सहारनपुर जनपद का एक छोटा सा कस्बा देवबंद इस्लामिक शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र के रूप में प्रसिद्ध दारुल उलूम संस्था के कारण देश विदेश में प्रसिद्ध है।

देवबंदी धारा का केंद्र बिंदु विश्व प्रसिद्ध दारुल उलूम देवबंद की एक खास पहचान है।

दारुल उलूम ने इस्लाम की अनूठी सेवा की है। मुस्लिम महजब के दर्शन और कल्चर का मुख्य केंद्र होने के  नाते मुस्लिम महजब के किसी भी महजबी और सामाजिक सवाल पर यहां के मुफितयों के फतवे आदर के साथ देखे जाते हैं। देवबंद के दारुल उलूम का महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुस्लिम जगत में अल अजहर विश्वविद्यालय काहिरा के बाद इसी संस्था को सबसे अधिक सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त है

देवबंद की विश्वविख्यात संस्था दारुल उलूम की स्थापना 30 मई 1966 को हजरत मौलाना मुहम्मद कासिम नानौतवी ने की थी।

देवबंद नगर के उत्तरी पश्चिमी किनारे पर स्थित छत्ता मस्जिद में अनार के पेड़ के नीचे बैठकर सिर्फ एक शागिर्द को लेकर इस संस्था की शुरुआत की गई थी।

वेस्टर्न कल्चर की तेज आंधी से हिंदुस्तानी मुसलमानों की महजबी निष्ठा और कल्चर की हिफाजत के लिए इस संस्था की स्थापना की गई थी।

एक शागिर्द को लेकर शुरू की गई संस्था आज एक विशाल आकार ले चुकी है। दारुल उलूम में पढ़ने आने वाले छात्रों के खाने, रहने और किताबों की व्यवस्था मुफ्त होती है किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता लेने पर यहां रोक है। इस संस्था का सालाना बजट कई करोड़ रुपए में है और इस सब का इंतजाम सहयोग से ही होता है। संस्था के पास कई सौ कमरों का हॉस्टल और एक समृद्ध पुस्तकालय है, जिसमें अनेकों विषयों की लाखों किताबें है

दारुल उलूम में 8 साल के पाठ्यक्रम के तहत देश विदेश से पढ़ने आने वाले छात्रों को कुरान, हदीस, मुस्लिम परंपराओं और न्याय व्यवस्था के अलावा फारसी और अरबी का व्याकरण और तर्कशास्त्र और अरबी व फारसी के साहित्य और दर्शन की शिक्षा दी जाती है।

दारुल उलूम में पढ़ाई पूरी करने के बाद जो सर्वोच्च डिग्री दी जाती है उसे फाजिल (मौलवी ) कहा जाता है। इसे स्नातक के बराबर माना जाता है। इसके अलावा यहां मुफती पढ़ाई, अरबी साहित्य और हदीस का दो 2 साल का कोर्स कराया जाता है।

दारुल उलूम में तालीम पूरी करने वाले ज्यादातर छात्र देश के इस्लामिक मदरसों में टीचर हो जाते हैं। कुछ सरकारी स्कूलों में उर्दू व अरबी भाषा के अध्यापक हो जाते हैं। कुछ मस्जिदों में इमाम बन जाते हैं। तो बहुत से छात्र केवल मजहबी कारणों से यहां तालीम लेते हैं और अपने काम धंधों में लग जाते हैं l

दारुल उलूम की खास पहचान यहां से जारी फतवों के कारण होती है।  यहां इसके लिए बाकायदा फतवा विभाग बना हुआ है। जो इस्लामिक जीवन से जुड़ी किसी समस्या या प्रश्न के सामने आने पर कुरान व हदीस की रोशनी में उन पर विचार कर उत्तर देता है। यही उत्तर फतवा कहलाता है।

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दारुल उलूम की लाइब्रेरी

 

देवबंद का पूरी दुनिया में प्रसिद्ध दारुल उलूम महज एक इस्लामिक शिक्षा का संस्थान ही नहीं है। यहां की लाइब्रेरी में इस्लामिक महजब से संबंधित 1 लाख 9० हजार किताबें और एक हजार साल से भी पुरानी पांडुलिपियां यहां उपलब्ध हैं। इस्लाम से संबंधित किताबों की संख्या के लिहाज से दारुल उलूम की लाइब्रेरी का संग्रह दुनिया भर में अव्वल है। 1966 में इस लाइब्रेरी की स्थापना मौलाना कासिम व हाजी आबिद ने रखवाई। शुरुआत में मांगी हुई कुछ किताबों

से ही काम चलाया गया। जब इस संस्था में  तुलेबाओं ( विद्यार्थियों) की संख्या बढ़ी उसके साथ ही लाइब्रेरी में किताबों की मांग भी बढ़ने लगी तो कासिम व हाजी आबिद के एलान पर देवबंद के लोगों ने दारुल उलूम को अपनी किताबें दान में  दी। उस समय से आज तक दारुल उलूम को किताबों को दान में भेजने का सिलसिला चला आ रहा है विदेशों के लेखक भी बिना कोई पैसा लिए किताबे भेज रहे हैं।

