_________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र. भारत) के १०० किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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मुजफ्फरनगर जनपद में रामराज कस्बा क्षेत्र में स्थित देवल गांव एक पौराणिक स्थान है।

मह‌र्षि देवल की तपोभूमि देवल गांव गंगा बैराज के निकट दिल्ली-पौड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित है।

इस गांव में पौराणिक सतयुग कालीन ब्रह्मा जी के प्रपोत्र देवल ऋषि के द्वारा स्थापित विख्यात सिद्धपीठ शिव मंदिर है।

देवल ऋषि का सनातन हिंदू धर्म के धर्मग्रंथों पुराण आदि में वर्णन है। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र मनु हुए व मनु के पुत्र प्रजापति, प्रजापति के आठ पुत्र – आय, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष व प्रभास थे।

प्रजापति के आठ पुत्रों में से एक ऋषि प्रत्यूष के घर देवल ऋषि का जन्म हुआ था।

ब्रह्मा जी के प्रपोत्र देवल ऋषि ने देवल गांव के खादर के रेत के टील्लों के ऊपर भगवान शिव के शिवलिंग की स्थापना की और यहां घोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था।

मान्यता है कि सतयुग में जन्में देवल ऋषि आज कलयुग में मानव रूप में भी हैं। प्राचीन काल में देवल ऋषि के नाम से ही इस स्थान का नाम देवल पुरी था। आज के समय में यह देवल के नाम से जाना जाता है।

देवल ऋषि के संबंध में पुराणों में एक कथा आती है कि जब सतयुग काल में देवल ऋषि यहां गंगा जी के किनारे तपस्या कर रहे थे तो एक दिन ऋषि प्रातःकाल गंगा नदी नहाने के लिए पहुंचे। उस समय हू-हू नाम का गंधर्व अपनी पत्नी के साथ गंगा नदी में जल-क्रीड़ा कर रहा था। गंधर्व को पत्नी के साथ गंगा नदी में जल-क्रीड़ा करते देख ऋषि क्रोधित हो उठे, जिस पर हू-हू गंधर्व ने उनका उपहास किया। देवल ऋषि ने क्रोधित हो हू-हू गंधर्व को श्राप दिया की ‘जब तू पानी में रहकर
क्रीडा-मग्न है तो मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू पानी में मगर बनकर रहेगा’। जिस पर गंधर्व की पत्नी ने ऋषि से क्षमा याचन कर अपने पति के उद्धार करने की प्रार्थना की। गंधर्व की पत्नी पर दया करके ऋषि देवल ने कहा कि भगवान विष्णु के हाथों गंधर्व का उद्धार होगा।

गंधर्व ने ऋषि के श्राप मिलने से मगर (ग्राह) योनि में जन्म लिया। एक बार उस मगर ने अश्वत नामक एक हाथी का पैर पकड़ लिया। हाथी ने भगवान विष्णु की स्तुति की। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उस मगर की गर्दन काटकर हाथी को छुड़ाया और उस गंधर्व का उद्धार किया। पुराण में गज-ग्राह की यह कथा गजेंद्रमोक्ष नाम से प्रसिद्ध है।

देवल ऋषि के द्वारा स्थापित सतयुग कालीन इस मंदिर की बहुत मान्यता है। श्रद्धालुओं का ऐसा विश्वास है कि इस सतयुग कालीन शिव मंदिर में दर्शन करने मात्र से ही मनुष्य के सब कष्टों का निवारण हो जाता है।

महाशिवरात्रि के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त कांवड़िए पैदल गंगाजल लाकर मंदिर में स्थापित शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं।

देवल ऋषि मंदिर पर पुत्रदा एकादशी के अवसर पर प्रतिवर्ष विशाल कीर्तन का आयोजन किया जाता है।

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