______________________________________________________जानिए – – – – –

मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत) के १००कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र से जुड़ी ऐतिहासिक महापुरुष की स्मृतियां – – -_____________________________________________

देहरादून भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्रिय था। जब कभी पंडित नेहरू को कुछ समय विश्राम की आवश्यकता होती थी वह प्राय: देहरादून की सुंदर मनोरम घाटी में विश्राम करने के लिए आ जाते थे।

देहरादून से पंडित जवाहरलाल नेहरु की अनेक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।बचपन से ही नेहरू जी कई बार देहरादून आए थे। 25 मार्च 1921 को देहरादून में कांग्रेस का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ जिसमें नेहरू जी को सभापति चुना गया था और तब उन्होंने अपना पहला ऐतिहासिक भाषण दिया था। इस अवसर पर उन्होंने कहा था-“देश की स्वतंत्रता के लिए सैनिक की भांति सदैव तैयार रहना चाहिए, यही काम करने का समय है।”

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सिलसिले में पंडित जवाहरलाल नेहरू को तीन बार देहरादून जेल की दीवारों के भीतर कैद होना पड़ा था।

जवाहरलाल नेहरू को पहली बार 1932 में देहरादून जेल भेजा गया। तब वे एक साल तक देहरादून जेल में रहे, बाद में उन्हें यहां से नैनी जेल भेज दिया गया था।

पंडित जवाहरलाल नेहरू को दूसरी बार देहरादून जेल लाया गया था। नेहरू जी तब चार महीने तक देहरादून जेल में रहे थे, इसके बाद उन्हें लखनऊ जेल भेज दिया गया था।

नेहरू जी को तीसरी बार सन 1940-41 में 14 महीने के लिए यहां की जेल में कैद किया गया था। बाद में उन्हें चुपचाप देहरादून जेल से बरेली जेल भेज दिया गया।

देहरादून की ऐतिहासिक जेल से स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु की यादें जुड़ी हुई हैं। यहां की ऐतिहासिक जेल हमें आज भी इस बात की याद दिलाती है की आधुनिक भारत के निर्माता पंडित नेहरू ने अपने जीवन के संघर्षमय ढाई वर्ष किस तरह इस जेल की बंद कोठरी में व्यतीत किए थे।

देहरादून जेल की जिस कोठरी में नेहरू जी को कैद किया गया था उसमें मात्र एक खिड़की थी। उसी खिड़की के पास बैठ कर वे देर तक चिंतन-मनन किया करते थे तथा भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए किए जा रहे स्वतंत्रता संग्राम की योजना बनाते थे

जेल की कोठरी में बनी हुई उस खिड़की से ही पंडित नेहरू जेल में बंद अपने मित्रों, शुभचिंतकों और कार्यकर्ताओं से बातचीत करते थे। वे उनका ढाढस बढ़ाते थे और स्वयं भी उनसे ऊर्जा ग्रहण करते थे। लेकिन बाद में उनकी कोठरी की वह एकमात्र खिड़की भी बंद कर दी गई थी। लेकिन ऐसे संकट में भी दृढ़ इच्छाशक्ति वाले पंडित नेहरू घबराए नहीं और दुगने उत्साह से अपनी पुस्तक लिखने में जुटे रहे।

जेल में कोठरी की चारदीवारी में बंद एकाकी जीवन बिताते हुए भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी बल्कि जेल में बिताए समय का सदुपयोग करते हुए ‘ डिस्कवरी ऑफ इंडिया ‘ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक लिखने की शुरुआत की। जब नेहरू जी तीसरी बार देहरादून जेल में आए तो उन्होंने इसके कुछ हिस्से पूरे किए थे।

पंडित नेहरू ने देहरादून की जेल में बिताए अपने अनुभवों को एक पुस्तक में लिखते हुए बताया है – नैनी और बरेली जेल में मेरे साथ कई साथी थे, किंतु देहरादून जेल में दो ही लोग थे। गोविंद बल्लभ पंत और काशीपुर के कुअंर आनंद सिंह। लेकिन छह महीने के बाद सजा पूरी होने पर गोविंद बल्लभ पंत जेल से रिहा कर दिए गए।

नेहरू जी ने आगे लिखते हुए बताया है – जनवरी 1933 की शुरुआत में मेरे सभी साथी मुझे छोड़कर चले गए और मैं अकेला रह गया। करीब 8 महीने तक मुझे देहरादून जेल में एकाकी जीवन व्यतीत करना था। करीब साढे चौदह महीने तक मैं उस छोटी कोठरी में बंद रहा और मुझे लगने लगा कि मैं उसका एक हिस्सा बन गया हूं।

प्रकृति प्रेमी पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक में देहरादून जेल के आसपास की प्राकृतिक छटा व मनोहरी सुंदरता का विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा कि ‘ हिमालय की गगनचुंबी चोटियां मेरे लिए आकर्षण का केंद्र थी।’

27 मई 1964 मृत्यु से पहले भी पंडित जवाहरलाल नेहरू 23 मई 1964 को देहरादून आए थे। उन्होंने यहां 3 दिन विश्राम किया और 25 मई 1964 कब है अपना प्रिय स्थल सहस्त्रधारा देखने गए थे।

देहरादून जेल की जिस कोठरी में पंडित नेहरू ने यातना भुगती थी उस कोठरी में आज भी उस समय की लोहे की चारपाई लकड़ी की एक मेज और कुर्सी उसी तरह रखी है जैसे उस समय थी। लकड़ी की मेज पर एक बाइबल के प्रति और एक अंग्रेजी उपन्यास भी सुरक्षित रखा है जिसे पंडित जी ने उस समय पढ़ा था। जेल की वह कोठरी और उसमें रखी ये सब चीजें आज भी पंडित जी के यहां बिताए गए एकाकी जीवन की कहानी याद दिलाती हैं।

देहरादून के राजपुर मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 181- बी कई ऐतिहासिक घटनाओं छुपाए हुए हैं। इस बंगले में पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित एक लंबे समय तक रही थी। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक व सामाजिक जीवन के दौरान उन ऊंचाइयों को छुआ था जिनका इतिहास में समानांतर खोजना कठिन है। सार्वजनिक जीवन में एक ऊंचे मुकाम पर पहुंचने के बाद वह दून घाटी के सुरम्य स्थान राजापुर के निकट इस बंगले में आकर बस गई थी।

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