_____________________________________________________ मुजफ्फरनगर जनपद के १००किमी के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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डासना उत्तर प्रदेश का सबसे पुराना कस्बा है। गाजियाबाद जनपद का यह कस्बा दिल्ली एनसीआर में स्थित है। दिल्ली- लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित डासना कस्बा दिल्ली की सीमा से  35 किलोमीटर दूर स्थित है।

डासना नगर का प्राचीन इतिहास त्रेता युग और महाभारत काल से जुड़ता है। त्रेता युग में  यह स्थान  सनातन धर्म के  प्रमुख तीर्थों में  हुआ करता था । इसके अलावा  यहां  महाभारत  काल के  किस्से व किंवदंतियां सुनने को मिलते हैं। माना जाता है लाक्षागृह से बचकर निकलने के बाद माता कुंती के साथ पांडव यहां कुछ समय रहे थे। इस नगर के पुराने लोग बताते हैं कौरव- पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य ने इसकी स्थापना की थी। कुरुक्षेत्र के महाभारत युद्ध से पूर्व इसमें   सम्मिलित होने के लिए अनेकों स्थानों से आए राजा और उनके साथ आई विशाल सेनाओं के निवास स्थान के लिए गुरु द्रोणाचार्य ने यहां के विशाल मैदान को छावनी बसाने के रूप में  चुना और इस स्थान का नाम दर्शना नगर रखा। महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद इस स्थान की शोभा जाती रही। यहां के निवासियों ने इस स्थान को छोड़कर पास में ही एक नया नगर बसाया जिसको दबासना कहा जाता था।

एक बड़े कालखंड के बाद दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन के समय एक सूफी फकीर जिनका नाम महमूद था, दिल्ली से आकर यहां के वीरान जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगे। आगे चलकर यह सूफी संत महमूद बियाबानी के नाम से जाने गएI उन्हीं के समय में डासना नाम का नगर बना।

इसी समय राजस्थान के एक राजा सलार सिंह का काफिला यात्रा करता हुआ इस वीरान जगह आ ठहरा। राजा सलार सिंह को भयानक कोढ़ रोग था। राजा ने अपने शरीर से कोढ को ठीक करने के लिए वैद्य – हकीमों की बहुत औषधियां ली लेकिन उनका रोग ठीक नहीं हो रहा था तब उन्होंने राज ज्योतिषियों और वैद्यों के कहे अनुसार अपने शरीर को गंगा को समर्पित करने चले थे उसी यात्रा के दौरान राजा का काफिला यहां रुका था ।

उसी दौरान महाराजा को प्यास लगी लेकिन काफिले का पानी समाप्त हो चुका था। महाराजा ने अपने लोगों को पानी की तलाश में इस बियाबान जंगल में पानी तलाशने के लिए भेजा राजा के लोगों ने देखा एक सूफी संत अपनी कुटिया में बैठे हैं और कुटिया के समीप ही पानी की एक छोटी सी तलैया है राजा के कर्मचारी उस तलैया से जल भरकर महाराजा के लिए ले गए महाराजा ने जैसे ही उस जल को पीने के लिए अपने मुंह में डाला उसी समय उन्होंने अपने शरीर से भयानक  रोग को नष्ट होते पाया। राजा को यह देख कर बहुत आश्चर्य हुआ उन्होंने अपने लोगों से उस जल के बारे में  जानकारी ली। उन्हें सब बातें बताए जाने पर राजा उन सूफी संत की कुटिया पर पहुंचे और उन्हें नम्रता से हाथ जोड कर उनसे तलैया में स्नान करने की आज्ञा ली। राजा के उस तलैया में स्नान करते ही उनका भयानक कोढ़ का रोग दूर हो कर पूरा शरीर निरोग हो गया। राजा ने सूफी संत के चरणो में अपना सिर रख दिया और संत बियाबानी की माया देख उनके शिष्य बन गए। इसके बाद राजा संत बियाबानी से आज्ञा लेकर अपने राज्य लौट गए।

बताया जाता है कि वह तलैया वर्तमान समय में डासना के मेन बाजार के निकट जामा मस्जिद डासना के कुएं के नाम से प्रसिद्ध है।

अपने राज्य लौटकर राजा ने सारी घटना को अपनी पत्नी और परिवार सहित सारी जनता को बताया। राजा सलार सिंह संत बियाबानी से यह कह कर गए थे कि अपने राज्य जाने के बाद वह शीघ्र ही यहां वापस आएंगे और इस स्थान को एक सुंदर नगर के रूप देंगे

