___________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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नगर पंचायत भोकरहेड़ी कस्बा की पौराणिक पहचान है। इस नगर क्षेत्र का भूभाग प्राचीन काल में हस्तिनापुर की राजधानी के अंतर्गत आता था। पौराणिक शुकतीर्थ (शुकताल) भी प्राचीन काल से इसी नगर क्षेत्र का एक भूभाग है।

ऐतिहासिक भोकरहेड़ी कस्बा आज भी अपनी पुरानी शान- शौकत, स्मृद्धि और शालीनता को स्वयं में समेटे हुए हैं।

यहां पर स्थित हजारों वर्ष प्राचीन गुरु गोरखनाथ आश्रम दरगाह शिव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। जिसे वर्तमान में बाबा गरीबनाथ जी की समाधि के नाम से जाना जाता है।

प्राचीन काल में इस आश्रम के चारों ओर निर्जन वन था तथा आश्रम से लगी एक पानी की झील थी। इसी के आसपास भोकरहेड़ी नगर बसा।

इस आश्रम में सिद्ध योगी संत के रूप में जाने जाने वाले बाबा गरीबनाथ की समाधि स्थित है। इस क्षेत्र के लोगों की इस समाधि के प्रति बहुत अधिक श्रद्धा है। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने पर बाबा गरीबदास की समाधि पर आकर श्रद्धा भाव से देसी घी के बने मीठे रोट, बताशे, दूध एवं गंगाजल चढ़ाते हैं। श्रद्धालु यहां आकर घंटो तक पूजा अर्चना करते हैं। मान्यता है कि बाबा की समाधि पर सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

समाधि स्थल पर गुरु गोरखनाथ, शिवशक्ति मंदिर, हनुमान मंदिर के साथ-साथ अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं।

हजारों वर्ष पुराना दरगाह-शिव मंदिर हिंदू-मुस्लिम दोनों ही समाज के लोगों की आस्था का केंद्र है। यहां मुस्लिम वर्ग के लोग दरगाह पर चादर चढ़ाते हैं वही हिंदू समाज के लोग आपस में मिलकर भजन-कीर्तन आदि करते रहते हैं। चाहे कोई भी त्यौहार हो इस मंदिर में दोनों समुदाय के लोग अपने अपने रीति-रिवाज के अनुसार पूजा अर्चना करते हैं।

इस दरगाह शिव मंदिर जैसा मंदिर जल्दी से कहीं नजर नहीं आएगा।

हरवर्ष बाबा गरीबदास जी की समाधि पर दूरदराज के क्षेत्रों से आए हजारों महिला पुरुष-श्रद्धालु पूजा-अर्चना के साथ चादर चढ़ाकर मन्नते मांगते हैं। सैकड़ों वर्षों से यहां मनोकामनाएं लेकर आने वाले श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता रहा है। यहां के लोगों की मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

यहां के लोगों की मान्यता है कि भोकरहेड़ी कस्बे को यह दरगाह-शिव मंदिर अपनी अमृत वर्षा से सदा हरा-भरा रखता है।

भोकरहेड़ी के निवासी यह भी बताते हैं कि इस दरगाह-शिव मंदिर में जो श्रद्धा भाव से आकर किन्ही बीमारियों से परेशान लोग झाड़ू तथा बताशे आदि चढ़ाते हैं, उनकी बीमारियां भी कटती नजर आती हैं।

बाबा गरीबनाथ की गद्दी के मंदिर के विषय में बताया जाता है कि उसमें अंदर की ओर दो सुरंगे हैं। जिसमें जाकर बाबा गरीब नाथ जी कठोर तपस्या किया करते थे।

अंदर जाकर देखने पर दो लंबी सुरंगों के द्वार नजर आते हैं। बताया जाता है इसमें से एक सुरंग का सिरा हरिद्वार तक जाता है और दूसरी सुरंग का मक्का मदीना की ओर। देखरेख के अभाव में यह सुरंगे जीर्ण शी‌हो चुकी हैं। वैसे अब सुरंगों को ईंट-पत्थर आदि लगा करके बंद कर दिया गया है। फिर भी अंदर जाकर देखने पर दोनों और को जाने वाले द्वार की कुछ पैड़ियां नजर आती हैं। कोई जाने-अनजाने में इन सुरंगों में घुस न जाए इसकी रोकथाम के लिए इन सुरंगों को अब बंद कर दिया गया है।

भोकरहेड़ी कस्बा सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में योगदान एवं जाटों की चौधराहट के लिए भी पहचाना जाता है।

ब्रिटिश शासन काल में सन 1826 ई. में इस कस्बे को तहसील, थाना तथा परगना बनाया गया था। 1857 की लड़ाई में ग्रामवासियों ने तहसील व थाने को आग के हवाले कर दिया था। इसके बाद यह परगना मात्र ही रह गया था। यहां के शिव मंदिर के निकट सन 1922 ई. में ग्राम सभा के गठन का शिलालेख लगा हुआ है। जो इस कस्बे की प्राचीनता का प्रमाण है।

इस नगर क्षेत्र के अंतर्गत शुकतीर्थ (शुकताल) का गंगा तट 18वीं शताब्दी से पूर्व हरिद्वार से बंगाल की खाड़ी को जाने वाली व्यापारियों के नावों का पहला विश्राम स्थल था। इस पर प्राचीन काल से ही भोकरहेड़ी के व्यापारियों का अधिकार था।

भोकरहेड़ी के मोहल्ला सुभाष चौक में मुगलों वाली मस्जिद अपनी प्राचीनता एवं ऐतिहासिकता के लिए प्रसिद्ध है। इसे औरंगजेब के मनसबदारों ने सन 1675 में मुगल परिवार के मुकद्दस की नमाज पढ़ने के लिए बनवाई थी।

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