__________________________________________________मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.-भारत)के लगभग १०० कि.मी. के दायरे में गंगा-यमुना की धरती पर स्थित पौराणिक महाभारत क्षेत्र
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अनरक तीर्थ – कुरुक्षेत्र

माना जाता है कि यही वह स्थान है, जहां पितामह भीष्म शरशय्या पर सोए थे।

यह स्थान कुरुक्षेत्र से पिहोवा मार्ग पर 5 किलोमीटर की दूरी पर अनरक तीर्थ नरकातारी गांव में स्थित है।

पौराणिक काल से यह तीर्थस्थान ब्रह्मा, विष्णु और महेश एवं रुद्र की पत्नी से समाहित होने के कारण बहुत अधिक महत्व का है।

महाभारत के वनपर्व के ८१/१४९ और पदम पुराण के आदि खंड २७/५९ मैं वर्णन है कि दक्षिण में स्थित महादेव के दर्शन करके मनुष्य पाप मुक्त हो जाता है तथा पदमनाभ नारायण भगवान के दर्शन करके मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

इस स्थान का इसलिए भी बहुत महत्व है कि यहीं कुरुक्षेत्र में शरशय्या पर लेटे हुए वीर योद्धा भीष्म पितामह ने अपना अंतिम धर्म का वास्तविक रहस्य समझाने वाला संसार का अद्वितीय व्याख्यान दिया था और विष्णु सहस्त्रनाम सुनाया था। महाभारत के शांति पर्व में इसका विस्तार से वर्णन है।

महाभारत युद्ध के बाद धर्मराज युधिष्ठिर हस्तिनापुर पहुंचे तथा उन्होंने अपने समस्त स्वजनों का क्रियाकर्म संपन्न करके शास्त्रों के अनुसार हस्तिनापुर राज्य के राजसिंहासन पर बैठ ग‌ए, परंतु दुर्योधन के साथ-साथ अपने हर शत्रु पर विजय प्राप्त करने के बाद भी उनके चित्त में शांति नहीं थी। युधिष्ठिर को महाभारत के युद्ध में अपने सगे संबंधियों और स्वजनों की मृत्यु हो जाने पर उनके रक्त में सने राजसिंहासन पर बैठ कर उनकी अंतरात्मा तृप्त नहीं हो रही थी। उन्हें उनका अंतर्मन कचोट रहा था।

ग्लानि से भरे हुए दुख से पीड़ित युधिष्ठिर को भगवान वेदव्यास ने भीष्म पितामह के पास जाकर ज्ञानोपदेश श्रवण करने के लिए कहा जिससे उनके चित्त का उद्वेग शांत होगा।

श्रीकृष्ण को अपने साथ लेकर युधिष्ठिर यहां अनरक तीर्थ में शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह के पास पहुंचे और उनसे कहा,’पितामह मुझे अपने ही हाथों से अपने कुल का ध्वंस करने के कारण घोर आत्मग्लानि हो रही है।’युधिष्ठिर इतना कहने के बाद सिर झुका कर अश्रु बहाने लगे। तब भीष्म पितामह ने उन्हें धर्मनीति, राजनीति, समाजनीति, आत्मज्ञान का उपदेश दिया। पितामह भीष्म के अमृत वचनों को सुनकर युधिष्ठिर का शोक, मोह, ताप और विषाद दूर हो गया था।

महाभारत पुराण के अनुसार कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडवों के बीच हो रहे महासमर के दसवें दिन भगवान श्री कृष्ण ने पितामह से पूछा था कि उनकी मृत्यु किस प्रकार होगी! तब भगवान श्री कृष्ण के प्रश्न से प्रसन्न होकर भीष्म पितामह ने बताया था कि यदि शिखंडी मेरे से युद्ध करने के लिए आएगा तो मैं अपने हथियार नीचे रख दूंगा क्योंकि शिखंडी पूर्व जन्म में स्त्री था और मैं अभी भी उसे स्त्री ही मानता हूं। मेरा प्रण है कि मैं किसी स्त्री पर शस्त्र नहीं चलाऊंगा। यदि अर्जुन शिखंडी को आगे करके वह और अर्जुन मेरे ऊपर एक साथ आक्रमण करें तभी मैं मृत्यु को प्राप्त कर सकता हूं क्योंकि मुझे अपने पिता से इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त है।