राजा के यहां से चलते समय इस बियाबान जंगल में उनके राज कर्मचारियों के सामने एक घटना घटी रात को सोते समय उनके किसी डेरे में एक काले सांप ने किसी कर्मचारी को डस लिया इस बियाबान जंगल में उस समय बड़ी मात्रा में डास नाम की घास खड़ी थी संत के आशीर्वाद से वह कर्मचारी जीवित हो उठा। उसी समय संत के मुंह से यह भविष्यवाणी हुई सांप ने डसा डासना बसा।

सांप का डसना और घनी घास डास का यहां उत्पन्न होना दोनों चीजों के शब्दों को मिलाकर डासना बसा।

राजा सलार सिंह अपने कहे अनुसार यहां आपस आया और उसने इस्लाम धर्म को अपना कर मुसलमान बन गया और अपना नाम मोहम्मद साकिर रख लिया। उसने यहां एक नगर बसाया और उस नगर की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर मजबूत दीवार बनवाई जिसके निशान आज भी यहां पाए जाते हैं। दीवार के चारों ओर दो जुड़वा नाले बनवाए गए, दोनों नाले एक स्थान पर आकर मिल जाते हैं। वे दोनों नाले आज भी यहां स्थित है। नगर में प्रवेश करने के लिए 3 दिशाओं में 3 दरवाजे बनवाए गए और उस समय नगर में छज्जा बाजार, जोहरी बाजार, छोटी बजरिया व मेन बाजार भी बनवाए गए थे। उनमें बजरिया और मेन बाजार आज भी हैं।

उसने  नगर के भीतर राजा ने अपने लिए एक किला और परिवार के लोगों के लिए हवेलियां बनवाई उसके परिवार के लोगों की हवेली का दीवान खाना जो मुंशी करीम बख्श का दीवान खाना कहलाता है आज भी इस प्राचीन नगर के इतिहास को बताता है

डासना कस्बे की पुरानी स्मृतियों को बताती महमूद बियाबानी की कब्र, संत मखदूम शाह का मजार, कस्बे में बंजारों की बनवाई तुगलकों के काल की जामा मस्जिद तथा दुर्गा मंदिर, मेन बाजार का राधा कृष्ण मंदिर, डासना के रईस लाला रामस्वरूप के पुरखों की हवेली, सेठ मटोलचंद के पुरखों की हवेली के साथ साथ मुंशी करीम बख्श का दीवानखाना जिसमें किसी समय 360 गांवों की कचहरी लगा करती थी। ये सब आज भी डासना कस्बे के इतिहास को बताती हैं।

डासना कस्बे की धरती ने बहुत उन्नति देखी है तो अवनति को भी देखा है। दिल्ली के निकट होने के कारण 18 57 से पहले यहां के एक बहुत बड़े क्षेत्रफल में पास की रियासतों के लोग आ कर बस गए, जिससे उस समय यहां की जनसंख्या चालीस हजार तक पहुंच गई थी।

जिस समय दिल्ली पर नादिरशाह ने आक्रमण किया और वह दिल्ली में कत्लेआम कर सब कुछ लूटकर वापस चला गया, उस समय दिल्ली पर मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला का शासन था। नादिरशाह के चले जाने के बाद लुटे पिटे मुगल बादशाहा मोहम्मद शाह रंगीला ने साहूकारों से मुगल दरबार को कर्ज देने के लिए कहा। तब देश के बहुत से साहूकार दिल्ली दरबार में उपस्थित हुए, उनमें डासना के सेठ मटोलचंद भी साधारण से वस्त्र पहनकर दरबार में पहुंचे, उन्होंने भ1रे दरबार में अपनी ओर से घोषणा की ‘मैं दरबार को बाबर के समय से लेकर अब तक के समय के जितने सिक्के बादशाह लेना चाहेंगे, उतना दूंगा। और सेठ मटोलचंदने छकडों में भर-भर कर उन्हें पहुंचाया भी।

 

डासना कस्बे में हिंदू और मुसलमान दोनों के ही बहुत से धार्मिक स्थान हैं। इनमें पुराने समय के आठ शिवालय व मंदिर तथा 13 मस्जिदें यहां स्थित है।

** प्रचंड चंडी देवी व महादेव मंदिर-

त्रेता युग में यह मंदिर सनातन धर्म के प्रमुख तीर्थों में हुआ करता था। बाद के समय में विदेशी हमलावरों से रक्षा के लिए यहां की देवी देवताओं की मूर्तियों को मंदिर परिसर में बने तालाब में छुपा दिया गया था।

बहुत समय बाद स्वामी जगदगिरि महाराज को माता ने स्वप्न में दर्शन देकर तालाब में मूर्ति के बारे में अवगत कराया और पुणः स्थापना के लिए आदेश दिया। जिसके बाद तालाब से मूर्ति निकालकर पुणः प्राण प्रतिष्ठा कर स्थापित किया गया। माता की मूर्ति कसौटी पत्थर की बनी है। इस तरह के पत्थर की बनी मां काली की भारत  भर में केवल दो मूर्तियां हैं।

