_____________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद के १००किमी के दायरे में गंगा – यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र

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दनकौर एक पौराणिक स्थान है। यमुना नदी से मात्र लगभग 3 किमी दूरी पर बसा दनकौर नगर का ऐतिहासिक, धार्मिक, सामाजिक और व्यापारिक महत्व है। देश को  विज्ञान, साहित्य, कला और व्यापार के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अनेक महान व्यक्ति इस नगर की देन है।

गौतमबुद्वनगर जनपद का दनकौर गुरु द्रोणाचार्य की पवित्र तपोस्थली है। अनेक ऐतिहासिक व पौराणिक साक्ष्यों को समेटे यह स्थान यमुना किनारे एक प्राचीन खेड़े पर बसा हुआ है। इस स्थान को द्रोणाचार्य और एकलव्य की कर्म स्थली होने का गौरव प्राप्त है।

इसका प्राचीन नाम द्रोणाकार था।  कौरव- पांडवों को शस्त्र विद्या सिखाने वाले गुरु द्रोणाचार्य ने इसको बसाया था। यहां द्रोणाचार्य का मंदिर भी है। संभवत भारत में एकमात्र जगह है जहां गुरु द्रोणाचार्य का मंदिर है।

महाभारत ग्रंथ वर्णित कथा  के अनुसार धनुर्विद्या की शिक्षा लेने के समय द्रोणाचार्य की मित्रता पांचाल नरेश द्रुपद से हो गई। बाद में द्रोणाचार्य भगवान परशुराम के पास धनुर्विद्या सीखने चले गए। धनुर्विद्या की शिक्षा पूरी करने के बाद जब वह घर लौटे तो उन्होंने घर की दयनीय दशा देखी। अपनी पत्नी कृपि की जिद पर वह अपने पुराने मित्र राजा द्रुपद के पास सहायता मांगने के लिए गए परंतु द्रुपद ने अपने पुराने मित्र द्रोण को पहचानने से ही मना कर दिया। अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए वह हस्तिनापुर राज्य के संपर्क आए। जहां  पितामह भीष्म ने द्रोण को कौरव- पांडव राजकुमारों को शस्त्र विद्या की शिक्षा देने के लिए नियुक्त किया।

दनकौर महाभारत कालीन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर गुरु द्रोण की कर्म स्थली रही है। प्राचीन मान्यता है कि  गुरु द्रोणाचार्य  कौरव- पांडवों को यमुना नदी के इसी खादर क्षेत्र के घने जंगलों में शस्त्रों की शिक्षा देते थे।

इस स्थान से एकलव्य भील का भी संबंध है। भीलराज का पुत्र एकलव्य अपने पिता के खोए हुए राज्य को प्राप्त करने के लिए धनुर्विद्या सीखना चाहता था। इसलिए वह धनुर्विद्या सीखने की आशा लेकर गुरु द्रोणाचार्य के पास गया।गुरु द्रोणाचार्य कौरव एवं पांडवों को शास्त्रों का अभ्यास करा रहे थे। अतः गुरु द्रोणाचार्य के द्वारा एकलव्य को अपना शिष्य बनाने में विवशता थी। लेकिन एकलव्य ने तो अपने मन में द्रोणाचार्य को ही अपना गुरु मान लिया था इसलिए एकलव्य ने घने वन में गुरु द्रोण की एक मूर्ति बनाई और उसके सम्मुख ही धनुर्विद्या सीखने का अभ्यास करने  लगा।

इस बीच द्रोण ने कौरव पांडव राजकुमारों की मदद से द्रुपद को युद्ध में हराकर अपने अपमान का बदला चुका लिया था उधर लगनशील एकलव्य निरंतर कठिन अभ्यास के द्वारा श्रेष्ठ धनुर्धर बन गया।

कहा जाता है कि जिस क्षेत्र में एकलव्य ने धनुर्विद्या सीखी, वह इस समय का दनकौर का ही क्षेत्र था।

संयोगवश एक दिन गुरु द्रोणाचार्य अपने कुरु वंश के राजकुमार शिष्यों के साथ आखेट के लिए वन में गए हुए थे। वहां उन्होंने देखा कि किसी ने कुत्ते को बगैर घायल किए हुए उसके मुंह को बाणों से भर दिया है। यह देख कर सभी अचरज में पड़ गए और उस स्थान पर पहुंचे जहां एकलव्य गुरु द्रोण की प्रतिमा के सम्मुख धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। गुरु को अपने सम्मुख देख एकलव्य ने उनके चरणों में प्रणाम किया। लेकिन गुरु द्रोणाचार्य तो अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का प्रण कर चुके थे इसलिए उन्होंने एकलव्य से गुरु दक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य की गुरु भक्ति की निशाल आज भी दी जाती है।

