__________________________________________________जानिए – – – मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.- भारत) के १००कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र के एक और शौर्य-वीरता स्थल के बारे में – – – – _____________________________________________

देहरादून नगर से थोड़ी दूर सहस्रधारा रोड़ पर स्थित खलंगा किले में अपने ढंग का एक अनूठा स्मारक बना हुआ है। यह स्मारक वीरता, संघर्ष, शक्ति, देश प्रेम तथा उदारता का प्रेरणा स्रोत है। यह स्मारक ब्रितानी सेना की जीत और गोरखा सैनिकों की वीरता की कहानी कहता है। इस स्मारक को अंग्रेजों ने अपने वीर प्रतिद्वंदी दुर्गपाल बलभद्र व उनके वीर गोरखों के सम्मान में बनवाया था।

खलंगा का किला जिस पर लगभग दो सौ वर्ष पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज हजारों सैनिकों की कुर्बानी के बाद भी लंबे समय तक कब्जा नहीं कर पाई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना जो हजारों पैदल सैनिक, सैकड़ों घुड़सवार सैनिक तथा प्रचुर मात्रा में बंदूक गोला बारूद और तोप से लैस थी। ऐसी मजबूत सेना की क्या परेशानी रही कि मुट्ठी भर गोरखा सैनिकों को एक ही बार के आक्रमण में नहीं जीत पाई। कंपनी सेना को आशा थी कि गोरख्याणी (गोरखा शासन) से त्रस्त गढ़वाल की प्रजा व राजा के साथ देने से वह उन परआसानी से जीत दर्ज कर लेगी। लेकिन गोरखा सैनिकों के अंदर इतना साहस और आत्मबल कहां से आया कि उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को नाकों चने चबवा दिए।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की उत्तर पूर्व दिशा में लगभग 5 कि.मी. दूर ऊंचे साल के पेड़ और ऊंची-नीची पहाड़ियां दिखाई देगीं। इसी की तलहटी में एक स्थान है नालापानी। पहाड़ी की तलहटी में कभी एक जल स्रोत था जिसका नाम था नालापानी। आज के समय में वह जल स्रोत तो सूख गया है, जिसके नाम पर इस स्थान का नाम पड़ा था नालापानी। इतिहासकार बताते हैं कि यह पहाड़ी सत्रहवीं शताब्दी के आसपास के समय गोरखा शासनकाल में अत्यंत सामरिक महत्व रखती थी।

इतिहास की पुस्तकों में उल्लेखित तथ्यों के अनुसार 19वीं शताब्दी में गोरखा सेना ने गढ़वाल के शासक प्रद्युमन शाह को पराजित कर देहरादून पर अधिकार कर लिया था।

उस समय भारत पर इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था। कंपनी की व्यावसायिक कूटनीति, उसकी साम्राज्यवादी पिपासा व लोभी नेत्र हिमालय की अमूल्य संपदा पर केंद्रीत थे और वह ऐसे किसी अवसर की खोज में थे जिससे उन्हें अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त हो जाए। गोरखाओं से मुक्ति के लिए प्रद्युमण शाह के पुत्र महाराजा सुदर्शन शाह ने अंग्रेजों से हाथ मिलाया।

इतिहासकारों का कहना है कि 19 अक्टूबर 1814 ई. को मेजर जनरल गिलेप्सी को 3500 सैनिकों की सेना के साथ देहरादून पर अधिकार करने का कार्य सौंपा गया था। कंपनी की सेना देहरादून के पश्चिमी जिले सहारनपुर से आगे बढ़ी, रास्ते में नाममात्र का विरोध का सामना करते हुए कंपनी की सेना टिमली के जंगल व मोहंड़ से शिवालिक की पहाड़ियों को पार करके 24 अक्टूबर 1814 ई. को देहरादून पहुंची।

जिस समय कंपनी की सेना देहरादून पहुंची उस समय नालापानी पर स्थित खलंगा के निर्माणाधीन साधारण से किले में बलभद्र सिंह थापा के नेतृत्व में मात्र पांच सौ गोरखा सैनिक शत्रु का मुकाबला करने के लिए इकट्ठा थे।

उसी दिन कंपनी की सेना के कर्नल मावी ने अपने संदेशवाहक के द्वारा बलभद्र सिंह के पास इस आशय से भेजा कि गोरखा सैनिक कंपनी की सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दें, ऐसा करना गोरखा सैनिकों के हित में होगा।