देश की आजादी में भी इस मंदिर का योगदान रहा है। अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए यहां आए दिन क्रांतिकारियों का आना जाना लगा रहता था। यह स्थान उनके संपर्क साधने और आदान-प्रदान के रूप में भी महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था।

प्राचीन काल का चंडी देवी मंदिर जो स्थानीय लोगों में डासना देवी का मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है । इस देवी  मंदिर में नवरात्रों में मेले लगते हैं। अष्टमी व नवमी तिथि के दिन लाखों भक्त माता के दर्शन करने के लिए आते हैं।

मेन बाजार में लाला रामस्वरूप के पूर्वजों के द्वारा बनवाया गया राधा कृष्ण मंदिर प्रसिद्ध है।

कस्बे के चारों ओर सूफी संतों के मकबरे जिनमें पहला डासना के संस्थापक महमूद बियाबानी का मकबरा, दूसरा मकदूम बाबा जो निजामुद्दीन औलिया के खानदान से कहे जाते हैं। इन के मकबरे पर हर साल उर्स का मेला लगता है जिसमें हर वर्ग श्रद्धालु उनके मकबरे पर इकट्ठे होते हैं।

डासना कस्बे की दो हिंदू सेठों की हवेलियां भी प्रसिद्ध  है जो अपना इतिहास दर्शकों को बताती हैं। लगभग 300 वर्ष पुरानी लाला रामस्वरूप की हवेली जो कई गांवों के जमीदार थे।

सेठ मटोलचंद की हवेली भी 300 वर्षों से भी अधिक पुरानी है। इस प्राचीन हवेली में 52 चौखटें चढ़ी हैं। लाला मटोलचंद डासना के एक बहुत बड़े साहूकार थे। इनकी अवनति के बारे में बताया जाता है कि लाला मटोल चंद के पौत्र का जन्म हुआl उसके जसूटन के बाद कुआं पूजन के अवसर पर बहुत जिद पकड़ गई कि मैं सोने की अशर्फियों पर चल कर ही कुआं पूजने जाऊंगी। लाला ने बहुत समझाया परंतु बहु नहीं मानी और उसने जिद पकड़ ली। राज हठ की तरह त्रिया हठ भी पहले से प्रसिद्ध है। हवेली से कुएं तक लगभग एक मील की दूरी तक सोने की अशर्फियां बिछाई गई और बहू उनके ऊपर से ही चल कर कुआ पूजने गई । कुआं पूजन के पश्चात लाला ने उन सब सोने की अशर्फियों को गरीबों में लुटा दिया। बताते हैं कि रात्रि को लक्ष्मी जी ने लाला को दर्शन दिए और कहा कि तेरे परिवार ने मेरा अपमान किया है मैं तेरे घर से जा रही हूं। इसके बाद लाला मटोलचंद का चिराग हमेशा के लिए गुल हो गया।

 

18 57 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय हिंडन नदी के तट पर स्वतंत्रता सैनिकों और अंग्रेज फौज के बीच युद्ध छिड़ा। अंग्रेजी फौज ने लोनी फारुखनगर     को  उजाड़ कर रख दिया। उसके बाद अंग्रेजी फौज डासना की ओर बढ़ी। डासना नगर में अंग्रेजों ने मुनादी करवाकर अपने शासन की घोषणा की, लेकिन डासना के निवासियों ने अंग्रेजों के शासन को स्वीकार नहीं किया। यहां के निवासियों ने मनादी करने वाले का ढोल फोड़ दिया और अंग्रेजों को पकड़कर जान से मार दिया। इसके बाद अंग्रेजों की फौज डासना के निवासियों पर टूट पड़ी और यहां के सैकड़ों लोगों को बंदी बना लिया। अंग्रेजों ने यहां पर ही कई लोगों को पेड़ पर लटका कर फांसी दी। जिस पीपल के पेड़ पर लोगों को फांसी दी गई थी वह पेड़ आज भी डासना के आजाद मेमोरियल इंटर कॉलेज में स्थित है। अंग्रेजों ने यहां के निवासियों पर खुला अत्याचार किया।

अंग्रेजों ने डासना को और आसपास के इलाके के गांवों को भी ज़ब्त कर लिया जिनमें धौलाना पिलखुआ आदि भी शामिल थे। 1860 में डासना को अंग्रेज कंपनी सरकार ने माइकल जॉन एडवोकेट को बेच दिया। माइकल ने मसूरी गांव के निकट 1861 में अपनी कोठी और कार्यालय के भवन बनवाए थे। बाद में उस कोठी को मसूरी के हाजी नजीर नाम के व्यक्ति ने खरीद लिया।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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