____________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के१०० किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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सहारनपुर जनपद के देवबंद कस्बे का प्राचीन नाम देवीवन था। उस समय यहां घना वन हुआ करता था जिसमें अनेकों देवी-देवताओं का वास था। कालांतर में इसका नाम देवी वन से देवबंद हो गया।

वर्तमान में इस्लामी शिक्षा के लिए यह नगर दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहां दारुल उलूम जैसी प्रसिद्ध इस्लामिक संस्था होने के कारण इस नगर की अपनी खास छवि व पहचान है। देवबंद का नाम आते ही दारुल उलूम व फतवों के शहर की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। यानी वह जगह जहां से एक बड़े मुस्लिम वर्ग की विचारधारा की धारा तय होती है।

गंगा- यमुना के उपजाऊ मैदान में स्थित देवबंद साहित्य, दर्शन, शिक्षा, धार्मिक शिक्षा और ऐतिहासिकता के दृष्टिकोण से भी एक प्रसिद्ध नगर है।

महाभारत काल में पांडवों ने वनवास के समय कुछ समय यहां व्यतीत किया था और धनुर्धारी अर्जुन ने यहां शक्ति की आराधना की थी।

देवबंद नगर के पूर्व में श्री त्रिपुर बाला सुंदरी देवी का प्राचीन मंदिर है। यहां माता बाला सुंदरी की स्वयंभू प्रतिमा विराजमान है। समय-समय पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा अंतिम समय में मंदिर का जीर्णोद्धार मराठा राजा रामचंद्र ने करवाया था। देवी मंदिर के निकट ही बूढ़े महादेव एवं ग्यारह मुखी महादेव मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, काली का मंदिर, दूधाधारी, लौंकड़िया आदि प्राचीन मंदिर तथा धानु भक्त की समाधि और सतियों के स्मारक स्थित है। देवी मंदिर के सामने ही विशाल देवी कुंड स्थित है

श्री राधा वल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक ब्रजभाषा के संत कवि महाप्रभु श्री हित हरिवंश जी महाराज का जन्म इसी नगर में हुआ था। महाप्रभु श्री हित हरिवंश जी महाराज ३२ वर्ष तक ठाकुर जी की सेवा करने के बाद विक्रमी संवत १५९० में वृंदावन चले गए। श्री राधा वल्लभ संप्रदाय को मानने वाले श्रद्धालु पूरे भारत में फैले हुए हैं। देवबंद में स्थित श्री राधावल्लभ जी का प्राचीन मंदिर श्रद्धालु भक्तों के लिए आस्था और श्रद्धा का केंद्र है।

विश्व प्रसिद्ध दारुल उलूम की स्थापना मौलाना मौ. कासिम ने 30 मई 1866 ई. को ऐतिहासिक छत्ता मस्जिद में अनार के पेड़ के नीचे की थी। शुरुआत में एक अध्यापक मौलवी महमूद ने एक छात्र को शिक्षा देनी प्रारंभ की थी। संयोग से उस छात्र का नाम भी महमूद ही था। जो आगे चलकर शेखुलहिन्द के नाम से जाने गए। आज यहां देश- विदेश के हजारों छात्र इस्लामिक शिक्षा पाते हैं। आज तक इस संस्था से शिक्षा पाए हजारों इस्लामिक शिक्षा के महान जानकार और दार्शनिक दुनिया भर में फैले हैं।

बादशाह अकबर के समय में उसके दरबारी अबुल फजल के द्वारा लिखी गई किताब आईने अकबरी में भी देवबंद का जिक्र है।

यहां अनेक पुरानी मस्जिदें हैं जो इस्लामिक कला का अनूठा नमूना है। जिनमें बादशाह अकबर के जमाने की मोहल्ला खानकाह की मस्जिद, ऐतिहासिक काजी मस्जिद, सराय पीरजादगान की मस्जिद, किले की मस्जिद आदि मस्जिदे प्रसिद्ध है।

देवबंद प्राचीन मजारों के लिए भी प्रसिद्ध है। जिनमें जंगलवारा के नाम से मशहूर इस्लामिक स्कॉलर का मजार, कालू कलंदर का मजार, शाह विलैत का मजार आदि प्रसिद्ध है।

देवबंद के बारे में एक दिलचस्प बात यहां के रहने वाले बताते हैं कि म अक्षर से शुरू होने वाले शब्द यहां
के बड़े प्रसिद्ध हैं जैसे मक्खी, मच्छर, मुल्ला, मौलवी, मस्जिदे, मदरसे, मजार आदि इन सबकी यहां बहुतायत है।

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