___________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद(उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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एक छोटी सी जगह है बूड़िया। यह छोटा सा कस्बा बुड़िया हरियाणा में यमुना नदी के किनारे यमुनानगर से 10 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। हुमायूं का बसाया बुड़िया किसी समय एक प्रसिद्ध रियासत हुआ करती थी। उस समय बूड़िया सियासत में अन्य पड़ोसी जगाधरी, दयामला परगने भी शामिल थे।

बूड़िया के किले पर सन 1760 में सिखों का राज हुआ बाद में अंग्रेजों ने यहां अपना कब्जा जमा लिया। अंग्रेजों के कब्जे वाली यह जगह बाद में दो भागो में बंट गई बुढ़िया और दयालगढ़ में।

बूड़िया में सिख राजाओं का बनवाया किला है। इस किले का नाम देवल से जोड़ा जाता है।

यह किला और महल रियासती परिवार की निजी संपत्ति है और आजकल यहां राजा की एक बेटी का निवास है। बाहर से किसी अन्य व्यक्ति को अंदर जाने की अनुमति नहीं है।

बुढ़िया कस्बे में प्रवेश करने वाले द्वार को बीरबल द्वार कहा जाता है। पता नहीं यह बीरबल मुगल काल के अपनी हाजिर जवाबी के लिए प्रसिद्ध और अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल थे या कोई और बीरबल थे। लेकिन बीरबल द्वार के कारण यह माना जाता है कि यहां बीरबल का जन्म हुआ था।


बूड़िया कस्बे से 2 कि.मी. दूर बीरबल का रंगमहल बना हुआ है। बूड़िया की आबादी व किले से इतनी दूर आकर एकांत जंगल में इस महल को बनवाया गया था। इस महल को अब रंगमहल के नाम से जाना जाता है। रंगमहल जिस स्थान पर बना हुआ है उसको देखकर माना जा सकता है कि यह किसी खास मकसद के लिए ही आरामगाह कभी ना कभी रही होगी और इसके चारों तरफ सिर्फ जंगल होता होगा।

रंगमहल वाकई कभी अपने अच्छे समय में रंगमहल रहा होगा लेकिन अब इस स्थान के सब रंग उड़े हुए हैं। रंग महल की वास्तुकला इसके खंडहरों में देखी जा सकती हैं। इसके निर्माण में छोटी लखोरी ईंटों व विशेष प्रकार का पदार्थ इस्तेमाल किया गया था।

इसके अंदर आज भी उस समय की कलाकृतियां बनी हुई है। इसकी तरफ प्रशासन की ओर से कभी ध्यान नहीं दिया गया। पिछले कुछ वर्षों से इसकी हालत खराब से खराब होती चली गई।

यहां के लोग बताते हैं कि अगर प्रशासन इसका पुनरुद्धार करने की ओर ध्यान दें तो यह एक सुंदर पर्यटन स्थल बन सकता है।

बूड़िया में महाभारतकालीन पातालेश्वर महादेव के नाम से जाना जाने वाला प्राचीन मंदिर है। यहां के लोग बताते हैं कि विधर्मियों ने इस मंदिर को कई बार थोड़ा लेकिन उसी समय शिवलिंग पुण: साक्षात रुप में प्रगट हो गया। उस टूटे हुए शिवलिंग के टुकड़े आज भी इसमें मौजूद हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशाल मेला आयोजित किया जाता है जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक करने और मेले में शामिल होने के लिए आते हैं।

बूड़िया में सन 1963 में पंजाब विश्वविद्यालय के द्वारा खुदाई कराई गई थी जिसमें राजा व्याघ्रराज के समय के सिक्के मिले थे। इतिहासकार बताते हैं कि इस स्थान से 2 कि.मी. दूर सुंग नामक गांव है। यहां प्राचीन काल में एक संस्कृत विश्वविद्यालय था। इसमें बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। उस समय यहां बौद्ध धर्म के प्रचार था।

बुड़िया में ही लगभग 500 वर्षों से भी अधिक प्राचीन पंचमकाल का श्री दिगंबर जैन मंदिर है। कुछ दशक पहले यहां खुदाई के समय धातु से बनी मूर्ति निकली थी। जिसे इसी मंदिर में विराजमान किया गया था। इस जैन मंदिर में प्राचीन हस्तलिखित दुर्लभ ग्रंथों को भी देखा जा सकता है।

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