एकलव्य ने जिस स्थान पर गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा स्थापित की थी उस जगह पर आज भी द्रोणाचार्य का विशाल मंदिर बना हुआ है श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस मंदिर में एकलव्य द्वारा निर्मित वही प्रतिमा प्रतिष्ठित है जिसके समक्ष उसने धनुर्विद्या का अभ्यास किया था। कहते हैं पूरे भारत वर्ष भर में केवल दनकौर में ही यमुना किनारे गुरु द्रोणाचार्य का एकमात्र मंदिर विद्यमान है। गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर ही इस स्थान का नाम दनकौर पड़ा है।

द्रोणाचार्य मंदिर प्रांगण में शिव परिवार, श्रीबांकेबिहारी, राधा कृष्ण, श्री रामचंद्र, गणेश जी, मां दुर्गा, हनुमान जी आदि के मंदिर सहित अनेक छोटे-बड़े मंदिर भी बने हुए हैं। इन मंदिरों में लगे मार्बल में रंग – बिरंगी आकर्षक चित्रकारी देखने योग्य है। इस आकर्षक चित्रकारी को दनकौर के ही एक कुशल कलाकार ने वर्षों पूर्व बनाया था।

इस क्षेत्र में गुरु द्रोणाचार्य की मान्यता बहुत गहरी है। आस- पास के ही नहीं अपितु दूरदराज से दर्शनार्थी गुरु द्रोणाचार्य की पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं। गुरु द्रोणाचार्य की कृपा से निसंदेह सभी की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

प्रत्येक रविवार को इस मंदिर में गुरु द्रोण की प्रतिमा की विशेष पूजा होती है। रविवार के दिन प्रातः काल से ही इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटनी शुरू हो जाती है। बताते हैं यहां रविवार का विशेष महत्व है। प्रत्येक रविवार को मंदिर में विशेष उत्सव आयोजित कर द्रोण बाबा की मूर्ति को भोग लगाया जाता है I

स्थानीय लोगों के कथनानुसार उनके बड़े बुजुर्गों का कहना था कि इस मंदिर में अश्वत्थामा के भी दर्शन किए गए हैं।

मंदिर के पास में ही गुरु द्रोण गौशाला है। गुरु द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा को भले ही दूध के लिए कष्ट सहना पड़ा हो मगर आज गुरु द्रोण गौशाला में बहुत सी दुधारू गाय मौजूद हैं।

मंदिर परिसर में ही एक अनोखा तालाब है। यह तालाब भी प्राचीन काल से यहां पर मौजूद है और हर समय सूखा ही रहता है। इस तालाब की विशेषता के बारे में बताया जाता है कि इसे पूरा भर दिया जाए तो भी डेढ़ या दो घंटे में यह तालाब खाली हो जाता है। कहते हैं अंग्रेजों के शासन के समय उन्होंने इस तालाब का बखूबी परीक्षण किया था। लेकिन अंग्रेजी शासन के अधिकारी भी इस विशेषता को बाबा द्रोणाचार्य का चमत्कार मानने को मजबूर हो गए थे।

मंदिर के इस तालाब को 1783 में सर जेम्स साल्ट नाम के एक अंग्रेज ने पक्का कर आया था।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर यमुना तट पर बसे दनकौर में निराली ही छटा होती है। इस अवसर पर द्रोणाचार्य मंदिर के खुले प्रांगण में मेले का आयोजन होता है। मेले में हर प्रकार के खेल तमाशे और मनोरंजन के साधन होते हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर यहां दंगल आयोजित करने की परंपरा अभी भी जारी है। मंदिर के तालाब का उपयोग विशाल दंगल के मैदान के रूप में होता है।  कई दिन तक चलने वाली भारतीय स्टाइल की कुश्तियों में देशभर के प्रसिद्ध पहलवान अपना जोर दिखाते हैं। तालाब की सीढ़ियों पर बैठकर दर्शकगण कुश्ती देखने का आनंद लेते हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आयोजित मेले का एक दुर्लभ आकर्षण यहां होने वाले नाटक हैं। तालाब के पास एक विशाल रंगमंच बना हुआ है जिसमें मेले के अवसर पर द्रोणा नाट्य मंडल द्वारा पारसी शैली में पौराणिक ऐतिहासिक धार्मिक और सामाजिक नाट्य प्रस्तुत किए जाते हैं।

स्थानीय व्यक्ति इन नाटकों में स्वयं अभिनय करते हैं। पारसी शैली के इन नाटकों में धार्मिक तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के विषयों का भव्यता पूर्ण मंचन होता है।

इस मेले में आसपास के क्षेत्रों से भारी संख्या में ग्रामीण और अन्य लोग आकर मेले व अन्य कार्यक्रमों का आनंद उठाते हैं।

गुरु पूर्णिमा पर गुरु द्रोणाचार्य की रथ यात्रा का आयोजन होता है।

गोपाष्टमी के अवसर पर द्रोण गोशाला परिसर से प्रभात फेरी निकाली जाती है।

 

 

 

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