संदेशवाहक के द्वारा दिए गए पत्र को पढ़कर बलभद्र सिंह उत्तेजित हो गए और उन्होंने संदेशवाहक के सामने ही उस पत्र को फाड़ कर फेंक दिया तथा उस पत्र के उत्तर में कहला भेजा कि ‘शीघ्र ही उनकी मुलाकात कर्नल से होगी।’

कर्नल मावी का स्वयं का श्वेत रंग का होना व सत्ता का घमंड बलभद्र सिंह के इस अपमानजनक व्यवहार से आहत हो उठा। कर्नल ने अगले ही दिन 25 अक्टूबर को अपने तोपखाने की सहायता से खलंगा के किले पर अधिकार करने का प्रयास किया लेकिन उसे अपनी सेना को देहरादून वापस बुलाना पड़ा, क्योंकि पहाड़ी पर तोपों के द्वारा गोला-बारूद फेंकने का कोई फायदा नहीं हुआ। पहाड़ी पर तोप से गोले चलाना सामरिक दृष्टि से निरर्थक था।

बाद में मेजर जनरल गिलेप्सी ने 31 अक्टूबर 1814 को सेना की कमान स्वयं अपने हाथ में ले ली और खलंगा के किले पर आक्रमण कर दिया। बलभद्र सिंह के कुशल और जोश से भर देने वाले नेतृत्व में पांच सौ गोरखा सैनिकों ने उस आक्रमण को विफल कर दिया।

इतिहासकारों का कहना है कि ब्रितानी सैनिकों ने तोप और गोला बारूद के साथ गोरखा सैनिकों पर हमला किया था। इस लड़ाई में कंपनी सेना के मेजर जनरल राबर्ट रोलो गिलेप्सी सहित अनेक अधिकारी और बहुत से सैनिक मारे गए और बड़ी संख्या में सैनिक घायल हुए।

इस लड़ाई के बाद कंपनी की सेना किले की घेराबंदी करके बैठ गई तथा गोरखा सेना का नेतृत्व कर रहे बलभद्र सिंह पर आत्मसमर्पण करने का दबाव डालने लगी। लेकिन गोरखा सैनिकों ने लगातार एक महीने तक अपनी वीरता और शौर्य का परिचय दिया और अंग्रेज सेना के सामने हथियार नहीं डाले।

इसी समय दिल्ली से कंपनी सेना को सहायता प्राप्त हो गई और 24 नवंबर के दिन एक बार फिर से अंग्रेज सेना ने खलंगा पर आक्रमण कर दिया। कहा जाता है कि इस युद्ध में महिलाओं और बच्चों सहित लगभग 600 नेपाली सैनिकों ने नालापानी पहाड़ पर ब्रितानी खोज के हमले को खुखरी, तीर- कमान और पत्थरों से तीन बार नाकाम कर दिया था।

गोरखा सैनिकों का मनोबल तोड़ने के लिए कंपनी सेना ने गोरखा सैनिकों की जल आपूर्ति को बंद कर दिया। तीन दिन तक भूखे-प्यासे गोरखा सैनिक अंग्रेजों की सेना से टक्कर लेते रहे।

बाद में जब बलभद्र सिंह की सेना को अपने जीवित रहने की आशा कम होती लगने लगी, तब बलभद्र सिंह ने अपने युद्ध करने में सक्षम 70 वीरों के साथ खलंगा किले को खाली करने का निश्चय किया।

आधी रात का समय था की अचानक खलंगा किले का मुख्य द्वार खुला और बलभद्र सिंह और उनके गोरखा सैनिक साक्षात काल के रूप में अंग्रेजों की सेना पर मौत बनकर टूट पड़े। अपनी खुखरियों से ही हमला करके गोरखा सैनिकों ने कंपनी सेना की घेराबंदी तोड़कर निकलने में कामयाबी प्राप्त की। यह सब इतना दुष्कर और असंभव सा काम गोरखा सैनिकों ने इतनी बहादुरी से किया कि कंपनी सेना समझ ही नहीं सकी। उसने तो कल्पना भी नहीं की थी कि थोड़े बहुत हथियारों के साथ भूखे- प्यासे गोरखा सैनिक इस प्रकार का दुस्साहस भी कर पाएगें।