युद्ध आरंभ होने पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा ‘यदि तुमने आज भी भीष्म का वध नहीं किया तो मैं स्वयं शस्त्र धारण करुंगा।’
श्री कृष्ण के ऐसा कहने पर अर्जुन ने युद्धक्षेत्र में शिखंडी को अपने आगे करके दोनों ने मिलकर भीष्म पर पैने बाणों की बौछार कर दी। पितामह के वृद्ध शरीर के रोम- रोम में बाण धंस गए। पीड़ा से व्याकुल पितामह का शरीर कांप कर कुरुक्षेत्र की रणभूमि में गिर पड़ा। उनके रणभूमि में गिरते ही हाहाकार मच गया।
कौरव और पांडव दोनों पक्षों में सन्नाटा पसर गया। पांचों पांडवों सहित और सभी भी युद्ध को छोड़ पितामह भीष्म के पास आए। पितामह का सारा शरीर बाणों से बिंधा होने के कारण उनका सिर लटका हुआ था। उन्होंने दुर्योधन से सिर को सहारा देने के लिए कहा। दुर्योधन के द्वारा सेवकों से तकिया मंगाने पर भीष्म पिता ने उसे रोक दिया और कहा कि मेरा सिर वीरों की तरह बाणों के तकिए से ऊंचा करो। दुर्योधन के द्वारा ऐसा करने में संकोच करने पर भीष्म पितामह ने अर्जुन की ओर देखा। अर्जुन ने पितामह की इच्छा को समझ कर बाणों का आधार देकर उनका सिर ऊंचा किया। अर्जुन के इस वीरोचित कार्य से पितामह ने कहा ‘वत्स तुम धन्य हो। तुम्हारे अलावा और कौन मुझे वीरों जैसा बाणों का तकिया देता।’

शरशय्या पर पड़े-पड़े ही भीष्म पितामह को प्यास लगने पर अर्जुन ने पितामह भीष्म के बगल में ही अपने धनुषबाण से पृथ्वी में बाण मार कर धरती से एक शीतल जल की धारा प्रकट की जिसका जल पीकर पितामह भीष्म ने अपनी प्यास शांत की।

दुर्योधन ने पितामह भीष्म के शरीर से बाणों को निकालने के लिए वैद्यों को बुलाया परंतु पितामह ने मना कर दिया और कहा कि ‘उनका इन बाणों सहित ही दाह संस्कार कर देना। बड़े भाग्य से मुझे क्षत्रिय धर्म के अनुकूल मृत्यु प्राप्त हुई है।’भीष्म पितामह कुरुक्षेत्र की रणभूमि में ही शरशय्या पड़े हुए अपनी मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करने लगे।

कुरुक्षेत्र की रणभूमि में कौरव और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध १८ दिनों तक चला था। इन १८ दिन में ही समस्त शूरवीरों का संहार हो गया। केवल पांचो पांडव भाई, श्रीकृष्ण, सात्यकी एवं अश्वत्थामा, कृतवर्मा तथा कृपाचार्य ही बचे।

महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद महाराज युधिष्ठिर भीष्म पितामह की आज्ञा लेकर हस्तिनापुर आ गए। पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को बताया था कि ‘सूर्य के उत्तरायण होने पर ही वह अपना नश्वर शरीर त्यागेंगे। उस समय तुम मेरे पास आ जाना तब तक मैं अब आत्मचिंतन कर रहा हूं। हस्तिनापुर जाओ और न्याय पूर्वक प्रजा का पालन करो।’

भीष्म पितामह को अपने पिता शान्तनु से इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था यानी जब वे चाहेंगे तभी उनकी मृत्यु होगी। यहीं सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में भीष्म पितामह बाणों की शरशय्या पर लेटे रहे थे। सूर्य के उत्तरायण होने पर भीष्म ने माघ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में दोपहर के समय अपना नश्वर शरीर छोड़ दिया। तब से ही माघ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि ‘भीष्माष्टमी’ के नाम से प्रसिद्ध है।

इस तीर्थ स्थान पर एक पवित्र सरोवर है और भीष्म पितामह, भगवान श्रीकृष्ण, पांचो पांडव, गंगा जी अष्टमुखी दुर्गा आदि देव प्रतिमाओं सहित विशाल हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित है।

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