इस लाइब्रेरी में इस्लाम, मनोविज्ञान, चिकित्सा शास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र व हिंदू धर्म के अलावा अन्य विषयों की 2 लाख से भी अधिक किताबें उपलब्ध हैं। इनमें से केवल इस्लाम महजब पर ही एक लाख 90 हजार किताबें और अनेकों पुरानी पांडुलिपियां इस लाइब्रेरी की शान बढ़ा रही है।

बहुत सी दुर्लभ पांडुलिपियां और किताबें इस लाइब्रेरी के संग्रह में शामिल है।

इस्लामिक महजब पर लिखी गई किताबों की दृष्टि से इसे विश्व की सबसे  बड़ी लाइब्रेरी होने का गौरव प्राप्त है

इस्लाम महजब पर रिसर्च करने के लिए अब तक कई हजार शोधकर्ता यहां पर उपलब्ध किताबों की मदद ले चुके हैं। इनमें  कई सौ से अधिक विदेशी शोधकर्ता शामिल है।

इस लाइब्रेरी में पुस्तकें खरीदने के लिए दारुल उलूम के बजट से कोई अलग से धनराशि मुकर्रर नहीं की जाती। यहां कि प्राय सभी पुस्तकें दान में मिली हैं। मुस्लिम विद्वानों की मृत्यु के बाद उनकी किताबों का जखीरा भी दारुल उलूम मे पहुंचाया जाता था।

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मस्जिद  – ए –   रशीद

इस्लामी धार्मिक शिक्षा संस्थान दारुल उलूम में    स्थित मास्जिद – ए – राशिद के कारण देवबंद की भारत में ही नही बल्कि विश्व में भी खासी पहचान है। इस मास्जिद को देखने के लिए देश से ही नहीं विदेशों से भी बड़ी संख्या में लोग प्रतिदिन यंहा आते हैं।

दारूल उलूम में पहले से ही बनी कदीम मस्जिद व छत्ता मस्जिद यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रों के नमाज पढ़ने के लिए अपर्याप्त थी। नमाजियों की सुविधा के मद्देनजर दारुल उलूम के ओहदेदारों ने एक नई व बड़ी मस्जिद बनाने का फैसला लिया। इस मस्जिद के निर्माण का कार्य सन 1986 में शुरू हुआ। इतनी विशाल, भव्य और आकर्षक मस्जिद का निर्माण बिना नक्शे ( ब्लूप्रिंट) व इंजीनियर के  किया गया। मस्जिद का आकर्षक और भव्य स्वरूप मौलानाओं की कल्पनाओं की देन है। मस्जिद का निर्माण  देवबंद व आसपास के कारीगरों के द्वारा ही कराया गया है। देश विदेश के किसी भी प्रसिद्ध कारीगरों का इसके निर्माण में कोई सहयोग नहीं लिया गया है।

19 सालों की कड़ी मेहनत से बनकर तैयार हुई इस मस्जिद का मुख्य दरवाजा 6०फुट ऊंचा और 55 फुट चौड़ा है। इस दरवाजे में  संगमरमर पर की गई कलाकारी मुगलकालीन इमारतों की झलक के साथ साथ आधुनिक युग की कला का खूबसूरत मेल है। मुख्य दरवाजे के बाद मस्जिद का चांदनी की तरह सफेद 17 हजार वर्ग फुट का विशाल सहन है। सहन के चारों ओर 16 फुट चौड़ा संगमरमर की जालियों से युक्त बरामदा है। इस सहन के बाद मस्जिद की 128 फुट लंबी और 110 फुट चौडी मुख्य इमारत है। इसकी कोफर स्लैब की बनी विशाल कलात्मक छत 42 फुट के चार बड़े बड़े खंभों पर टिकी हुई है।

मस्जिद के नीचे बने तहखाने में 28 कमरे हैं। जिनमें यहां पढ़ाई करने वाले छात्र रहते हैं। मस्जिद के ऊपर चारों ओर 25 फुट ऊंचे 4 छोटे गुंबद हैं। मस्जिद के बीचो-बीच 60 फुट लंबा और इतना ही चौड़ा तथा 120 फुट ऊंचा विशाल गुंबद है I इस भाग के ही दोनों छोर पर 180 फुट ऊंची आसमान को चूमती दो मीनारें हैं। इनसे अलग इस मस्जिद में छोटी व बड़ी असंख्य मीनारें हैं। इतनी अधिक मीनारें भारत की किसी भी दूसरी नई या पुरानी मस्जिद में नहीं है।इस मस्जिद में अनेक बुर्जियाां है जिनकी खूबसूरती देखते ही बनती है। मुख्य दरवाजे के सामने एक बड़ा सहन है। जिसमें एक सुंदर और बड़ा हौज बना है। मस्जिद ए रशीद में एक साथ 15 हजार नमाजी नमाज  अदा  कर सकते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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