कंपनी सेना का घेरा तोड़ने के बाद गोरखा सैनिक नालापानी के जल स्रोत पर पहुंचे और उन्होंने उसके पानी को पी कर अपनी कई दिनों की प्यास को बुझाया। तभी बलभद्र सिंह ने सिंहनाद करते हुए कहा,’ खलंगा पर विजय प्राप्त करना शत्रुओं के लिए असंभव था, परंतु अब मैं स्वेच्छा से उसे छोड़ता हूं।’

इस गर्जना को करने के बाद बलभद्र सिंह अपने 70 गोरखा वीरों के दस्ते के साथ घने जंगल में प्रवेश कर दे। उनकी शत्रु कंपनी सेना रात के घने अंधेरे व कंटीली झाड़ियों से भरे जंगल में गोरखा वीरों को ढूंढने का साहस भी नहीं जुटा पाई। उसी रात में ही तीन बजे कंपनी सेना ने खलंगा किले पर अधिकार करके ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन कर लिया।

इतनी विषम परिस्थितियों में गोरखा वीरों ने अपने अदम्य साहस और अतिशय वीरता को इतनी निडरता और संघर्ष शक्ति के साथ दिखाया था कि शत्रुओं ने भी उनकी जिजीविषा की उपेक्षा नहीं की। अंग्रेज भी उनकी वीरता के कायल हो गए थे।

सहद्रता का परिचय देते हुए अंग्रेजों ने उनको पूरा-पूरा वीरोचित सम्मान प्रदान किया। इसके प्रतीक स्वरूप उन्होंने दो स्मारक निर्मित कराए। जिसमें बलभद्र और उनकी फौज को ‘वीर दुश्मन’कहकर संबोधित किया गया है। यह स्मारक आज भी देहरादून शहर से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित रिस्पना नदी के तट पर वीर बलभद्र सिंह की वीरता के प्रतीक रूप में खड़े हैं। ये स्मारक विश्व में अपने ढंग के अनूठे वीरता, संघर्ष शक्ति व देश प्रेम तथा उदारता के प्रेरणा स्रोत के रूप हैं।

इन दो स्मारकों में से एक स्मारक बलभद्र सिंह व उनके वीर गोरखा सैनिकों के सम्मान में है। इस स्मारक पर अंग्रेजों ने निम्न शब्द उत्कीर्ण करवाए – ‘हमारे वीर प्रतिद्वंदी दुर्गपाल बलभद्र व उसके वीर गोरखों के सम्मान में (उनके प्रति) यह प्रशंसा में उत्कीर्ण है।

दूसरा स्मारक कंपनी सेना के संचालक मेजर जनरल गिलेप्सी की स्मृति में है।

उस समय बलभद्र की बहादुरी के कारण लोगों ने गोरखा सैनिकों की वीरता को माना। आज सेना में जितनी भी गोरखा पलटन है, वे गोरखा टोपी एमपी है। यह टोपी उन्हीं बलभद्र सिंह की देन है।

अंग्रेजों ने सन 1815 में गोरखाओं की बहादुरी को देखकर सेना में गोरखा रेजीमेंट की शुरुआत की। उस समय की देन के कारण ही गोरखा आज भी गोरखा टोपी और खुखरी लेकर चल सकते हैं।

देहरादून के निकट ‘खलंगा युद्ध स्मारक’ भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है, लेकिन इससे कुछ दूरी पर ही प नालापानी पहाड़ पर स्थित युद्ध स्मारक का मैदान अभी भी संरक्षण की बाट जोह रहा है।

देहरादून के उत्तर पूर्व में जहां यह स्मारक स्थित है वहां घना जंगल है। यह सारा वन क्षेत्र है। घने जंगल के बीच लगभग 850 मीटर पर स्थित यह दुर्गनुमा क्षेत्र वास्तव में बहुत दुर्गम है। अगर इस स्थान पर ट्रेकिंग रूट बना दिया जाए तो लोगों की दिलचस्पी इस ऐतिहासिक विरासत के प्रति बढ़ेगी और इसका विकास पर्यटन स्थल के रूप में होगा।

हर वर्ष इसकी याद में मेले का आयोजन किया जाता है। मेले स्थल से लगभग 300 मीटर ऊपर पहाड़ी पर खलंगा युद्ध स्मारक है। इतनी ऊंचाई से देहरादून का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। यहां से देहरादून नगर को देखना बहुत अच्छा लगता है। ध्वनी एवं वायु प्रदूषण से मुक्त घने जंगल के बीच में स्थित इस स्थान पर कुछ समय गुजारना किसे अच्छा नहीं लगेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *