनंदा और भागीरथी के पावन संगम तट पर पर्व पर ही नहीं बल्कि किसी भी समय स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। बद्रीनाथ जाने वाला प्रत्येक तीर्थयात्री इस संगम में स्नान किए बिना अपनी यात्रा को पूर्ण नहीं मानता। अलकनंदा व भागीरथी इन दोनों नदियों के जल का रंग अलग-अलग है। सितंबर से अप्रैल तक के समय में यह संगम बहुत मनोहारी लगता है।

देवप्रयाग में बद्रीनाथ धाम के तीर्थ पुरोहितों का वास है। यहां के पंडे ‘ध्यानी ‘ जाति के हैं और ये ‘ सत भैय्या ‘ और ‘ पंच भैय्या ‘ के नाम से प्रसिद्ध हैं।इन पंडों का घर संगम के ठीक ऊपर ढलवां पहाड़ी पर है। इन पंडों के घर की खास बात यह है कि ये एक ही आकृ‌ति लिए हुए होते हैं और सभी घरों का मुख्य द्वार संगम की ओर खुलता है।

समुद्र से लगभग १५०० की ऊंचाई पर पहाड़ी पर बसे देवप्रयाग में सीढ़ीनुमा बाजार व बस्ती रात्रि के समय बड़े नयनाभिराम लगते हैं। दिन के समय अगर मौसम साफ हो तो यहां से दूरबीन के द्वारा देखने पर रुड़की की गंग नहर का दृश्य बहुत लुभावना लगता है।

जब पहाड़ों में सड़कों का अभाव होने से बस-मोटर गाड़ी यातायात की सुविधा नहीं थी। तब चार धाम की यात्रा पैदल चलती थी। उस समय देवप्रयाग में यात्रियों की बहुत चहल-पहल रहा करती थी।

देवप्रयाग के आसपास देखने के लिए और भी कई स्थान हैं –

देवप्रयाग से ऊपर दशरथ पर्वत है। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार कहा जाता है कि राजा दशरथ ने इस स्थान पर तपस्या की थी। वह शिला आज भी विद्यमान है जिसे देखा जा सकता है।

दशरथ पर्वत पर विख्यात ज्योतिषी पंडित चक्रधर जोशी का कार्यालय है। यह केन्द्र विशेष रुप से दर्शनीय है। दशरथ पर्वत से नंदा देवी आदि अनेक पर्वतमालाओं का अनुपम सौंदर्य देखते ही बनता है। चारों ओर छितरे गढ़वाल के सीढ़ीनुमा गांव बहुत सुंदर लगते हैं।

देवप्रयाग के लोकप्रिय आकर्षणों में एक है सस्पेंशन ब्रिज यानी झूलता पुल। यह पुल भागीरथी और अलकनंदा नदियों पर स्थित है। पर्यटकों को इस पुल के द्वारा पूरे शहर का एक बहुत ही लुभावना दृश्य देखने को मिलता है।

चंद्रबदनी मंदिर – यह देवी सती का सिद्ध पीठ मंदिर है। मान्यता है कि देवी सती का धड़ इसी स्थान पर गिरा था। यहां मंदिर के गर्भगृह में मूर्ति के बजाय एक सपाट पत्थर है और उसी की पूजा की जाती है।

देवप्रयाग से नीचे की ओर सड़क मार्ग के साथ-साथ गंगा बहती हुई चलती है। गंगा ‘ भोरा ‘ नामक स्थान के निकट से होती हुई व्यास घाट पहुंचती है। दोनों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ और एक गहरी घाटी में बसे इस स्थान पर छोटा सा संगम है। यहां गंगा जी में न्यार नाम की नदी आकर मिलती है।

न्यार नदी का पुराणों में ‘नवालिका’ नाम है। यहां’ इंद्र प्रयाग ‘ तीर्थ है। धर्मग्रंथों में कथा है कि दैत्यराज वृत्रासुर ने स्वर्ग के राजा इन्द्र को युद्ध में हरा दिया। दैत्यों से हारकर भागे इन्द्र ने इसी स्थान पर आकर भगवान शंकर की आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया और उनसे विजय प्राप्ति का वरदान प्राप्त किया। इन्द्र ने वृत्रासुर को हराकर फिर से स्वर्ग का राज्य प्राप्त किया। तभी से इस स्थान को इंद्र प्रयाग के नाम से जाना जाता है।

व्यास घाट में व्यास जी का मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि व्यास मुनि ने इस स्थान पर तपस्या की थी। बैसाखी पर्व के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता है। व्यास घाट के पास प्रसिद्ध लक्ष्मण झूला है, यहां पर लक्ष्मण जी ने तपस्या की थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *