__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के १०० कि.मी.के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
_____________________________________

ब्रह्मसरोवर – कुरुक्षेत्र

ब्रह्मसर जिसे ब्रह्मसरोवर के नाम से जाना जाता है। एक विस्तृत सरोवर है। यह भारत का विशालतम सरोवर है। यह कुरुक्षेत्र का एक दिव्य और भव्य तीर्थ है। कुरुक्षेत्र आने वाले श्रद्धालु तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों के लिए ब्रह्मसरोवर आकर्षण का केंद्र बिंदु है। प्राचीन ब्रह्मसरोवर कुंड को अब एक निर्मल जल से लहराते हुए विशाल सरोवर के रूप में देखा जा सकता है।

पौराणिक ग्रंथों में वर्णन है कि महाभारत युद्ध से बहुत पहले ब्रह्मसर नामक सरोवर सर्वप्रथम महाराज कुरु ने तैयार करवाया था। महाराजा कुरू कौरव-पांडवों के पूर्वज थे। महाराजा कुरु यहां एक सन्यासी की तरह रहते थे।

सतयुग के आदि में ब्रह्मा जी ने यही यज्ञ के लिए वेदी का निर्माण कर सृष्टि की रचना की थी, भगवान विष्णु ने उनकी स्थिति के लिए यहां पर तप किया था और भगवान शंकर जी भी उसमें प्रवेश कर प्रकट हुए थे। इस तीर्थ को वामन पुराने में बहुत ही पवित्र तीर्थ माना गया है। प्राचीन काल में पहले इसका नाम ब्रह्मसर था बाद में यह रामहृद भी कहलाया।

आद्यं ब्रह्मसरः पुण्यं त्यों रामहृदस्मृतः।

– (वामन पुराण सरो० महा० ११/२४)

महाभारत तथा अन्य पुराणों में बताया गया है की ब्रह्मसर किसी समय १२ कि.मी.लंबा तथा १२ कि.मी.चौड़ा एक विस्तृत सरोवर था। सन्निहित सरोवर जो आज एक प्रथक सरोवर है एवं ब्रह्मसरोवर के पास ही स्थित है। वह भी किसी समय इसी सरोवर का अंग था तथा थानेसर, ज्योतिसर, कालेश्वर आदि सरोवर भी ब्रह्म सरोवर में ही स्थित थे। वामन पुराण के अनुसार –

रन्तुकादौजसं चांपि पावनाच्च चतुर्मुखम्‌।
सरः सनिहितं प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वमेव तु ॥
विश्वेश्वराद्धस्तिपुरं तथा कन्या जरद्गवी।
यावदोघवती प्रोक्ता तावत्‌ संनिहितं सरः।।
विश्वेश्वराद् देववरात् पावनी च सरस्वती।
सरः संनिहितं प्रोक्तं समन्तादर्द्धयोजनय्।। (वामन पुराण)

वामन पुराण के अनुसार इस तीर्थ में जो व्यक्ति चतुर्दशी को स्नान करते हैं तथा चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यहां रहकर उपवास करते हैं,उन्हें परब्रह्म का साक्षात्कार होता है तथा वे जन्म मरण के बंधन से छूट जाते हैं।

यहां सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान करने से एक हजार अश्वमेघ यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है।

भगवान परशुराम ने स्वयंसपंचक नामक सरोवर की स्थापना करवाई। श्रीमद्भागवत के अनुसार इसको तभी से ब्रह्मसरोवर के नाम से जाना जाता है। यहां के ब्रह्मसरोवर में स्नान कर भगवान परशुराम द्वारा क्षत्रिय हत्या के पाप मुक्त होने के भी अनेकों पौराणिक उल्लेख मिलते हैं।

इस सरोवर में के बीच में दो द्वीप हैं। इन द्वीपों में कई पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व के स्थान हैं। ब्रह्मसरोवर के बीच में द्वीपों के शांत तथा सौम्य वातावरण में कई प्राचीन मंदिर जिनमें गरुड़ सहित भगवान विष्णु का प्राचीन मंदिर एवं भगवान शिव का सर्वेश्वर महादेव का भव्य मंदिर के साथ अति प्राचीन चंद्रकूप का पवित्र तीर्थ स्थान है।

* श्री सर्वेश्वर महादेव मंदिर –

बाबा श्रवननाथ जी द्वारा निर्मित यह प्राचीन एवं सुप्रसिद्ध मंदिर इसी तीर्थ ब्रह्म सरोवर के बीच शोभायमान है। कहते हैं माता कुंती ने यहीं पर स्वर्ण कमल के द्वारा शंकर भगवान की पूजा की थी।

* चंद्रकूप –

ब्रह्मसरोवर के बीचों-बीच स्थित टीले पर स्थित यह एक प्राचीन कुंआं है। चंद्रकूप के नाम से जाने जाना वाला यह कुआं कुरुक्षेत्र के चार पवित्र कुओं में से एक है। कहते हैं युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध के उपरांत यहां एक विजय स्तंभ बनवाया था जो अब नहीं है।

यहां प्राचीन भवनों के भग्नावशेषों को भी देखा जा सकता है जिन्हें विदेशी आक्रमणकारियों ने तोड़ दिया था।

ब्रह्मसरोवर के समीप ही उत्तर-पश्चिम के तट पर एक सिख गुरुद्वारा है। दक्षिणी तट पर एक गुरुद्वारा गुरु नानक देव जी की स्मृति में है। गुरु नानक देव जी गुरु गोविंद सिंह जी तथा अन्य सिख गुरुओं ने अपने-अपने समय में इस तीर्थ स्थान की यात्रा की थी।

ब्रह्मसरोवर के उत्तरी तट पर बहुत से मंदिर तथा धर्मशालाएं हैं। ब्रह्मसरोवर के पास ही गीताभवन और गौड़ीय मठ है। पांडव मंदिर (डेरा बाबा श्रवन नाथ) है। निकट ही बिरला मंदिर है।

‘ऐंश्येंट जियोग्राफी ऑफ इंडिया में आया है कि यह सरोवर 3546 फिट पूर्व से पश्चिम लंबा एवं उत्तर से दक्षिण 1900 फिट चौड़ा था। समय की परतों के साथ यह मिट्टी से अवरुद्ध हो गया था इसका जीर्णोद्धार करके भव्य रूप दिया गया। इसकी वर्तमान लंबाई 1298 मीटर और चौड़ाई 630 मीटर है। इस सरोवर के चारों ओर लाल पत्थर की 20 फुट चौड़ी सीढ़ियां बनी हुई है।

ब्रह्मसरोवर के जीर्णोद्धार से पहले कई पुरातन घाट बने हुए थे जिन्हें नवीनीकरण के समय जमीन के नीचे दबा दिया गया था। उन घाटों के साथ कई रोचक स्मृतियां जुड़ी हुई थी। ऐसे ही प्राचीन घाटों में ब्रह्मसरोवर के उत्तर पश्चिम किनारे पर मुगल बादशाह अकबर का बनवाया हुआ शेरों वाला घाट था जिसे जमीन के नीचे दबा दिया गया है। इसके बारे में एक वृतांत के अनुसार सूर्यग्रहण के अवसर पर जब बादशाह अकबर अपनी बेगमों के साथ ब्रह्मसरोवर पर आए थे उस समय उनकी महारानी की नाक की नथ पानी में गिर गई थी।आगरा पहुंचने पर महारानी को नथ खोने का पता चला। बादशाह ने नथ लाने के लिए अपने दो सरोवर पर भेजें। बादशाह को इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ जब उन्हें बताया गया कि नथ आकार में १३ गुणा बढ़ गई है। यह वृत्तांत उस कथन की पुष्टि करता था कि कुरुक्षेत्र के तीर्थों पर सूर्य ग्रहण के समय दिया हुआ दान १३ दिन तक १३ गुना होता रहता है। इस घटना से प्रभावित होकर बादशाह ने उस घाट का निर्माण करवाया था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *